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यूपी चुनाव नतीजे 2017: बीजेपी की जीत जातिवादी राजनीति के खात्मे का संदेश?

एसपी, बीएसपी का वोट खिसकर बीजेपी के पास चला गया है

Sreemoy Talukdar Updated On: Mar 12, 2017 04:30 PM IST

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यूपी चुनाव नतीजे 2017: बीजेपी की जीत जातिवादी राजनीति के खात्मे का संदेश?

यूपी में बीजेपी की अचंभित करने वाली जीत को देखने-समझने के कई तरीके हो सकते हैं. जीत के एक अहम पहलू की तरफ तो खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ही ध्यान दिलाया है.

शनिवार को जब उनसे पूछा गया कि बीजेपी ने वोटर को लुभाने के लिए अपने उम्मीदवारों का जातिगत समीकरण कैसे तय किया तो अमित शाह ने कहा, 'जो जनता का काम करेगा वो जीतेगा. यह वंशवादी और जातिवादी राजनीति की हार है.'

बात सीधी-सादी जान पड़ती है लेकिन उसमें बड़ी सच्चाई छुपी है. अगर 2014 के चुनाव के नतीजों से किसी को बात समझ में नहीं आई हो तो उसे 2017 के यूपी विधानसभा के चुनाव के नतीजों से समझ लेना चाहिए कि अब जातिवादी राजनीति के दिन खत्म हो गए.

जातिवाद की राजनीति अब नहीं चलेगी

जो राजनेता अब भी 1990 के दशक की सोच और मानसिकता लेकर चल रहे हैं उन्हें समय की दीवार पर लिखी इबारत को साफ-साफ समझना होगा और जाति को लेकर अपनी समझ बदलनी होगी या फिर वक्त की बदलती हुई धारा उन्हें एक किनारे कर अपने रास्ते चल देगी.

बीजेपी के बारे में यही कहा जाता रहा है कि वह 'बनिया और अगड़ी जाति के लोगों की पार्टी है और बहुसंख्यकवाद की राजनीति करती है.' इस धारणा के बावजूद अगर बीजेपी यूपी जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले राज्य में 300 सीटों को जीतने का करिश्मा करती है तो फिर बेहतर यही है कि हम अपनी धारणा बदलें. नए सिरे से सोचें कि आधुनिक भारत में वोटर किन बातों को पसंद बनाकर अपने वोट डाल रहा है.

सच्चाई हमारी आंखों के आगे है बशर्ते हममें उस सच्चाई की आंखों में झांकने का साहस हो. सच्चाई यह है कि देश का मतदाता जाति और समुदाय की घेरेबंदी से तेजी से बाहर निकल रहा है. बरसों पुरानी इस फांस को वह तोड़ रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी:

जाति और समुदाय के बंधन से हम पूरी तरह से भले आजाद ना हो पाए हों लेकिन इस फांस के टूटने के रुझान बिल्कुल स्पष्ट हैं. जो पार्टियां जाति और समुदाय के आधार पर सियासत करती रही हैं उन्हें यूपी के वोटर ने धूल चटा दी है.

आखिर एसपी और कांग्रेस का साथ क्यों?

जरा गौर कीजिए कि क्या सोचकर सत्ताधारी समाजवादी पार्टी ने दम तोड़ती हुई कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने का फैसला किया. आखिर राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस को 100 सीटें देने का फैसला अखिलेश यादव को क्योंकर ठीक लगा ? कांग्रेस तो हर जगह फिसड्डी साबित हुई और उसने गठबंधन के अपने साथी की भी राह रोकी.

समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री ने यही सोचा होगा कि कांग्रेस से हाथ मिला लें तो मुस्लिम वोट बंटेंगे नहीं.

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चुनाव अभियान के शुरु होने के पहले ही अखिलेश यादव अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार चुके थे. उन्होंने एक नाकाम पार्टी और एक नकारे ब्रांड के साथ हाथ मिला लिया और हाथ मिलाने की वजह यह नहीं थी कि, अखिलेश वोटर के सामने कोई नई सियासी कहानी रखना चाहते थे.

अखिलेश के मन में था कि कांग्रेस से हाथ मिला लिया तो 19.1 फीसद मुस्लिम वोट सिर्फ उनकी जेब में होंगे. वोटर को जाति और समुदाय के खांचे में बांटकर देखने का यही चलन अब अपनी चमक खत्म होता जा रहा है.

मुस्लिम बहुलता वाले इलाके में भी जीत

जरा इस तथ्य पर विचार कीजिए कि, बीजेपी ने दादरी में चुनाव जीता तो देवबंद में भी और कोई मुस्लिम उम्मीदवार भी खड़ा नहीं किया जबकि दोनों ही सीट मुस्लिम बहुल इलाके में हैं. इसी से पता चल जाता है कि अखिलेश, राहुल और मायावती से गलती कहां हुई और नरेंद्र मोदी-अमित शाह क्यों कामयाब हुए.

अपने को सेक्युलर बताने वाली पार्टियों ने मुस्लिमों को अपने सोच के फंदे में जकड़ रखा है. ये पार्टियां चाहती हैं मुसलमान अपनी पहचान के घेरे में कैद रहें जबकि मुसलमानों में बहुत से लोग, खासकर नौजवान चाहते हैं कि अच्छी नौकरी मिले, तरक्की हो, जीवन-स्तर सुधरे.

