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बीजेपी नेताओं को अपने 'अक्खड़पन' की चुकानी पड़ सकती है बड़ी कीमत

अक्खड़पन भारतीय जनता पार्टी और इसके नेतृत्व के लिए लगातार एक घातक समस्या रही है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Feb 07, 2017 07:54 AM IST

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बीजेपी नेताओं को अपने 'अक्खड़पन' की चुकानी पड़ सकती है बड़ी कीमत

अक्खड़पन भारतीय जनता पार्टी और इसके नेतृत्व के लिए लगातार एक घातक समस्या रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव और इसके बाद महाराष्ट्र और हरियाणा में मिली जीत से पार्टी नेतृत्व को चुनावी सफलता के एक फॉर्मूले में यकीन हो गया.

प्रधानमंत्री मोदी की छवि को भुनाओ और स्थानीय नेतृत्व को नजरअंदाज कर के पार्टी को दिल्ली और बिहार में इसकी सजा भुगतनी पड़ी है. लेकिन ऐसा लगता है कि इन हारों से भी पार्टी ने देश के सबसे बड़े प्रदेश, उत्तर प्रदेश में कोई सबक नहीं लिया है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले चरण का चुनाव करीब है और इस तरह के संकेत हैं कि, भाजपा के कार्यकर्ता लगातार पार्टी नेतृत्व से दूर होते जा रहे हैं.

इसके कारण ढूंढने के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा. बीजेपी ने अपने कोर वोट बैंक ब्राह्मण, राजपूत, बनिया और कायस्थ जैसी अगड़ी जातियों को नजरअंदाज करने की बुनियादी गलती की है.

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बिहार के ठीक उलट जहां पर अगड़ी जातियों का सामाजिक आधार छोटा है, उत्तर प्रदेश में अगड़ी जातियों की अच्छी खासी संख्या है और उनका हिस्सा कुल मतदाताओं का करीब 25 फीसदी है. गैर यादव, पिछड़ी जातियों का दिल जीतने के लिए बीजेपी ने परंपरागत तौर पर अगड़ी जातियों का गढ़ समझी जाने वाली सीटें पिछड़ी जाति के नेताओं को दे दी है.

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बीजेपी अध्यक्ष ने ज्यादातर उन लोगों को टिकट दिया है जो दलबदलू हैं

कार्यकर्ता जिस बात से नाराज दिखते हैं वो ये है कि भाजपा का टिकट पाने वाले करीब 140 नेता दलबदलू हैं और पिछले पांच साल के भीतर ही पार्टी में शामिल हुए थे. इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में बगैर जातीय समीकरण को ध्यान में रखे अगड़ी जातियों के उम्मीदवारों को पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों से बदल दिया गया.

जातीय समीकरण में गड़बड़ी

जातीय समीकरण गड़बड़ा गया है यह इस बात से पता चलता है कि सवर्ण जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को पार्टी अपने-अपने इलाके में जाकर अलग-अलग जाति के मतदाताओं के बीच प्रचार करने के लिए राजी नहीं कर पा रही है, ऐसा कहना आसान है करना मुश्किल.

उदाहरण के लिए केंद्रीय मंत्री महेंद्र पांडे या मनोज सिन्हा का ऐसा असर नहीं है कि वो जातिगत आधार पर वोट डालने के लिए लोगों को राजी कर पाएं.

इसी तरह राजनाथ सिंह के लिए यह असंभव होगा कि वो राजपूत मतदाताओं पर अपने प्रभाव का इ्स्तेमाल करें, जबकि वो खुद अपने गृहराज्य में पार्टी में दरकिनार दिखते हैं.

एक और केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्रा की इस नए स्टाइल के चुनाव अभियान में चलती नहीं क्योंकि इसे तैयार करने वाला नया नेतृत्व अपने अहम में डूबा हुआ है और पुराने नेताओं की बात नहीं सुनता. ऐसा लगता है कि भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां वो सही सबक सीखना ही नहीं चाहती.

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कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह दोनों को ही प्रदेश का बड़ा नेता नहीं माना जाता

1991 को ही लीजिए जब भाजपा पहली और आखिरी बार अपने दम पर सत्ता में आई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. मंडल-मंदिर के बाद के युग में पार्टी ने एक ऐसा वैकल्पिक विचार पेश किया जिसकी जड़ें तो धार्मिक प्रतीकवाद (अयोध्या) में थीं लेकिन जिसका वादा एक साफ-सुथरी राजनीति का था.

पार्टी को ताकतवर अगड़ी जातियों और गैर-यादव पिछड़ी जातियों से बड़ा समर्थन मिला. लेकिन बाद में जिस ढंग से संघ और बीजेपी के सवर्ण नेतृत्व ने कल्याण सिंह सरकार को निशाने पर लिया उससे पिछड़ी जातियां हिंदुत्व से दूर हो गईं.

बाबरी कांड के बाद अलग-थलग

बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद बीजेपी जिस तरह से अलग-थलग पड़ी उससे यह साबित हो गया कि पार्टी न सिर्फ सवर्णों में अपना आधार खो चुकी है बल्कि पिछड़ी जातियां भी उससे दूर हो गई हैं.

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इस बात में कोई शक नहीं है कि 2014 का लोकसभा चुनाव एक अपवाद था. उम्मीदों की ऊंची लहर पर सवार नरेंद्र मोदी की छवि ने जातियों की दीवारों को तोड़ा और विकास और स्वच्छ सरकार के वादे पर चुनाव में भारी जीत हासिल की.

पिछड़ों को लुभाने के लिए बीजेपी ने केशव मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया (फोटो फेसबुक)

पिछड़ों को लुभाने के लिए बीजेपी ने केशव मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया (फोटो फेसबुक)

पिछड़े नेता के तौर पर मोदी की पहचान की वजह से भी पिछड़े वर्ग का झुकाव बीजेपी की ओर हुआ. यह सच है कि अगड़ी जातियों के बड़े तबके और पिछड़ी जातियों में मोदी का जलवा अब भी कायम है. लेकिन यह मानना गंभीर राजनीतिक गलती होगी कि लोगों में मोदी का जादू अपने-आप बीजेपी के आधार में बढ़ोत्तरी कर देगा.

लेकिन पार्टी के रणनीतिकार जमीनी हालात को समझ नहीं पा रहे. गैर-यादव पिछड़ी जातियों को लुभाने के लिए उन्होंने प्रतीकवाद के चक्कर में पड़ते हुए ज्यादा साफ छवि न रखने वाले फूलपुर के लोकसभा सांसद केशव प्रसाद मौर्य को राज्य इकाई का अध्यक्ष बना दिया.

अपने ही अक्खड़पन में इन रणनीतिकारों ने जमीनी हालात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है, जो तेजी से भाजपा के खिलाफ होता जा रहा है.

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