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जामा मस्जिद के शाही इमाम की कितना सुनते हैं मुसलमान ?

शाही इमाम अहमद बुखारी ने इस बार मुस्लिमों से मायावती की पार्टी बीएसपी के समर्थन की अपील की है

Sanjay Singh Updated On: Feb 13, 2017 06:49 PM IST

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जामा मस्जिद के शाही इमाम की कितना सुनते हैं मुसलमान ?

दो दिन पहले दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी ने अखिलेश यादव सरकार पर हमला बोला और मुसलमानों से बीएसपी को वोट देने की अपील की. उसके कुछ घंटे बाद ही युवा मुसलमानों के एक समूह ने नारा लगाया, देखो-देखो शेर आया, शेर आया.

जिस शेर की वो मुस्लिम युवा बात कर रहे थे, वो उनका नेता भी है और स्टार परफॉर्मर भी. ये युवा उसका घंटों से इंतजार कर रहे थे. जैसे ही उस नेता के आने का एलान हुआ, हंगामा सा बरपा हो गया. लोग उसकी एक झलक पाने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे. इस नेता का नाम है असदउद्दीन ओवैसी, जो हैदराबाद से ऑल इंडिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुसलमीन के सांसद हैं.

बिंदास बोलने वाले नेता की छवि

ओवैसी की इमेज एक बिंदास बोलने वाले नेता की है, जो लोगों की भावनाएं भड़काते हैं. वो न सिर्फ पीएम नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हैं. बल्कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी जैसे उन दलों पर भी निशाना साधते हैं, जो खुद को सेक्युलर बताते हैं.

Owaisi

असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी पहली बार यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ रही है

अपने भाषणों में औवैसी मुसलमान वोटरों को बताते हैं कि किस तरह इन दलों और इनके नेताओं ने उनको छला है. इसलिए उन्हें अब ओवैसी की पार्टी को वोट करना चाहिए. अमरोहा में ओवैसी ने सभी दलों पर जमकर हमला बोला. उनकी हर बात पर जनता शोर मचा रही थी, तालियां बजा रही थी.

अमरोहा में 65 फीसदी वोटर मुसलमान हैं. यूपी के अगर मुसलमानों की राजनीतिक पसंद को समझना है तो अमरोहा से अच्छी कोई और विधानसभा सीट नहीं हो सकती. ओवैसी इस बार यूपी चुनाव में अपने सियासी सफर का आगाज कर रहे हैं. अमरोहा उसका प्रमुख पड़ाव है.

अमरोहा में मुस्लिमों के बहुमत के असर को इस तरह से समझा जा सकता है. यहां 13 उम्मीदवार मैदान में हैं. इनमें से समाजवादी पार्टी के महबूब अलगी, बीएसपी के नौशाद अली, पीस पार्टी के मोहम्मद रिजवान, ओवैसी की पार्टी के शमीम अहमद समेत कुल 10 उम्मीदवार मुसलमान हैं. तीन हिंदू प्रत्याशियों में से एक बीजेपी के कुंवर सिंह सैनी हैं. जबकि एक निर्दलीय उम्मीदवार धरमवीर सिंह सैनी हैं.

जिस जगह ओवैसी की रैली हो रही है वहां से कुछ ही दूरी पर है, घोड़ेवाले हकीम का ठिकाना. यहां मौजूद लोग मायावती को वोट देने की इमाम बुखारी की अपील पर चर्चा कर रहे थे.

बीएसपी को समर्थन से हैरान

बुखारी की अपील और बीएसपी को उनके समर्थन से लोग हैरान हैं. इन लोगों को लगता है कि बुखारी की अपील से मुस्लिम वोटर कनफ्यूज होंगे. इन लोगों के लिए अखिलेश यादव हीरो हैं. वहां खड़े लोग ये मानते हैं कि अखिलेश यादव को इस चुनाव में जीतना चाहिए. सिर्फ यूपी में सरकार चलाने के लिए नहीं, बल्कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कड़ी सियासी टक्कर देने के लिए भी, अखिलेश का जीतना जरूरी है.

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शाही इमाम के मायावती को समर्थन देने के ऐलान से मुसलमान वोटर दुविधा में हैं

मायावती को वोट देने की शाही इमाम की अपील से ये लोग नाराज हैं. बुखारी की अपील के बाद मुस्लिम समुदाय के लोग मायावती और अखिलेश यादव की तुलना कर रहे हैं.

अखिलेश यादव कैंप की कोशिश ये है कि वो खुलकर मुस्लिम समुदाय की न तो बात करें, और न ही ऐसे बयान दें, जिससे चुनावी माहौल में सांप्रदायिकता का रंग घुले. इससे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का डर है. इसलिए अखिलेश यादव की पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को जोर-शोर से बता रही है कि किस तरह सबसे ज्यादा वोट पाने के बावजूद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के प्रत्याशी हार गए थे.

