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यूपी में चौक-चौराहे, चाय की दुकान से ज्यादा सोशल मीडिया पर बहस

राजनीतिक दलों के ब्लॉगर्स सोशल मीडिया के जरिए सियासी पारे को घटा-बढ़ा रहे हैं

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jan 08, 2017 09:43 AM IST

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यूपी में चौक-चौराहे, चाय की दुकान से ज्यादा सोशल मीडिया पर बहस

देश के पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव की जंग इस बार सोशल मीडिया पर भी लड़ी जा रही है. सोशल मीडिया वार की गर्माहट वेबसाइट्स पर महसूस की जा रही है. खास कर उत्तर प्रदेश का चुनाव सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है.

यूपी विधानसभा चुनाव इस बार सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों के लिए टूल का काम कर रहा है. राजनीतिक दलों के ब्लॉगर्स सोशल मीडिया के जरिए सियासी पारे को घटा-बढ़ा रहे हैं.

पिछले कई चुनावों के दौरान सोशल मीडिया ने एक नया ट्रेंड हासिल किया है. चुनाव विश्लेषक सोशल मीडिया के ट्रेंड से हार-जीत को परख रहे हैं. राजनीतिक दल भी सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार के लिए अच्छी-खासी रकम खर्च कर रहे हैं.

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2014 का लोकसभा चुनाव हो या फिर दिल्ली में हुए पिछले दो विधानसभा चुनाव. नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया.

यूपी की चार बड़ी राजनीतिक पार्टियों के मैनेजमेंट गुरु इस बार नए-नए प्लान और आइडिया के साथ आए हैं. चुनाव को लेकर सोशल मीडिया मैनेजमेंट पर एक नजर डालते हैं.

राजनीतिक पार्टियों के सियासतदानों ने क्या-क्या तैयारियां की है और कौन-कौन से टूल का इस्तेमाल करने वाले हैं.

कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने लगाया है पूरा जोर

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, इस बार यूपी में नए सिरे से जमीन तलाशने की कवायद में जुटी हुई है. चुनाव मैनेजमेंट के दिग्गज प्रशांत किशोर इस बार कांग्रेस पार्टी को उसका खोया आधार हासिल करने में मदद कर रहे हैं.

सोशल मीडिया को चुनावी रंग में रंगने में प्रशांत किशोर को महारथ हासिल है. 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का चुनाव मैनेजमेंट कर प्रशांत किशोर ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं. बाद में अमित शाह से अनबन के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार में नीतीश कुमार का चुनाव मैनेजमेंट किया. लेकिन अब प्रशांत किशोर यूपी में कांग्रेस का चुनाव मैनेंजमेंट कर रहे हैं.

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प्रशांत किशोर की टीम में इस समय 300 प्रोफेशनल काम कर रहे हैं. सभी प्रोफेशनल यूपी के अलग-अलग इलाके में कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए रणनीति बनाने में जुटे हैं. इन्हें 15-15 की टीम में बांटा गया है. 15 लोगों की रिसर्च टीम अलग-अलग शिफ्ट में काम कर रही है.

नेताओं के भाषणों पर नजर रखने के लिए एक अलग टीम का गठन किया गया है. कांग्रेस नेताओं को मीडिया में क्या बोलना है. प्रशांत किशोर की तरफ से इसके लिए भी बराबर दिशा-निर्देश आते रहते हैं.

Congress Logo

यूपी कांग्रेस के एक बड़े नेता के मुताबिक प्रियंका गांधी रोज प्रशांत किशोर से बात करती हैं. प्रशांत किशोर उन्हें राज्य की राजनीतिक स्थिति पर लगातार अपडेट करते हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और प्रदेश कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद भी लगातार प्रशांत किशोर के संपर्क में रहते हैं.

प्रशांत किशोर की टीम में आईआईएम अहमदाबाद, जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और देश के तमाम टॉप के यूनिवर्सिटीज के तेज-तर्रार लोग हैं. प्रशांत किशोर की टीम फेसबुक पर विशेष नजर रख रही है. उनके प्रोफेशनल लगातार पेज को अपडेट कर रहे हैं.

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पार्टी सूत्रों के अनुसार प्रशांत किशोर की टीम बीजेपी को सोशल मीडिया पर जवाब देने के लिए उनके नेताओं के पुराने विवादित भाषणों की क्लिपिंग अपलोड कर रही है. इस पर आने वाले दिनों में यूपी का राजनीतिक माहौल गर्मा सकता है.

 बीजेपी का जबरदस्त सोशल मीडिया मैनेजमेंट

यूपी में बीजेपी के चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रदेश उपाध्यक्ष जेपीएस राठौर पर है. बीएचयू से इंजीनियरिंग कर चुके राठौर बीएचयू छात्र संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

बीजेपी का सोशल मीडिया मैनेजमेंट और दलों से काफी अलग माना जा रहा है. बीजेपी ने सभी 403 विधानसभाओं में मोबाइल वीडियो वैन शुरू की है. जिनकी बीजेपी कंट्रोल रूम में लगातार मॉनीटरिंग की जा रही है.

इन हाईटेक मोबाइल वैन में जीपीएस लगे हुए हैं. बीजेपी मुख्यालय में अलग-अलग नियत्रंण केंद्र बने हुए हैं. हर नियत्रंण केंद्र चुनाव के समय बूथों पर निगाह रखेगा. प्रदेश बीजेपी के नेता भी अपने-अपने लेवल पर सोशल मीडिया पर कैंपेन चला रहे हैं.

