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यूपी चुनाव 2017: दांव पर है जातीय दलों की अस्मिता

चार बड़ी पार्टियों के अलावा यूपी में कई छोटी पार्टियां भी दम दिखा रही हैं

Anant Mittal Updated On: Mar 06, 2017 01:53 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: दांव पर है जातीय दलों की अस्मिता

यूपी में सत्ता का स्वाद चख चुके भाजपा और कांग्रेस जैसे केंद्रीय और राज्य के मजबूत सपा और बसपा दलों के अलावा भी अनेक दलों के उम्मीदवार कानून बनाने का हक हासिल करने के लिए इस चुनाव में दिन-रात एक किए हुए हैं.

देश के सबसे अधिक मतदाताओं वाले इस राज्य में कम से कम ऐसे आधा दर्जन दल तो हैं ही जो अपना नुमाइंदा राज्य विधानसभा में चुनवा कर भेज चुके हैं. इनमें से अधिकतर जाति अथवा पांत पर आधारित है. इनमें से कुछ दलों के उम्मीदवार चुने भले नहीं गए मगर उन्होंने अनेक सीटों पर वोट कटवा बन कर सत्ता के दावेदारों का खेल बिगाड़ा है.

इन दलों का मिजाज, एजेंडा और रंग सब अलग-अलग हैं. पैसे की तंगी के बावजूद ऐसे दल अपने किसी मजबूत नेता के पैसों अथवा महत्वांकांक्षा की बदौलत बरसों से सियासी दखल दिए हैं.

इनमें से कुछ दल ऐसे भी हैं जो अपने जनाधार की बदौलत मैदान में डटे हैं. उनका गठन प्राचीन यादवी परिषद की तरह है, जिसमें राजा नहीं बल्कि गणों की सभा होती है, जो सर्वसम्मति से निर्णय करती है. ऐसे दल अधिकतर किसी विशेष जातीय, सामुदायिक अथवा धार्मिक जमात के ठोस समर्थन के बूते चल रहे हैं.

राजभर-कुर्मी वोटों के भरोसे सुभासपा

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ओमप्रकाश राजभर(बाएं)

पूर्वांचल में भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी ऐसा ही दल है. इसका जनाधार राजभर-कुर्मी समाज में है. इसके नेता ओमप्रकाश राजभर हैं. इसे और अपना दल को मिलाकर भाजपा ने पूर्वांचल में कुल 20 सीट अपने कोटे में से दी हुई हैं. इनके उम्मीदवारों को जिताने के लिए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के नेता पूरी ताकत झोंके हुए हैं.

इनका जनाधार उन वोटरों में है जिनके वोट सत्ता के विभिन्न दावेदारों में बंटकर बेकार हो जाता था अथवा बड़े दलों में नक्कारखाने की तूती बन कर रह जाता था. इन दोनों दलों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन कर लिया था. उसी की बदौलत अपना दल के लोकसभा में दो सदस्य हैं जिनमें से अनुप्रिया पटेल केंद्रीय राज्यमंत्री हैं.

अनुप्रिया दरअसल उन सोनेलाल पटेल की बेटी हैं जिन्होंने 1995 में अपना दल की स्थापना की थी. सोनेलाल और ओमप्रकाश राजभर दोनों ही बसपा की सोशल इंजीनियरिंग में शामिल रहे हैं, लेकिन मायावती के जिद्दी रवैये ओर अन्य समाज के नेताओं को सम्मान नहीं देने के कारण उन्होंने अलग राजनीतिक जमातें बना लीं.

सोनेलाल का मकसद कुर्मी-राजभर समाज को लामबंद करके उनके लिए लखनऊ में राजनीतिक जगह बनाना था. यह दोनों ही दल 2012 के पिछले विधानसभा चुनाव में पांच-पांच फीसद वोट लेकर अपनी प्रासंगिकता सिद्ध कर चुके हैं.

सुभासपा ने पिछली बार 56 और अपना दल ने 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. तब इन दोनों दलों का दूसरे दल से गठबंधन था. इस चुनाव में अपना दल 12 और सुभासपा आठ सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. इनके उम्मीदवारों में से अधिकतर की हारजीत का फैसला आखिरी दो दौर में ही हो रहा है. इन जातियों की पूर्वांचल में अच्छी-खासी संख्या है मगर आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने के कारण कांग्रेस अथवा अन्य दलों के भीतर कोई पूछ नहीं थी.

अनुप्रिया ने संभाली सोनेलाल की विरासत

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सोनेलाल तो दुनिया छोड़ चुके मगर अब उनकी बेटी अनुप्रिया उनकी राजनीतिक विरासत संभाले हुए हैं. हालांकि सोनेलाल के परिवार में भी उनकी विरासत पर एका नहीं है. सोनेलाल की पत्नी कृष्णा पटेल और छोटी बेटी पल्लवी द्वारा अनुप्रिया को पार्टी से निकाला जा चुका है.

