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बीएमसी चुनाव नतीजे: यहीं से पता चलेगा बीजेपी की सियासी ताकत कितनी है?

वक्त यह भी देखने का है कि शरद पवार जैसा सियासत का मंझा हुआ खिलाड़ी अपने पते कैसे खेलते हैं

Sanjay Singh Updated On: Feb 25, 2017 02:51 PM IST

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बीएमसी चुनाव नतीजे: यहीं से पता चलेगा बीजेपी की सियासी ताकत कितनी है?

बीजेपी की सियासी ताकत का झंडा सबसे ऊंचाई पर फहरना जारी है. महाराष्ट्र नगर निकाय के चुनाव के नतीजों ने इसे फिर से साबित किया है. मालदार और महत्वपूर्ण नगर निगमों में शुमार बीएमसी के चुनाव परिणाम भी यही कहते हैं. हालांकि बहुमत किसी को नहीं मिला है लेकिन बीजेपी बढ़ी ही है.

शिवसेना भी ताकतवर बनकर उभरी है, कम से कम मुंबई में. दोस्त से दुश्मन बने बीजेपी और शिवसेना के रिश्तों के लिहाज से चुनाव नतीजों के बाद केंद्र और राज्य में बड़ी पेंचदार हालत पैदा हो गई है.

इन चुनावी नतीजों का एक अहम संदेश यह भी है कि पूरी तरह किनारे हो चुकी कांग्रेस लगातार ढलान पर है. 2013 की सर्दियों में देश की सबसे पुरानी पार्टी की जो सांस उखड़नी शुरु हुई थी वह 2017 के फगुनाहट में भी जारी है.

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चाहे लोकसभा के चुनाव हों या एक के बाद एक दूसरे राज्य में होने वाले विधानसभा, जिला-परिषद या फिर नगरपालिकाओं के चुनाव कांग्रेस का हर जगह गड्ढे में गिरना जारी है.

जाहिर है, कांग्रेस के नेतृत्व - सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकारों के लिए चिन्ता की बात है. मुंबई के कांग्रेस प्रमुख संजय निरुपम (पूर्व शिवसैनिक) ने तो खैर, अब इस्तीफा दे दिया है लेकिन वे कांग्रेस उपाध्यक्ष के चहेतों में शामिल हैं.

ठीक इसी कारण पार्टी ने मुंबई में कमान उन्हीं के हाथ में थमा रखी थी जबकि पार्टी के कुछ धड़े इसके खिलाफ थे.

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ओडिशा और त्रिपुरा के पंचायतों में बीजेपी को बढ़त मिली है

ओडिशा में बढ़त

कुछ रोज पहले ओडिशा के जिला-पंचायत के चुनावों और त्रिपुरा के उप-चुनावों में भी बीजेपी ने आगे बढ़ते हुए कांग्रेस को दूसरे से तीसरे स्थान पर धकेल दिया. पिछले नगर निकायों और ग्राम-पंचायत के हुए सभी चुनावों में कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई है.

यहां तक कि जो चुनाव नोटबंदी के समय हुए उनमें भी कांग्रेस के दिन नहीं फिरे जबकि, उस वक्त लोग कठिनाइयों का सामना कर रहे थे. बीजेपी को पुणे में भारी जीत हासिल हुई है,

नागपुर में उसने अपनी बढ़त बरकरार रखी है और बाकी नगर निगमों में भी उसका प्रदर्शन अच्छा रहा है. जाहिर है, बीजेपी के लिए खुश होने की वजहें कम नहीं हैं लेकिन इस खुशी के साथ एक खटका अब भी लगा हुआ है.

बेशक बीएमसी के चुनावों में 2012 से 2017 के बीच पार्टी ने अपनी बढ़त में तकरीबन तीन गुना इजाफा किया है और उसकी सीटें 31 से बढ़कर 82 पर जा पहुंची हैं, लेकिन इस बढ़ोत्तरी के बावजूद बीजेपी बीएमसी के चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर नहीं उभर सकी है.

बेशक बीजेपी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है लेकिन कुछ कसर बाकी है क्योंकि शिवसेना को उससे दो सीटें ज्यादा मिली हैं. बीएमसी में शिवसेना ने अपने पिछले प्रदर्शन का रिकार्ड सुधारते हुए इसमें 9 सीटों का इजाफा किया है, उसे 84 सीटें हासिल हुई हैं.

227 सदस्यों वाली बीएमसी में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है. ऐसे बिखरे जनादेश से राज्य और केंद्र में नये राजनीतिक गठबंधन की संभावनाएं पैदा हो गई हैं क्योंकि शिवसेना दोनों ही जगह बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल है.

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राज ठाकरे की एमएनएस बीएमसी चुनावों में हाशिये पर रही है

एनसीपी और एमएनएस की उम्मीदें

ऐसे में शरद पवार की एनसीपी और राज ठाकरे की अगुवाई में एमएनएस की उम्मीदें परवान चढ़नी चाहिए. हालांकि, ये दोनों पार्टियां बीएमसी के चुनावी नतीजों के एतबार से एकदम किनारे पर हैं.

एनसीपी को 9 सीटें मिली हैं और एमएनएस को 7 लेकिन फिलहाल दोनों के लिए मामला बिल्ली के भाग्य से छींके के टूटने का बन पड़ा है क्योंकि, उन्हीं को तय करना है कि बीएमसी पर बादशाहत शिवसेना की होगी या बीजेपी की.

शिवसेना और बीजेपी के रिश्तों की तासीर को देखते हुए ज्यादा संभावना इसी बात की है कि दोनों पार्टियां बीएमसी को साझे में चलाने के लिए एक-दूसरे से रजामंद ना हो.