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बीजेपी की आईटी सेल ने पांच हजार से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दी है. ये सभी आईटी प्रोफेशनल फेसबुक, ट्विटर और व्हाटसएप ग्रुप पर बीजेपी का प्रचार कर रहे हैं.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सीधे तौर पर बीजेपी के वॉर रूम से जुड़े हुए हैं. अमित शाह ने चुनाव की पूरी कमान अपने हाथ में ले रखी है. साथ ही वो आईटी सेल से भी लगातार संपर्क में हैं.

अखिलेश यादव का हाईटेक मैनेजमेंट

हाईटेक चुनाव मैनेजमेंट की रेस में अखिलेश यादव भी कूद पड़े हैं. लेकिन परिवार में जारी कलह, उनके चुनाव मैनेजमेंट को झटका पहुंचा रही है. 'साइकिल' चुनाव चिन्ह पर मालिकाना हक के लिए अखिलेश यादव काफी संघर्ष कर रहे हैं.

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2017 विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव ने साल भर पहले ही अमेरिका की एक कंपनी को मैनेजमेंट कैंपेनिंग की जिम्मेदारी सौंपी थी.

साइकिल की लड़ाई में अखिलेश अभी उलझे हुए जरूर हैं. पर जानकार मान रहे हैं कि अखिलेश की हाईटेक तैयारी के सामने सारे कमजोर साबित होंगे.

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अखिलेश यादव ने यूपी के तीन जगहों पर वॉर रूम बनाया है. इस वॉर रूम में प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों के स्थानीय भाषाओं में जवाब देने के लिए मैनेजमेंट गुरुओं को तैनात किया गया है.

यहां फिलहाल अखिलेश यादव के किए गए विकास कार्यों की जानकारी ही दी जा रही है.

बीएसपी के सोशल इंजीनियरिंग में भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल

मायावती की पॉलिटिक्स मुख्य तौर पर सोशल इंजीनियरिंग पर फोकस रहती है. ऐसा माना जाता रहा है कि मायावती की पहुंच एक खास वर्ग तक ही है. वो जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं उसकी पहुंच सोशल मीडिया तक न के बराबर है. लेकिन बीएसपी इस बार मोबाइल ऐप और नुक्कड़ सभाओं पर ज्यादा फोकस कर रही है.

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सोशल मीडिया से दूर रहने वाली बीएसपी में इस बार एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. मायावती की जनसभा और रैलियों की लाइव टेलिकास्ट बीएसपी के सोशल मैनेजमेंट गुरु फेसबुक के जरिए कर रहे हैं.

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मायावती अपने वोट बैंक के अलावा उच्च और मध्य वर्ग तक में भी पहुंच बनाने में लगी है. बीएसपी अपने सभी उम्मीदवारों की सभाओं के फोटो भी सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रही है.

बीएसपी सुप्रीमो मायावती के निजी सचिव अंबेथ राजन और राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा पर्दे के पीछे रहकर अहम रोल अदा कर रहे हैं.

राजनीतिक पार्टियों के सोशल इंजीनियरिंग के टूल

राजनीतिक पार्टियां कई प्लेटफॉर्म को जरिया बनाकर काम कर रही है. सोशल, पॉलीटिकल, मीडिया, सर्वे और बूथ ट्रेनिंग के साथ मतदाताओं से सीधे जुड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को बूथ मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दे रहे हैं.

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प्रशांत किशोर सोशल मीडिया पर कई बड़े नेताओं का चुनाव मैनेजमेंट कर चुके हैं (रॉयटर्स)

जातिगत आंकड़ों के हिसाब से एक-एक विधानसभा सीट के लिए लोग रखे गए हैं. विधानसभा क्षेत्रों में कई टीमों के द्वारा सर्वे का काम कराया जा रहा है.

वॉर रूम से सीधे पार्टी के बड़े नेता संपर्क में

राजनीतिक पार्टियों के वार रुम में एक-एक बूथ का फीडबैक लिया जा रहा है. फीडबैक से पता लगाया जा रहा है कि बूथ वर्कर या बूथ पर प्रत्याशी की इमेज में से कौन कमजोर है. हर बूथ के हिसाब से रिसिविंग और फीडबैक लिस्ट तैयार की जा रही है. चुनाव के अंतिम समय के लिए यह फीडबैक काफी कारगर होती है.

वीडियो प्रोफाइलिंग, मोबाइल वैन और बल्क एसएमएस की शुरुआत

राजनीतिक पार्टियां अपने कद्दावर नेताओं के भाषण का ऑडियो-वीडियो तैयार करा रही हैं. मोबाइल वैन में राजनीतिक दलों के नेताओं के आकर्षक फोटो और दिल को छू लेने वाले स्लोगन लिखे जा रहे हैं.

इसके साथ ही वॉयस एसएमएस, मिस्ड कॉल, कॉलर ट्यून, टोल फ्री नंबर और वेबसाइट बनाकर सीधे वोटर से जुड़ने की कोशिश की जा रही है.

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राजनीतिक पार्टियां पिछले कुछ चुनावों में ड्रोन का भी इस्तेमाल कर चुकी हैं. ड्रोन के जरिए जनता में पोस्टर और पर्चियां बांटी जाती हैं. हाल के कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में ड्रोन हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया गया था. लेकिन इस बार ड्रोन के इस्तेमाल के लिए चुनाव आयोग ने इजाजत नहीं दी है.

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