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यूपी चुनाव 2017: बदहाल बुंदेलखंड किस उम्मीद में वोट करे?

बुंदेलखंड की सियासत साल दर साल मिलने वाले पैकेज के इर्द-गिर्द घूमती है

Updated On: Feb 23, 2017 08:22 AM IST

Nazim Naqvi

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यूपी चुनाव 2017: बदहाल बुंदेलखंड किस उम्मीद में वोट करे?

मैं समझ नहीं पा रहा था कि सामने मेज पर पड़ी जानकारियों को किस तरह अपने लेख में समाऊं.

आंखों के सामने जो तस्वीर उभर रही थी वो इतनी खुरदुरी थी कि नजरें छिली जा रही थीं. पास ही बैठे थे अग्रज केदार जी. पूछ बैठे क्या है? मैंने कहा बुंदेलखंड के ये आंकड़े हैं.

गुरुवार को उत्तर-प्रदेश के चौथे चरण का मतदान है और इस इलाके में भी वोट पड़ने वाले हैं. बोले, तो इसमें दिक्कत क्या है. मैंने कहा दिक्कत यही है कि इस दिक्कत को कैसे समझाया जाय.

आंकड़ों में बुंदेलखंड

उत्तर-प्रदेश का ये इलाका जो तीस हजार स्क्वायर किलोमीटर में बसा हुआ है. यहां की जनसंख्या 1 करोड़ 10 लाख है.

यहां 40 हजार लोग वो हैं जो गरीबी की रेखा से नीचे यानी बीपीएल श्रेणी में आते हैं. केदार जी बोले, इसमें नयी बात क्या है, ये तो इस इलाके की सामान्य जानकारी है.

हां, लेकिन ये देखिये, इसके बाद वाले इस आंकड़े को देखिये, इनमें से करीब 32 लाख लोग ऐसे हैं जो दो-वक़्त की रोटी के लिए यहां से पलायन कर चुके हैं. ये इलाका पिछले तीन सूखों की मार से टूट चुका है.

अभी लगभग एक महीने पहले ‘राष्ट्रीय मतदान दिवस’ के अवसर पर स्कूली बच्चों की एक रैली में उपस्थित होने का मौका मिला था जिसमें बच्चों की जागरूकता बढ़ाने के लिए उनके हाथों में नारे थमाए गए थे, ‘सारे काम छोड़ दो, सबसे पहले वोट दो’, एक नारा था, ‘लोकतंत्र का पर्व महान, शत-प्रतिशत करें मतदान’.

पता नहीं यहां से पलायन करने वालों ने ये नारे सुने होंगे या नहीं. ये नारे उनके लिए हैं भी या नहीं.

अचानक कानों में केदार जी की आवाज पड़ी, भयानक सूखा है पक्षी छोड़कर चले गए हैं पेड़ों को बिलों को छोड़कर चले गए हैं चींटे चीटियाँ देहरी और चौखट पता नहीं कहां-किधर चले गए हैं घरों को छोड़कर

मैंने केदार जी का चेहरा देखा, वही चिर-परिचित मुस्कराहट. बोले दो जून की रोटी के लिए हर घर से किसी ना किसी का पलायन अब इस इलाके की तकदीर बन चुकी है. ये बड़ा सामान्य है यहां.

बदहाल बुंदेलखंड

एक रिपोर्ट और नजरों के सामने है और इसके मुताबिक पिछले बरस होली से दीपावली के बीच एक सर्वे का ब्यौरा है.

इसके अनुसार, बुंदेलखंड के 53 प्रतिशत परिवारों में दाल नहीं पकाई गयी. 60 फीसदी लोग सिर्फ मोटे-अनाज और आलू पर ही जिंदा हैं.

करीब 70 प्रतिशत को दूध नसीब नहीं हुआ. 40 फीसदी परिवारों ने मजबूर होकर अपने पशु बेच दिये तो 27 फीसदी परिवारों ने ज़मीन.

ये सर्वे स्वराज अभियान द्वारा कराया गया था, जिसमें दर्ज है कि, सर्वे के दौरान ये भी पाया गया कि हर पांचवां परिवार एक दिन भूखा सोया, हर छठे घर में फितरा यानी घांस की रोटी पकाई गयी. हालात इतने बुरे हुए कि गावं दर गांव पशुओं के लिए चारा नहीं बचा.