अनुप्रिया ने अपना दल-एस बनाकर भाजपा से गठबंधन जारी रखा है. उधर कृष्णा पटेल भी अपना दल के झंडे तले करीब 150 उम्मीदवारों को चुनाव लड़ा रही हैं. इनमें वह सीट भी शामिल हैं जिनपर अनुप्रिया के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं.

इनके अलावा उत्तर प्रदेश की चुनावी फिजा में लोकतंत्र का रंग भरने वाले अन्य प्रमुख दल हैं इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल, राकांपा, पीस पार्टी, कौमी एकता दल, रालोद, जनवादी पार्टी सोशलिस्ट, निषाद पार्टी, महान दल, इंडियन मुस्लिम लीग और सर्वोदय भारत पार्टी.

इनमें से अति पिछड़ों के पांच दलों ने तो गठबंधन करके राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हुए हैं. पीस पार्टी 2012 में अपने चार विधायक जिताकर लखनऊ पहुंचा चुकी है. कौमी एकता दल के भी दो विधायक पिछली बार जीते थे हालांकि इस बार कौमी एकता दल अपना विलय बसपा में कर चुका है.

राष्ट्रीय लोकदल कभी देश के प्रधानमंत्री बने चौधरी चरण सिंह की विरासत है. उनके बेटे और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह की सदारत में पिछली बार इसके नौ विधायक जीते थे. इस बार भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों ने रालोद के उम्मीदवारों के लिए लामबंद वोटिंग की है. इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल का भी एक विधायक 2012 में विधानसभा में दाखिल हुआ था. इस बार बहुकोणीय संघर्ष में उसे और ज्यादा विधायक जीतने की आस है.

इस बार आॅल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन भी यूपी के मुसलमानों के वोटों की उम्मीदवार है. पिछली विधानसभा में राकांपा का भी एक विधायक था, हालांकि इस बार आसार धुंधले ही हैं. महान दल ने 2012 में कांग्रेस से हाथ मिलाया था.

प्रगतिशील मानव समाज पार्टी ने भी 37 सीट पर उम्मीदवार लड़ाए थे. इसके संयोजक प्रेमचंद बिंद हैं जिन्होंने 2012 में विवादास्पद एमएलसी बृजेश सिंह और राकेशधर त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया था. यह दोनों ही दूसरे नंबर पर रहे थे. इस बार बिंद ने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के कुंवर देवेंद्र सिंह लोदी, जनवादी पार्टी-सोशलिस्ट के डाॅ. संजय सिह चैहान, जयहिंद समाज पार्टी के नंदलाल निषाद और राष्ट्रीय समानता दल के मोतीलाल शास्त्री वगैरह के साथ मोर्चा बना लिया है. इस मोर्चे ने सभी 403 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.

चार विधायक जिताने में कामयाब रहे थे डॉ. अयूब

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पीस पार्टी, अपने सदर डाॅ अयूब की जोड़तोड़ की बदौलत, पिछले चुनाव में विधानसभा की चार सीटों पर विजयी हुई थी. हालांकि बसपा और सपा उनपर वोट कटवा होने का आरोप लगाते हैं. इस बार मायावती द्वारा 97 हाथी छाप टिकट मुसलमान उम्मीदवारों को दिए जाने से पीस पार्टी जैसी पार्टियों के दिन लदने के आसार लग रहे हैं. हालांकि पीस पार्टी ने इस बार, निषाद पार्टी और महान दल के साथ गठबंधन में अपने उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया है.

डाॅ अयूब अहमद ने निषाद पार्टी के डाॅ. संजय निषाद और महान दल के केशव देव मौर्य से हाथ मिलाकर जातीय समीकरणों के सहारे अपने उम्मीदवार जिताने का प्रयोग किया है. महान दल में मौर्य, कोइरी और कुशवाहों को लामबंद किया गया है. इससे साफ है कि मल्लाहों और कुर्मियों के वोट भी राज्य में अबकी बार बंट रहे हैं.

इसके बावजूद इन पार्टियों द्वारा पिछली बार की तरह सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस के कुछ उम्मीदवारों के वोट काटकर उन्हें हरा देने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. कुल मिलाकर इस बार बहुकोणीय टक्कर के चलते इन जाति आधारित राजनीतिक गोलबंदियों का भाव नतीजे आने पर बढ़ने के आसार हैं.

इसकी वजह बसपा, भाजपा और सपा-कांग्रेस में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाने की आशंका है. हालांकि सत्ता के इन तीनों ही प्रबल दोवदारों ने मतदाताओं को लुभाने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी. अब देखना यही है कि उत्तर प्रदेश में बहुत शिद्दत से लड़े गए चुनाव के बावजूद इन जातीय दलों के नुमाइंदे विधानसभा में भारत की सांस्कृतिक विविधता के रंग भरने में कामयाब हो पाएंगे अथवा नहीं!

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