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अमित शाह कसाब-कसाब की रट क्यों लगा रहे हैं ?

अमित शाह ने क से कांग्रेस, स से सपा और ब का मतलब बसपा बताया था

Amitesh Amitesh Updated On: Feb 23, 2017 11:40 PM IST

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अमित शाह कसाब-कसाब की रट क्यों लगा रहे हैं ?

26/11 मुंबई हमले में शामिल आतंकवादी कसाब की फांसी तो नवंबर 2012 में ही हो चुकी है लेकिन, यूपी चुनाव के बीच बीजेपी को अचानक कसाब की याद सताने लगी है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी चनाव के बीच कसाब-कसाब की रट लगानी शुरू कर दी है. रोज नए-नए जुमले और उन जुमलों की व्याख्या करने वाले अमित शाह ने अब कसाब की व्याख्या कर अपने विरोधियों पर तीखे वार करने शुरू दिए हैं.

amit shah

अमित शाह ने कसाब की तुलना कांग्रेस , समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी से कर दी है. अमित शाह ने यूपी में सियासत का ऐसा ककहरा पढ़ाना शुरू कर दिया है जिसमें क से कांग्रेस, स से सपा और ब का मतलब बसपा होता है. लेकिन, विकास की बात कहते–कहते आखिरकार बीजेपी ने अचानक कसाब-कसाब कहना क्यों शुरू कर दिया है?

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दरअसल, कसाब एक ऐसा आतंकवादी था जिसे मुंबई हमलों के बाद जिंदा पकड़ा गया था. इस जिंदा सबूत के दम पर पाकिस्तान को बेनकाब करने में मदद भी मिली. कसाब को फांसी देने के लिए बीजेपी की सरकार ने तत्कालीन यूपीए सरकार पर दबाव बनाया था. इस मुद्दे पर सियासत भी खूब हुई थी.

अमित शाह को अचानक कसाब की याद आई

कसाब को फांसी तो हो गई लेकिन, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को लगता है कि अभी भी कसाब यूपी के भीतर उनका बेड़ा पार लगा सकता है. कसाब के बहाने हमला विरोधियों पर हो रहा है. अमित शाह इस बहाने कांग्रेस-सपा गठबंधन और बीएसपी की कसाब से तुलना कर ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश में लगे हैं.

पूर्वांचल में अंतिम दो चरणों में मतदान होना है जहां जातीय समीकरण बाकी हर मुद्दे पर हावी दिखते हैं. पश्चिमी यूपी की तरह ही यहां भी हिंदुत्व की सियासी जमीन ही बीजेपी की आखिरी उम्मीद लग रही है. अब बीजेपी की कोशिश है पूर्वांचल में भी हिंदुत्व के इर्द गिर्द ही ताना-बाना बुना जाए जिससे सियासी चौसर पर जाति के जाल को तोड़ा जा सके.

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बीजेपी की तरफ से यूपी के बाकी इलाकों की तरह ही गैर-यादव ओबीसी जातियों को साथ लाने के लिए पूरी तैयारी की जा रही है जिसमें ओमप्रकाश राजभर की पार्टी भासपा से हाथ भी मिला गया है. लेकिन, शायद अमित शाह को अभी भी जातीय समीकरण को दुरुस्त करने के बावजूद भी उतना भरोसा नहीं हो पा रहा है.तभी तो कसाब के बहाने ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही है.

पश्चिमी यूपी के भीतर यांत्रिक कत्लखाने खत्म करने का मुद्दा हो या फिर एंटी रोमियो स्क्वायड बनाने का मुद्दा बीजेपी की कोशिश ध्रुवीकरण की रही जिसमें काफी हद तक उसे कामयाबी मिलती भी दिख रही है.

लेकिन, पूर्वांचल में राम मंदिर का मुद्दा अब इतना असरदार नहीं रहा है जिसके दम पर पूरे इलाके में जातीय गोलबंदी को तोड़कर हिंदुत्व की लाइन को और उभारा जा सके. अब कसाब के बहाने ही सही एक कवायद हिंदुत्व के मुद्दे को मजबूत करने की हो रही है.

बिहार के बाद यूपी में शाह का चर्चित बयान

अमित शाह ने कुछ ऐसा ही मुद्दा बिहार चुनाव के वक्त भी उठाया था जब मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके के चुनावों के पहले सीधे बिहार चुनाव की जीत और हार को पाकिस्तान से जोड़ दिया था. अमित शाह ने कहा था कि बिहार में अगर बीजेपी हारती है तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे.

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उस वक्त अमित शाह का दांव उल्टा पड़ गया था लेकिन, बिहार से यूपी की तासीर कुछ अलग है. शायद इसी उम्मीद में अमित शाह ने अब कसाब-कसाब कहना शुरू कर दिया है.

विरोधी सवाल खड़े कर रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा है कि एक हारे हुए नेता की ऐसी ही सस्ती और छोटी भाषा हो सकती है.

सवाल तो पूछे ही जाएंगे जब अमित शाह बीजेपी के पक्ष में पूरे यूपी में लहर की बात कर रहे हैं तो इस तरह कसाब को बीच में लाने की जरूरत क्यों आन पड़ी.

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