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टैक्स विवाद: जब कोर्ट ने समझाया सैंडल और चप्पल का फर्क

जरूरत इस बात की है कि सरकार ऐसे कदम उठाए कि ये विवाद खड़े ही न हों

Updated On: Jan 31, 2017 11:31 AM IST

Seetha

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टैक्स विवाद: जब कोर्ट ने समझाया सैंडल और चप्पल का फर्क

हाल के दिनों में दिल्ली हाई कोर्ट का एक आदेश सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हुआ. इस फैसले में अदालत ने कहा था कि महिलाओं की चप्पल को सैंडल कहने के लिए उसमें स्ट्रैप होना जरूरी नहीं. यानी अगर स्ट्रैप नहीं है तो उसे चप्पल कहकर ही पुकारा जाए ये जरूरी नहीं.

जाहिर है अदालत अगर ऐसे फैसले सुनाएगी तो कुछ लोगों ने मजाक उड़ाया और कुछ ने ये कहा कि अदालतें, महिलाओं की चप्पल और सैंडल के विवाद के बजाय ज्यादा गंभीर मसलों पर ध्यान दें.

क्या है मामला?

मगर ये केस इस बात की मिसाल है कि हमारे देश में टैक्स के विवाद के मुकदमे किस स्तर तक जा पहुंचे हैं.

दिल्ली हाई कोर्ट का सैंडल पर दिया गया ये आदेश 2003 के एक मुकदमे पर था.

यह मुकदमा एक फुटवियर कंपनी और कस्टम विभाग के बीच चल रहा था. कंपनी ने सैंडल बनाने के लिए सामान आयात करने में दस फीसद रियायत का फायदा उठाया था.

मगर कस्टम विभाग का कहना था कि कंपनी चूंकि सैंडल नहीं बनाती, चप्पल बनाती है, तो उसे दस नहीं सिर्फ पांच फीसद रियायत मिलनी चाहिए.

मुकदमा 14 साल से चल रहा था. इस विवाद में काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट और फुटवियर डिजाइन एंड डेवलप मेंट इंस्टीट्यूट भी घसीट लिए गए.

मामला खत्म होगा या सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा 

अभी ये तय नहीं है कि ये मामला यहीं खत्म हो जाएगा. या फिर कस्टम विभाग दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा.

अगर कस्टम विभाग सुप्रीम कोर्ट जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. हमारे देश में टैक्स के मुकदमे ऐसे ही बरसों-बरस चलते रहते हैं.

जिस पक्ष को भी किसी अदालत का फैसला नामंजूर होता है, वो उसके खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर देता है और ये सिलसिला जारी रहता है.

31 मार्च 2015 तक हमारे देस में 6.14 लाख करोड़ टैक्स के मुकदमे अदालतों में फंसे थे. ये हमारी सालाना टैक्स वसूली की आधी रकम है.

टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन रिफॉर्म कमीशन की रिपोर्ट में पार्थसारथी शोम ने बताया था कि भारत ऐसा देश है जहां टैक्स देने वालों और टैक्स वसूलने वालों के बीच सबसे ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं.

इन मुकदमों से टैक्स वसूली तो कम होती है, टैक्स के एरियर भी लटके रहे आते हैं.

बजट भाषण में कभी नहीं उठा यह मुद्दा 

तमाम वित्त मंत्रियों के बजट भाषण में ये मुद्दा कभी नहीं उठा. मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जुलाई 2014 में इस मसले पर चुप्पी तोड़ी थी.

उन्होंने वादा किया था कि टैक्स को लेकर ऐसे विवाद कम करने के लिए वो हर मुमकिन कदम उठाएंगे.

उन्होंने अपने वादे पूरे करने की कोशिश भी की. पिछले साल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर बोर्ड ने तमाम टैक्स विवादों को एक बार में सुलझाने की नियमावली जारी की थी.

इसे डायरेक्ट टैक्स रिजॉल्यूशन स्कीम और इनडायरेक्ट टैक्स रिजॉल्यूशन स्कीम नाम दिया गया था.

हालांकि ये अच्छा कदम है. ये एक तरह से टैक्स विवादों के निपटारे के लिए लोक अदालतों के गठन जैसा कदम है.

