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यूपी चुनाव 2017: वामपंथ के गढ़ से केसरिया रंग में रंगने तक गाज़ीपुर का सफर...

सरजू पांडे जन नेता था जिनकी मौत पर इलाके में सबसे ज्यादा लोग जमा हुए थे

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Feb 23, 2017 10:47 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: वामपंथ के गढ़ से केसरिया रंग में रंगने तक गाज़ीपुर का सफर...

यूपी के आजमगढ़ जिले में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिलाध्यक्ष का नाम है अमेरिका सिंह यादव. यादव का नाम उस पूंजीवादी देश के नाम पर है, जिसे वामपंथी राजनीति का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है.

जिस दौर में यादव का नाम अमेरिका रखा गया उस वक्त पूरी दुनिया में समाजवाद का डंका बज रहा था और गाजीपुर भी एक बड़ा वामपंथी गढ़ था.

सत्तर के दशक में यादव को अपना नाम अपने राजनैतिक झुकाव के साथ बड़ा बेतुका लगता था. वो सीपीआई के बड़े नेता सरजू पांडे के मुरीद थी. कभी यूपी का गाजीपुर, बलिया और आजमगढ़ जिला वामपंथ का किला हुआ करते थे.

कभी यहां से सरजू पांडे और झारखंडे राय जैसे कम्यूनिस्ट नेता हुआ करते थे. एक दौर ऐसा भी था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई मामलों में सरजू पांडे की वही हैसियत थी, जो पंडित नेहरू की हुआ करती थी.

गाजीपुर के उपन्यासकार राही मासूम रजा के उपन्यास 'आधा गांव' को पढ़ें तो सरजू पांडे की राजनैतिक हैसियत का अंदाजा बखूबी होता है. मगर गाजीपुर में उस दौर के ये किस्से आज धूल-गर्द और चुनावी शोर में दबे हुए हैं.

आज के गाजीपुर में लोगों को तो सीपीआई का दफ्तर भी नहीं मालूम, वो सरजू पांडे को क्या याद रखेंगे. गाजीपुर के लंका बाजार में स्थित सीपीआई के दफ्तर के एक गंदे कोने में बैठे अमेरिका सिंह यादव पुराने दिनों को याद करते हैं,

'हमने एक गलती की..हम देश के जातीय गणित को समझ नहीं पाए.'

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गाज़ीपुर के दफ्तर में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल्स की तस्वीर (फोटो-आसिफ़ ख़ान)

हालांकि, कम्युनिस्ट पार्टी ने इस बार के विधानसभा चुनाव में भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं. लेकिन वो चुनावी रेस में कहीं नजर नहीं आते. ये लाल किला पूरी तरह ढह चुका है.

संसद में नुमाइंदगी

आज संसद में गाजीपुर की नुमाइंदगी लो-प्रोफाइल रहने वाले मनोज सिन्हा करते हैं. जो केंद्रीय संचार मंत्री और और रेल राज्यमंत्री भी हैं. मनोज सिन्हा बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं.

मनोज सिन्हा का गाजीपुर के अलावा बलिया, मऊ और आजमगढ़ जिलों में दबदबा है. बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने मनोज सिन्हा को इन जिलों में चुनाव की जिम्मेदारी दी है.

राज्य के तमाम बीजेपी नेताओं के बीच मनोज सिन्हा की स्थानीय राजनीति पर अच्छी खासी पकड़ है. वो चुनाव अभियान के दौरान कई मुद्दे उठा रहे हैं. जैसे कि उन्होंने अखिलेश के नारे, 'काम बोलता है' का आंकड़ों और तर्कों से बेहद शानदार जवाब दिया है.

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इलाके में अपनी चुनावी सभाओं में मनोज सिन्हा लोगों से कहते हैं कि, 'मुलायम हर जिले में अपने एजेंटो के जरिए राज करते थे. मगर अखिलेश ने तो हर थाने में अपना एजेंट बिठा दिया है. जहां पर उनकी इजाजत के बगैर एफआईआर भी नहीं दर्ज होती'.

मनोज सिन्हा पुलिस के सिपाहियों की भर्ती में हुई धांधली का मुद्दा भी उठाते हैं और दूसरी सरकारी भर्तियों में हुए हेर-फेर और यादवों को तरजीह दिए जाने का जिक्र भी करते हैं.

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गाज़ीपुर में सीपीआई का स्थानीय दफ्तर (फोटो-आसिफ़ ख़ान, फर्स्टपोस्ट)

वो भ्रष्ट अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर भी अखिलेश पर निशाना साधते हैं. अपने सियासी तरकश के इन तीरों से मनोज सिन्हा सीधे लोगों के दिलों पर निशाना साधने में कामयाब होते हैं.