दोनों के बीच तनातनी अपने चरम पर है सो बीएमसी के लिए एक बार और गठबंधन बनाने की बात पर दोनों ही के मन में दुराव का होना लाजिमी है.

चूंकि, शिवसेना बीएमसी में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है इसलिए बहुमत साबित कर इस बड़े नगरनिगम को चलाने का पहला मौका उसे ही मिलेगा.

ऐसे में जिम्मा शिवसेना या उद्धव ठाकरे का बनता है कि वे देवेन्द्र फडनवीस या फिर बीजेपी के अन्य वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साधे और समर्थन मांगें.

Uddhav-Hardik Patel

उद्धव ठाकरे की राजनीति समझ  हर दिन नया मोड़ लेती है (फोटो: पीटीआई)

उद्धव की राजनीति

उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तकरीबन हर बात-बेबात पर कोसते रहे हैं. उन्हें कांग्रेस में खूबी नजर आ रही है, खासकर नेहरु-गांधी में. क्या उद्धव ठाकरे के सोच की धारा बदलेगी, वे कुछ नरम पड़ेंगे या फिर मोदी और बीजेपी के लिए उनका रवैया और सख्त होगा?

दूसरे, उद्धव ठाकरे नाराज चल रहे अपने चचेरे भाई राज ठाकरे और एनसीपी से समर्थन मांग सकते हैं, साथ ही कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों से समर्थन की उम्मीद बांध सकते हैं.

बीएमसी में 84 सीटें जीतने वाली शिवसेना को बहुमत के लिए 30 अन्य सदस्यों के समर्थन की दरकार होगी. यदि शिवसेना यह आंकड़ा नहीं जुटा पाती है तो बीजेपी को मौका मिलेगा.

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फिर गेंद बीजेपी के पाले में होगी और शिवसेना से समर्थन मांगने का जिम्मा उसका बनेगा. बीजेपी दूसरी राह अपनाते हुए एमएनएस और एनसीपी से भी समर्थन मांग सकती है.

बीजेपी के एक नेता ने फर्स्टपोस्ट को भेद भरे स्वर में बताया कि, 'फिलहाल हम सभी संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं, हमें किसी भी विकल्प से इनकार नहीं. आगे देखते हैं कि हवा का रुख बदलती है.'

अगर बीएमसी में शिवसेना और बीजेपी का बरसों पुराना गठबंधन टूटता है तो सवाल उठेगा कि इस टूट का महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस की बीजेपी-शिवसेना गठबंधन वाली सरकार पर क्या असर पड़ेगा?

अगर टूट का महाराष्ट्र की सरकार पर असर पड़ता है तो क्या केंद्र की मोदी सरकार से शिवसेना अपना समर्थन लेगी?

इन सवालों का फिलहाल किसी के पास जवाब नहीं है. शिवसेना बीजेपी की पुरानी (1989 से) साझीदार ही नहीं दोनों के बीच विचाराधारा की जमीन पर भी एका है.

शिवसेना अगर एनडीए से बाहर का रुख करती है तो महाराष्ट्र में कुछ उठा-पटक होगी लेकिन, फडनवीस की सरकार कायम रहेगी.

Sharad Pawar

अब सबकी नजरें एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार पर टिकी है (फोटो: फेसबुक से साभार)

शरद पवार और पद्मभूषण

ऐसा एनसीपी की मेहरबानी से होगा क्योंकि पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार को हाल ही में मोदी सरकार ने देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक-सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा है.

बेशक, मोदी मंत्रिमंडल में शिवसेना के एक प्रतिनिधि अनंत गीते हेवी इंडस्ट्रीज एंड पब्लिक इन्टरप्राइजेज के मंत्री हैं लेकिन शिवसेना का केंद्र में कोई असर नहीं हैं.

लेकिन, अगले चार महीनों में राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होंगे और संसद तथा महाराष्ट्र विधानसभा में पार्टी की सदस्यों की संख्या का इन चुनावों पर असर पड़ेगा.

राष्ट्रपति पद के चुनाव में बीते दो दफे शिवसेना ने बीजेपी से हाथ छुड़ाकर कांग्रेस का साथ दिया. उसका समर्थन प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी को मिला.

शिवसेना-बीजेपी के रिश्ते और भी ज्यादा पेंचदार हो सकते हैं क्योंकि कुछ और नगर निकायों में भी दोनों को एक-दूसरे के समर्थन की जरुरत हो सकती है.

मोदी पर ठाकरे के हमले और बीजेपी के साथ शिवसेना के रिश्तों की तल्खी के बारे में हाल के एक इंटरव्यू में अमित शाह से बार-बार सवाल पूछे गये. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का गोलमटोल जवाब था कि महाराष्ट्र के नगर निकायों के चुनाव के नतीजों का इंतजार कीजिए.

अमित शाह की टेक थी कि शिवसेना और बीजेपी महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में प्रतिद्वन्द्वी हैं, सो उद्धव ठाकरे का बीजेपी पर हमलावर होना स्वाभाविक है. चुनावी होड़ में उतरा कोई भी प्रतिद्वन्द्वी ऐसा ही करेगा. साथ ही, बीजेपी के स्थानीय नेता भी शिवसेना को उसी की शैली में जवाब दे रहे हैं.

किसी और जगह के मुकाबले महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावों की चर्चा और बहस राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा होती है. इसमें भी बीएमसी के चुनावी नतीजों पर चर्चा का जोर कुछ ज्यादा होता है. इन नतीजों का केंद्र और राज्य की सियासी फिजां पर दूरगामी असर पड़ने वाला है.

वक्त यह भी देखने का है कि शरद पवार जैसा सियासत का मंझा हुआ खिलाड़ी अपने पते कैसे खेलते हैं!

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