इन सेक्युलर पार्टियों के सोच के विपरीत नरेन्द्र मोदी मुस्लिम जनता को नागरिक के रुप में देखते हैं, ऐसा नागरिक जिसकी राष्ट्र-निर्माण में बराबर की भूमिका हो.

खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां भय की राजनीति करती हैं जबकि मोदी उम्मीद की. उम्मीद की भाषा बोलने वाली इसी राजनीति ने 2014 में मोदी को सत्ता दिलाई और तीन साल के भीतर यूपी में, जिसे एक तरह से मध्यावधि चुनाव के बराबर माना जा सकता है, एक बार फिर से उनकी लोकप्रियता का सिंहनाद किया है.

जाति की राजनीति अब अपने खात्मे की तरफ बढ़ रही है. जाति की इस राजनीति के खात्मे में मोदी का कोई योगदान नहीं. दरअसल 1990 के दशक में अर्थव्यवस्था के खुलेपन के साथ शुरु हुई इस प्रक्रिया ने एक तरह से नरेन्द्र मोदी को फायदा ही पहुंचाया है.

जैसे जैसे ज्यादा से ज्यादा भारतीय जनता गरीबी के मकड़जाल से बाहर निकलते जा रही है पिछले, अर्ध-पिछड़े तथा हाशिए के समुदायों को सामाजिक न्याय दिलाने के वादे से उठ खड़ा हुआ मंडल-आंदोलन अपनी स्वाभाविक मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है.

जाति-आधारित ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां बदलाव की बहती बयार के बीच अपनी पहचान के तंग घेरे से निकलने की कोशिश में ज्यादा से ज्यादा समावेशी होने की कोशिश कर रही थीं. यही वजह रही जो मायावती ने बहुजन की जगह सर्वजन सुखाय की राह पकड़ी. बीएसपी दलितों की नुमाइन्दगी वाली पार्टी थी लेकिन उसने अगड़ी जाति की भी नुमाइन्दगी की राह पकड़ी जो एक तरह से कांसीराम के सोच से एकदम उल्टी दिशा में जाने का मामला था.

सत्ता हासिल करने का पुराना तरीका खत्म

सियासत का वह लम्हा अब बीत चुका. समाज के हाशिए के लोगों और पिछड़े वर्ग के लिए सामाजिक न्याय की जरुरत धीरे-धीरे कम होते जा रही है. ऐसे में आरजेडी, जद(यू), एसपी और बीएसपी ने अपने विचाराधारात्मक आधार पर पुनर्विचार कर नया रास्ता अख्तियार नहीं किया तो उनके लिए अपना वजूद बचाये रखना मुश्किल होता जाएगा.

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ध्यान रहे, मैं यह कत्तई नहीं कह रहा कि भारत में कोई गरीब बचा ही नहीं या फिर समाज के हाशिए के समूहों में अब किसी को सामाजिक न्याय की जरुरत ही नहीं. मैं कहना यह चाहता हूं कि जाति-भेद की जगह वर्ग-भेद ने ले ली है और इस बदलाव को पकड़ने में नरेंद्र मोदी बाकियों की तुलना में कहीं ज्यादा आगे साबित हुए हैं.

यूपी में बीजेपी की अचंभित करती जीत के पीछे मुख्य वजह है मोदी का यह भांप लेना कि अब अलग-अलग जातियों के खांचे में बंटा बहुध्रुवीय सोच वाला समाज नहीं रहा. इसकी जगह वर्ग-भेद पर आधारित द्विध्रुवीय सोच वाले समाज ने ले ली है. अब बस दो वर्ग बचे हैं- अमीर और गरीब. मोदी ने गरीब वर्ग को अपने साथ लेने और उनकी आवाज की नुमाइन्दगी के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है.

बीजेपी समर्थक का आधार बदला

मोदी लगातार गरीबों की बात कर रहे हैं और धीरे-धीरे बीजेपी का समर्थक आधार बदल रहा है. पहले अगर उसे व्यापारी वर्ग की पार्टी कहा जाता था तो अब वह गरीबों की हिमायती पार्टी बनती जा रही है.

यूपी में मोदी के विरोधियों की जमीन सोच के इसी मुकाम पर खिसकी है. वे जाति के पथरीले सांचे के भीतर समीकरण बैठाते रहे (यहां बीएसपी के दलित-मुस्लिम और एसपी के यादव-मुस्लिम समीकरण के बारे में सोचिए) जबकि मोदी ने समाज के हर तबके में मौजूद अपनी अपील के सहारे जातियों की घेरेबंदी को तोड़ने में कामयाबी हासिल की.

BJP

नतीजे बता रहे हैं कि एसपी और बीएसपी के परंपरागत वोट(जाटव और गैर-जाटव, यादव, ओबीसी, कुर्मी, निषाद) का बड़ा हिस्सा खिसक कर बीजेपी में चला गया है. वोट के इस खिसके हिस्से में कुछ मुस्लिम-वोट भी शामिल हैं.

बीजेपी के प्रतिद्वंदियों के लिए संदेश एकदम साफ है: वक्त के साथ बदलिए वर्ना बहुत पीछे छूट जाएंगे.

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