जुबान बंद रखने की नसीहत

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के करीबी हर मुस्लिम धार्मिक नेता को अपनी जुबान बंद रखने को कहा गया है. उन्हें मीडिया से दूरी बनाए रखने का निर्देश दिया गया है. अमरोहा के बाजार में एक कारोबारी इस राजनीतिक समझदारी के लिए अखिलेश यादव की खुलकर तारीफ करता नजर आया.

इलाके के एक रसूखदार, हसन शुजा कहते हैं, 'मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा. मुस्लिम समुदाय एक ऐसे नेता का समर्थन कर रहा है, जो खुलकर न तो मुसलमानों की बात कर रहा है और न ही उनसे लंबे-चौड़े वादे कर रहा है. फिर भी हमें यकीन है कि अखिलेश यादव हमारे हितों का ख्याल रखेंगे. जरूरी नहीं कि हम इस बारे में खुलेआम बात करें. हमने 2014 में मुसलमानों के हितों की खुलकर बात करने का अंजाम भुगता था. हमें हर हाल में दोबारा ऐसा होने से रोकना होगा'.

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शाही इमाम इस बार मायावती का समर्थन कर रहे हैं, पिछले चुनाव में उन्होंने एसपी का समर्थन किया था

मायावती को समर्थन की अपील हसन शुजा, अखिलेश की सूझ-बूझ की तुलना मायावती से करते हैं. मायावती खुलेआम मुसलमान वोटरों को डरा रही हैं. उनसे बीएसपी को वोट देने की अपील कर रही हैं. मुस्लिम धार्मिक नेताओं से कह रही हैं कि वो मुसलमान वोटरों को बीएसपी को वोट देने के लिए समझाएं.

दो दिन पहले राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने यूपी से अपने सारे उम्मीदवार हटाकर मायावती को समर्थन देने का एलान किया था. एक दिन बाद ही शाही इमाम बुखारी ने अखिलेश पर हमला बोला और मायावती को समर्थन देने की मुसलमानों से अपील की.

मुस्लिम समुदाय के बीच बुखारी का भले बहुत असर न हो, मगर समुदाय के बीच उनको लेकर दिलचस्पी जरूर है. उनका ताल्लुक पैगंबर मोहम्मद साहब के खानदान से बताया जाता है. सैय्यद अहमद बुखारी के पुरखे सैय्यद अब्दुल गफूर शाह बुखारी को समरकंद के शाह बुखारी ने भारत भेजा था. उन्हें मुगल बादशाह शाहजहां की गुजारिश पर सत्रहवीं सदी में भारत भेजा गया था.

राजनीतिक पहुंच कमजोर हुई

एक धार्मिक नेता के तौर पर शाही इमाम का आज भी सम्मान है. मगर उनकी राजनीतिक पहुंच बेहद कमजोर हो चुकी है. आज मुस्लिम वोटरों के बीच उनकी पैठ को कोई खास अहमियत नहीं दी जाती.

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यूपी चुनाव में मुसलमान वोटर किसकी तरफ जाएगा इसे लेकर स्थिति साफ नहीं है

2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में शाही इमाम ने खुलकर समाजवादी पार्टी का समर्थन किया था. शाही इमाम ने मुलायम सिंह यादव के साथ प्रेस कांफ्रेंस की थी. वो अपने दामाद उमर अली खान के लिए सहारनपुर की बेहट सीट से टिकट चाहते थे. मुलायम ने शाही इमाम के दामाद को टिकट दिया भी लेकिन वो चुनाव हार गए. फिर इमाम ने अपने दामाद को विधान परिषद का सदस्य बनवा दिया.

2014 के लोकसभा चुनाव में शाही इमाम सोनिया गांधी के घर पहुंच गए और मुस्लिम मतदाताओं से कांग्रेस को वोट देने की अपील की, ताकि उनके हिसाब से सांप्रदायिक बीजेपी को हराया जा सके.

2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में शाही इमाम ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का एलान किया. हालांकि अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के दूसरे नेताओं ने शाही इमाम के इस समर्थन का मजाक उड़ाया था.

बीजेपी को फायदा मिल जाता

केजरीवाल को डर था कि अगर वो शाही इमाम का विरोध नहीं करते, तो उनके खिलाफ हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है जिसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में शाही इमाम ने अरविंद केजरीवाल का समर्थन किया था (फोटो: गेटी)

2004 में बुखारी ने कांग्रेस की बजाय अटल बिहारी वाजपेयी का समर्थन किया था.

बुखारी को भी पता है कि वो मायावती के समर्थन का एलान भले कर रहे हैं, मगर उनकी अपील का कोई खास असर नहीं. अखिलेश के खिलाफ शाही इमाम का बयान तो बिल्कुल फिल्मी लगता है. बुखारी ने कहा था कि, 'जो अपने बाप का नहीं हो सका, वो प्रदेश का क्या होगा'.

भले ही बुखारी का असर न हो, मगर वो सुर्खियां तो बटोर ही लेते हैं. उनकी अपील से मुस्लिम समुदाय के बीच इस बात पर भी बहस छिड़ गई है कि किसका समर्थन करना मुसलमानों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होगा.

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