ऐसे विवाद रोकने की कोशिश जरूरी 

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अब जरूरत इस बात की है कि ऐसे कदम उठाए जाएं कि ये विवाद खड़े ही न हों. अप्रत्यक्ष करों जैसे एक्साइज, कस्टम और सर्विस टैक्स के ज्यादातर विवाद छोटी-छोटी बातों पर खड़े हो जाते हैं.

मसलन सैंडल के स्ट्रैप या किसी लिबास में जिप को लेकर. या फिर स्टील के बचे हुए टुकड़ों को कबाड़ माना जाए या उन्हें कहीं और इस्तेमाल के लायक स्टील.

या फिर किसी आयुर्वेदिक टूथपेस्ट को दवा मानें या सामान्य दंत मंजन. इस लेख में ऐसे तमाम दिलचस्प विवादों की जानकारी है.

इन विवादों से बचने का एक ही तरीका है. टैक्स के नियम आसान बनाए जाएं. बजट में इनका जिक्र होना चाहिए.

दिक्कत ये है कि जीएसटी, इस राह में रोड़े खड़े करने के लिए तैयार है. इसकी वजह ये है कि जीएसटी की दरें जीएसटी काउंसिल तय करेगी.

वित्त मंत्रालय का इसमें कोई दखल नहीं होगा. ये टैक्स सुधारों की उम्मीद लगाए बैठे लोगों के लिए बेहद बुरी खबर है.

नवंबर 2016 में जीएसटी काउंसिल ने सामान पर टैक्स की चार दरें, पांच फीसद, 12 फीसद, 18 प्रतिशत और 28 फीसद तय की थी.

सर्विसेज पर भी टैक्स की कई दरों की चर्चा चल रही है. वित्तीय मामलों के जानकार जैसे विजय केलकर और एम गोविंद राव ने इस कदम की निंदा की है.

इन जानकारों का मानना है कि इससे तो टैक्स ढांचा और पेचीदा होगा. जबकि जीएसटी के जरिए हम इसे सरल बनाने की कोशिश में हैं.

विजय केलकर टैक्स की सिर्फ एक दर की वकालत करते हैं. वहीं गोविंद राव मानते हैं कि दो दरें होनी चाहिए. साफ है कि टैक्स की एक से ज्यादा दरें होने पर कारोबारी समूह, सरकार से जबरदस्त लॉबिइंग करेंगे. फिर इसे लेकर विवाद अदालतों में जाएंगे और फिर कोर्ट बताएंगे कि स्ट्रैप के बगैर भी सैंडल हो सकते हैं.

कुल विवाद में अप्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी सिर्फ 20 फीसदी 

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टैक्स के कुल विवाद में अप्रत्यक्ष करों के विवाद की कुल हिस्सेदारी केवल 20 फीसद है. हमेशा ही डायरेक्ट टैक्स के विवाद अदालतों के पास ज्यादा आते हैं.

अप्रत्यक्ष करों में भी कस्टम के विवाद दस फीसद हैं. एक्साइज और सर्विस टैक्स के मामले ज्यादा होते हैं.

2013-14 में एक्साइज ड्यूटी के केस 45 फीसद थे वहीं सर्विस टैक्स के विवाद 44 फीसद, जो अदालतों में लंबित थे.

2014-15 में अप्रत्यक्ष करों के मुकदमों में सर्विस टैक्स के केस की हिस्सेदार 55 प्रतिशत हो गई. वहीं एक्साइज के मुकदमों की तादाद 35 फीसद.

इन दोनों टैक्स विवादों की वजह से 1.17 लाख करोड़ के टैक्स विवाद अदालतों में फंसे हुए हैं. ये कोई छोटी रकम नहीं. इस रकम से बहुत कुछ किया जा सकता है.

अब जबकि वित्त मंत्री अपने बजट को फाइनल टच दे रहे हैं, तो उन्हें टैक्स के इन मुकदमों पर भी ध्यान देना चाहिए.

जीएसटी काउंसिल के फैसले की वजह से उनके हाथ बंधे हुए हैं. मगर उनसे जो भी हो सकता है वो करना चाहिए. ताकि देश इस मुकदमेबाजी से छुटकारा पा सके.

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