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यूपी चुनाव के बाद: आखिर मायावती के भविष्य में क्या है?

क्या मायावती में पार्टी को इस स्थिती से बाहर निकालने की क्षमता और दृष्टि है.

Naveen Joshi Updated On: Apr 11, 2017 09:04 AM IST

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यूपी चुनाव के बाद: आखिर मायावती के भविष्य में क्या है?

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव परिणामों के विश्लेषण का एक दौर गुजर जाने के बाद जो सवाल महत्वपूर्ण बने रह गए हैं उनमें एक बहुजन समाज पार्टी और उसकी एकछत्र नेत्री मायावती के बारे में है.

दलितों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिए कांशीराम ने सत्ता की जिस राजनीति को अनिवार्य माना था क्या उसी राजनीति के विद्रूप ने दलित आंदोलन और बीएसपी को त्रासद अंत तक ला दिया है?

बीएसपी के सामने अब सिर्फ राजनीतिक बियाबान है या मायावती संपूर्ण दलित समाज को एक बार फिर राजनीतिक रूप से एकजुट करने में समर्थ होंगी? क्या उनमें इतनी क्षमता और दूरदृष्टि है?

अपनी पराजय के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में छेड़छाड़ की साजिश को जिम्मेदार ठहरा कर मायावती ने साफ तौर पर से अपनी अपरिपक्वता का ही परिचय दिया है. क्या वे इसके वास्तविक कारण तलाशने का प्रयास भी कर रही हैं? क्या उन्हें लगता है कि उनसे कुछ रणनीतिक भूलें हुई हैं? क्या दलित आंदोलन के मूल मिशन से भटकने के जो आरोप लगे हैं उनमें कुछ सच्चाई हो सकती है?

बीएसपी को छोड़ने वाले कई नेता मायावती पर तरह-तरह के आरोप लगाते रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर वह भी काडर स्तर से नेतृत्व के प्रति शिकायत और असंतोष के स्वर पहली बार उठ रहे हैं.

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राजनीतिक जानकारों के अनुसार बीएसपी अपने मूल एजेंडे से भटक गई है

मूल एजेंडे से भटकाव

बीएसपी के कुछ नेता और खासकर कार्यकर्ता स्वीकार करने लगे हैं पार्टी अपने मूल उद्देश्य और एजेंडे से भटक गयी है इसीलिए उसकी ये दुर्गति हुई है.

कहा जा रहा है कि बहुजन समाज पार्टी को 'बहुजन' के बजाय 'सर्वजन' की पार्टी बना दिया गया. सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों को बहुत महत्व दिया गया. दलित, विशेष रूप से गैर-जाटव दलित जातियां उपेक्षित रह गईं. पार्टी के पुराने और समर्पित नेताओं की उपेक्षा की गई.

दलित विद्वान और राजनीतिक चिंतक इस बारे में काफी समय से मायावती को सचेत करते रहे हैं. 2007 में पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई बीएसपी जब 2009 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षित सीटें नहीं जीत सकीं तब दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने  'मायावती के लिए पांच बातें' शीर्षक से एक छोटा सा लेख लिखा था.

उस लेख में एक सवाल यह था कि, 'किसकी सलाह पर मायावती ने इतने व्यापक पैमाने पर ब्राह्मणों को उच्च पदों पर बैठा दिया? क्या दलित सरकार का कोई स्पष्ट दलित एजेंडा है? अभी हाल में प्रदेश के महाविद्यालयों में 85 प्रिंसिपल नियुक्त किए गए जिसमें एक भी दलित नहीं है.'

उन्होंने चेतावनी दी थी कि, 'इन बातों पर बीएसपी फौरन विचार नहीं करती तो आगामी विधानसभा चुनावों में उसे विपक्ष में बैठना पड़ेगा वह भी मुख्य विपक्षी दल के रूप में नहीं बल्कि तीसरे या चौथे पायदान पर.'

आज लोकसभा में बीएसपी का एक भी सदस्य नहीं है. प्रदेश विधानसभा में सिर्फ 19 विधायकों के साथ वह तीसरे पायदान पर है.

2007 में पूर्ण बहुमत पाने वाली बीएसपी साल 2012 में अपनी सत्ता बचा नहीं सकी थी. उसी साल अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्र विभाग के अध्यापक प्रदीप छिब्बर और राहुल वर्मा ने बीएसपी की राजनीतिक रणनीति और चुनावी प्रदर्शन पर अध्ययन किया.

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उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, 'साल 2009 से विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीएसपी का प्रदर्शन खतरनाक गिरावट के संकेत देता है और लगता नहीं है कि वह 2007 जैसा प्रदर्शन दोहरा पाएगी.'