केदार जी की कविता जारी थी- भयानक सूखा है मवेशी खड़े हैं एक-दुसरे का मुंह ताकते हुए...

सर्वे की रिपोर्ट कह रही थी कि इन हालात में, बुंदेलखंड, पशु खरीदने का सबसे सस्ता बाजार बन चुका है और यहां के बेशतर पशु कसाई-खानों का चारा हो चुके हैं.

मन में ये प्रश्न अभी भी कुलबुला रहा था, लोकतंत्र का पर्व, इस इलाके में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जो पूरा का पूरा, वोट डालने पहुंचेगा.

फौरन एक दूसरे प्रश्न ने पहले वाले का स्थान ले लिया, यहां अखिलेश, मायावती, राहुल, मोदी जैसे लोग वोट मांगने कैसे आते होंगे? क्या कहते होंगे इन अथाह सन्नाटा लिए ताकती हुई आंखों से?

पैकेज देने की परंपरा भी नयी नहीं

याद आया, कई साल पहले एक बार, शायद पहली बार, यहां राहुल गांधी आये थे और बुंदेलखंड को करोड़ों का पैकेज दिया था.

सामने पड़े आंकड़ों पर नज़र गयी तो पाया की इस इलाके को पैकेज देने की परंपरा भी नयी नहीं है.

अटल जी के दौर में 2 हजार करोड़, मनमोहन सिंह के दौर में साढ़े तीन हजार करोड़, मोदी के दौर में 1304 करोड़, मायावती के दौर में लगभग 900 करोड़ और मौजूदा अखिलेश हुकूमत में तकरीबन 1 हजार करोड़.

यानी बरसों से बुंदेलखंड को हजारों करोड़ पैकेज के रूप में मिलते रहे हैं. दिल्ली हो या लखनऊ, सबके लिए बुंदेलखंड का मतलब है ‘पैकेज’.

किसान क्यों करते हैं खुदकुशी

अब अगर आपके मन में भी सवाल कौंध रहा है तो ठीक ही कौंध रहा है कि फिर राहत का ये पैसा गया कहां?

और इन पैकजों के बाद भी बुंदेलखंड ऐसे क्यों जी रहा है, हजारों किसान खुदकुशी क्यों कर चुके हैं?

bundelkhand

इस तस्वीर के बाद का एक सच और देखिये. लोकतंत्र का ये महापर्व किनके लिए है. शायद तस्वीर बिलकुल साफ हो जाएगी.

आंकड़े बता रहे हैं कि बुंदेलखंड के 90 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं और इनमें 37 प्रतिशत उनका है जो दागी छवि के हैं.

मौजूदा विधान-सभा में सपा और बसपा के पास 7-7 विधायक हैं. 19 सीटें हैं, जिनके लिए खड़े उम्मीदवारों में 54 उम्मीदवार करोड़पति हैं.

ये उस इलाके की दास्तान है जहां के सैकड़ों गांवों में या तो बच्चे हैं या बुज़ुर्ग क्योंकि इसके अलावा जो भी मजदूरी के लायक होता है, वो यहां से चला जाता है. शायद दिल्ली या लखनऊ, रोज़गार की तलाश में.

कुल मिलाकर यहां की सियासत साल दर साल मिलने वाले पैकेज के इर्द-गिर्द घूमती है. जिसके लिए वोट मांगने का सिलसिला अब थम चुका है.

अब गुरुवार को मतदाता निकलेगा अपने घरों से, वोट डालेगा और शाम को घास की रोटी पकाकर भूख मिटा लेगा. इसे किसी 11 मार्च का इंतजार नहीं रहेगा.

क्योंकि इसकी प्यास का रिश्ता पानी से टूट चुका है. हां, नेता लोग इन इंसानी मवेशियों को हांका ले जायेंगे, मतदान के बाड़े तक, जीत हार का फैसला इस पर आ टिका है कि पलायन कर चुके वोटरों के वोट पर किसका कितना हक है.

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