वामपंथ का गढ़

मगर ये मानना भूल होगी कि कभी वामपंथी राजनीति का गढ़ रहा गाजीपुर आज केसरिया रंग में रंग गया है. गाजीपुर के सैदपुर में, आजमगढ़ और मऊ में जातीय समीकरण समाजवादी पार्टी के हक में हैं.

इन इलाकों में यादव वोटरों की अच्छी खासी तादाद है. उनका झुकाव बीजेपी के बजाय समाजवादी पार्टी की तरफ है. फिर इस इलाके में मुस्लिम वोटर भी अच्छे खासे हैं. दोनों मिलकर समाजवादी पार्टी को बढ़त देते हैं.

अब अगर बीजेपी को समाजवादी पार्टी को हराना है, तो उसे यहां के गैर-यादव हिंदुओं को लामबंद करना होगा. फिलहाल इस एकता के संकेत तो नहीं दिख रहे.

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इलाके के वोटरों का ऐसा ध्रुवीकरण 1991 और 1993 में हुआ था, जब राम जन्मभूमि आंदोलन जोरों पर था. बाद के चुनावों में सामाजिक और जातीय समीकरण या तो समाजवादी पार्टी या फिर बहुजन समाज पार्टी के हक में रहे हैं.

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के असर से सवर्ण और पिछड़ी जातियों के वोट बीजेपी के हक में पड़े. लेकिन अभी तो यहां कोई लहर भी नहीं दिखाई देती.

गाजीपुर के समाजवादी पार्टी के दफ्तर में कार्यकर्ता अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखते हैं. वो कहते हैं किअखिलेश यादव की अच्छी छवि के चलते उन्हें बाकी पार्टियों पर बढ़त हासिल है. उन्होंने इस इलाके के लोगों के लिए काफी काम किया है.

स्टैंड अप योजना

हालांकि, वो इलाके की खराब सड़कों पर कोई सफाई नहीं दे पाते. जिला औद्योगिक केंद्र में बैठा एक अधिकारी कहता है कि युवाओं के बीच कारोबार को बढ़ावा देने की कोई कोशिश नहीं की गई है.Ghazipur

वो बताता है कि स्टैंड-अप इंडिया योजना के तहत इस केंद्र से अब तक केवल 19 अर्जियों को मंजूरी दी गई है. जबकि, इलाके में खेती पर आधारित उद्योगों की काफी संभावनाएं दिखती हैं. लेकिन अभी भी लोग सरकार को माई-बाप मानते हैं और केवल सरकारी नौकरी के भरोसे हैं.

वहीं बीएसपी इलाके के माफिया मुख्त़ार अंसारी और उनके भाई अफजाल अंसारी के भरोसे है. मायवती ने हाल ही में अंसारी भाइयों को पार्टी में शामिल किया था. इसका एक ही मकसद था मुस्लिम वोटों को बीएसपी के पाले में लाना.

मुख्तार अंसारी का नाम कई संगीन अपराधों से जुड़ चुका है. जिसमें बनारस के एक कारोबारी के अपहरण और बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय के कत्ल का केस शामिल हैं.

ध्रुवीकरण वाले माहौल में मायावती का ये दांव कारगर भी हो सकता है. इलाके में अंडरवर्ल्ड की ताकत से इंकार नहीं किया जा सकता है. अमिताभ घोष के नॉवेल 'सी ऑफ पॉपीज़' की कहानी गाजीपुर की अफीम फैक्ट्री के पास ही स्थित एक गांव पर आधारित है.

गाजीपुर ऐसे इलाके में स्थित है जिसका ताल्लुक मॉरीशस, फिजी और सूरीनाम से भी है. जब अंग्रेज, एग्रीमेंट करके यहां के मजदूरों को अपने उपनिवेशों में ले जाया करते थे. इन्हें गिरमिटिया कहा जाता था. मगर इलाके के बाहुबलियों और माफियाओं ने यहां की संस्कृति को तहस-नहस कर दिया.

कम्युनिस्ट नेता सरजू पांडे को याद किया भी तो उनके धुर वैचारिक विरोधी मनोज सिन्हा ने. जिन्होंने कहा कि सरजू पांडे जन नेता था जिनकी मौत पर इलाके में सबसे ज्यादा लोग जमा हुए थे.

लेकिन वो सब तो बीते जमाने की बातें हो गई. जैसे-जैसे चुनाव का शोर बढ़ रहा है, ये इलाका अलग अलग राजनैतिक रंगों में रंगा नजर आता है.

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