इसके कारणों की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा था, 'एक तो बीएसपी में बाहर से आए ऐसे नेताओं को तरजीह दी गयी जिनकी निष्ठा उसकी विचारधारा में है ही नहीं.'

दूसरा कारण जो कहीं ज्यादा नुकसानदेह साबित हुआ वो यह कि मायावती ने पार्टी संगठन में सत्ता-केंद्र पनपने के भय से दूसरे नेताओं को उभरने नहीं दिया. किसी पार्टी के लंबे समय तक सक्रिय रहने और विस्तार पाने के लिए दूसरे-तीसरे दर्जे के नेताओं का विकास जरूरी होता है.

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चुनावी जीत के लिए मायावती ने पार्टी में सवर्णों और मुसलमानों को दलीतों से ज्यादा तरजीह दी

सवर्णों से दोस्ती, दलितों से दूरी

ये बहुत महत्वपूर्ण सुझाव थे जिन पर मायावती ने ध्यान नहीं दिया. चुनावों में वे 50 फीसदी तक टिकट सवर्णों को देने लगीं. नतीजा यह हुआ कि दलित जातियों का मायावती के अपने जाटवों को छोड़कर बीएसपी से मोहभंग होने लगा.

बीएसपी के कई पुराने नेता जो कांशीराम के समय से दलित या बहुजन आंदोलन को खड़ा करने में समर्पित थे वे पार्टी छोड़कर जाने लगे या मायावती ने ही उन्हें बाहर कर दिया.

साल 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी की रणनीति में बीएसपी की इन कमजोरियों का लाभ उठाना प्राथमिकता में था.

इसकी अनदेखी कर मायावती अपनी तथाकथित, 'सोशल इंजीनियरिंग' पर लगी रहीं जिसके साथ इस बार मुसलमानों पर जरूरत से ज्यादा फोकस जड़ दिया गया. मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया...सवर्णों ने किनारा कर लिया और बहुतेरे दलितों ने उनका साथ छोड़ दिया.

चूंकि, उत्तरप्रदेश में दलित इतनी बड़ी तादाद में नहीं हैं कि अकेले उनके समर्थन से बीएसपी सत्ता पा सके इसलिए सवर्णों को साथ लेना मायावती की चुनावी रणनीति की मजबूरी थी.

कांशीराम ने भी इसे अपनी 'भागीदारी' सिद्धांत में शामिल किया था. मगर मायावती ने इसे ही सत्ता-प्राप्ति का सदाबहार फॉर्मूला मान लिया और दलित एजेंडे की उपेक्षा की. कांशीराम दलित-सवर्ण एकरसता को तब-तक व्यावहारिक नहीं मानते थे जब तक कि दलित बराबरी का दर्जा नहीं पा लेते.

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कांशीराम ने दो दशक से भी ज्यादा समय तक मेहनत और संघर्ष से जिस दलित आंदोलन को 'मिशन' मान कर खड़ा किया था वह आज बिखरने की कगार पर है. इसकी जिम्मेदारी स्वाभाविक तौर से मायावती पर ही आती है.

ये वही मायावती हैं जिन्हें कांशीराम ने साल 2001 में अपना वारिस घोषित किया था. 25 अगस्त 2003 को लखनऊ की विशाल रैली में उन्होंने कहा था कि, 'मेरी तीव्र इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद मायावती मेरे अधूरे कामों को पूरा करें.' वे मायावती को इसमें सक्षम मानते थे और अपने पुराने साथियों से कहीं ज्यादा उन पर भरोसा करते थे.

साल 2007 में मायावती के नेतृत्व में बीएसपी को पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में काबिज देखने के लिए कांशीराम जिंदा नहीं थे. लेकिन, उसी के बाद बीएसपी का लगातार घटाव और पतन भी होता गया. आज दस साल बाद के चुनाव नतीजों ने मायावती के नेतृत्व और बीएसपी के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है.

साल 1983 से कांशीराम के साथी रहे दलित नेता दद्दू प्रसाद को जिन्हें डेढ़ साल पहले मायावती ने पार्टी से निकाल दिया था हाल ही में बीएसपी में वापस लिए जाने से  क्या यह समझा जाए कि मायावती आत्मचिंतन कर रही हैं? क्या वे बीएसपी को 'दलित मिशन' की राह पर वापस लाएंगी?

ऊंची चहारदीवारी और अत्यंत गोपनीयता में रहने वाली मायावती के बारे में कोई भी जवाब सिर्फ समय ही दे सकता है.

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