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25 हजार लाइक्स तो छोड़िए सोशल मीडिया पर अकाउंट भी नहीं

यूपी चुनाव के टिकट बंटवारे में 25 हजार लाइक्स की बात गायब हो गई

Updated On: Feb 10, 2017 12:41 PM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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25 हजार लाइक्स तो छोड़िए सोशल मीडिया पर अकाउंट भी नहीं

मार्च 2016 में ये खबर आई थी कि आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हीं को पार्टी टिकट दिए जाएंगे जिनके पास फेसबुक पर 25 हजार से ज्यादा लाइक्स होंगे. अब जब चुनाव आ गए हैं. सारे प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं. 11 फरवरी को पहले चरण का चुनाव है. लेकिन अगर टिकट बंटवारे की ओर नजर दौड़ाएं तो दिखेगा जोड़-तोड़ का गणित ऐसा हावी हुआ कि बीजेपी आलाकमान अपने ही आदेश भूल गया.

किए गए थे बड़े दावे

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जब यह खबर आई थी तो कई बीजेपी नेताओं के बयान भी आए थे. मेरठ की थानाभवन सीट से प्रत्याशी सुरेश राणा ने उस समय कहा था कि इस टारगेट को बोझ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. बल्कि इसे सामाजिक संपर्क बढ़ाने के तौर पर देखा जाना चाहिए. उन्होंने उस समय दावे के साथ कहा था कि अभी मेरा फैन पेज तो नहीं है लेकिन जब होगा तो एक लाख से ज्यादा फैन होंगे.

शायद सुरेश राणा ने आलाकमान की बातों को गंभीरता से लिया और वर्तमान में उनके फेसबुक पेज पर लगभग 1 लाख 16 हजार लाइक्स हैं. हां, संगीत सिंह सोम शायद इस श्रेणी में सबसे लोकप्रिय नेता हैं. उनके फेसबुक पर 5 लाख से ज्यादा फॉलोवर हैं. लेकिन दूसरे नेताओं की स्थिति गंभीर है.

इसके कारण ये भी हैं कि आलाकमान खुद भी इस बात को भूल गया कि शायद उनकी तरफ से ऐसा कोई फरमान जारी किया गया था. चुनाव आने के साथ ही जिताऊ और दलबदलू उम्मीदवारों की होड़ में फेसबुक और सोशल मीडिया पर प्रत्याशियों की पहुंच की बात गौण साबित हो गई. पार्टी ने राज्य भर में 371 प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं. इन प्रत्याशियों के चयन में 25 हजार लाइक्स वाला फरमान सिर्फ भूल जाने वाली कहानी लगता है.

बड़े नेताओं की बात करें तो यूपी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी के फेसबुक पर करीब 15 हजार फॉलोवर हैं. लेकिन उनका कोई फेसबुक पेज नहीं है. हालांकि उस समय उन्होंने यहा दावा किया था कि मैं तीन महीने में इस टारगेट को पूरा कर लूंगा. कैराना में हिंदू पलायन का मसला जोर-शोर से उठाने वाले हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह के फेसबुक पेज को 6548 लोगों ने लाइक किया है.

इसके अलावा बीजेपी के और भी कई नेता हैं जो उस अर्हता को पास नहीं करते जिसे पार्टी आलाकमान ने तय किया था. इलाहाबाद शहर उत्तरी से खड़े प्रत्याशी हर्षवर्धन वाजपेयी हों या फिर शहर दक्षिणी से खड़े हर्षवर्धन सिंह या फिर लखनऊ कैंट से रीता बहुगुणा जोशी, सभी बीजेपी के तय टार्गेट से पीछे ही हैं.

बात यहीं खत्म नहीं होती. ऐसे उम्मीदवारों की भी संख्या पर्याप्त है जिनका या तो कोई सोशल मीडिया अकाउंट नहीं है और अगर है भी तो उस पर सिवाय फोटो डालने के कोई एक्टिविटी नहीं हैं.

दूसरी पार्टियों की स्थिति तो और भी खराब

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अगर देखा जाए तो बीजेपी के नेता अन्य पार्टियों से इस मुकाबले में आगे हैं. एसपी और बीएसपी की स्थिति और भी ज्यादा खराब है. समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत नेताओं में शुमार किए जाने वाले आज़म ख़ान का तो कोई फेसबुक प्रोफाइल ही नहीं है. रामगोपाल यादव भी फेसबुक से गायब हैं. मुलायम सिंह यादव का भी कोई आधिकारिक फेसबुक अकाउंट नहीं दिखता. यही हाल बीएसपी सुप्रीमो मायावती का भी है. हालांकि इन नेताओं की लोकप्रियता इतनी है कि इनके प्रशंसकों ने इनके नाम पर कई फैन क्लब बना रखे हैं.

बीजेपी का मामला दूसरों से अलग

बीजेपी के मामले में यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि अन्य किसी पार्टी की तरफ से कभी कोई ऐसी खबर नहीं आई. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि पीएम मोदी खुद पिछले ढाई सालों से लगातार डिजिटल इंडिया पर जोर दिए हुए हैं. सोशल मीडिया पर एक्टिविटी बढ़ाने की भी बात होती रहती है. लेकिन वोटबैंक की राजनीति में जब चुनाव नजदीक आते हैं तो पार्टियां सिर्फ ग्राउंड पर जिताऊ उम्मीदवार ही खोजती हैं, बाकी सारे वादे बेमानी हो जाते हैं.

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