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यूनिफार्म सिविल कोड के बहाने सिर्फ मुसलमानों पर निशाना क्यों?

तीन तलाक के मुद्दे ने फिर समान नागरिक संहिता की पुरानी बहस को जन्म दे दिया है

Updated On: Dec 13, 2016 10:45 AM IST

Shishir Tripathi

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यूनिफार्म सिविल कोड के बहाने सिर्फ मुसलमानों पर निशाना क्यों?

तीन तलाक के मुद्दे ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता की पुरानी बहस को जन्म दे दिया है. विधि आयोग ने लोगों से समान नागरिक संहिता पर विचार मांगे थे. सात अक्टूबर को सवालों की सूची जारी की गई जिसका ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने जोरदार विरोध किया.

जानी मानी वकील फ्लैविया एग्नस जैसे कानूनी जानकारों ने भी आरोप लगाया कि इस तरह की कोशिशों के केंद्र में सिर्फ मुस्लिम कानून है. और दूसरे धर्मों के निजी कानूनों के तहत हो रहे भेदभाव को नजरअंदाज किया जा रहा है.

फ़र्स्टपोस्ट ने मजलिस लीगल सेंटर की निदेशक और जानी मानी वकील फ़्लैविया एग्नस से इस बहस पर बातचीत की.

सवाल - क्या आपको लगता है कि तीन तलाक और समान नागरिक संहिता पर बहस सही दिशा में जा रही है? खास कर ये ध्यान में रखते हुए कि ये बहस मुस्लिम पर्सनल लॉ पर केंद्रित है.

फ़्लैविया - नहीं, मुझे नहीं लगता ये सही दिशा में जा रही है क्योंकि बहस के केंद्र में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ही है. हिंदू कानून में जो भेदभाव के पहलू हैं उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है. सिर्फ कानून ही नहीं बल्कि हमें हिंदू संस्कृति और परंपरा में महिला विरोधी पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है.

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सवाल - 'द ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन' में आपने बेहद अहम राय रखी है. और कहा है कि समान नागरिक संहिता को सिर्फ मुसलमानों में बहुविवाह और तीन तलाक के रिवाज को खत्म करने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. ये मुद्दा कहीं अधिक पेचीदा है और मौजूदा सभी समुदायों के निजी कानूनों की महिला सशक्तिकरण की नजर से समीक्षा करने की जरूरत है. ऐसा लग रहा है कि इन पहलुओं पर मौजूदा बहस में विचार नहीं हो रहा है. आपकी क्या राय है?

फ़्लैविया - हां, विचार विमर्श और मुद्दे की तह तक जाने के बजाए विधि आयोग ने जो सवाल तैयार किए हैं. उनसे लगता है कि कितने सतही तरीके से निजी कानूनों को लिया गया है. ये मुस्लिम समुदाय को ध्यान में रख कर किया गया काम लगता  है.

जिस तरह से ध्रुवीकरण हो रहा है और एआईएमपीएलबी की प्रतिक्रिया आई है. वो सवाल तैयार करने के तरीके का नतीजा है.

समुदायों को आपस में जोड़ने के बदले अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया है.

इसकी कोई जरूरत नहीं थी. शुरू से ही ये कहा गया कि समान नागरिक संहिता सभी समुदायों के अच्छे रिवाजों का संकलन होगा. लेकिन सवालों की सूची से तो ऐसा नहीं लगता.

सवाल - आपने अपने लेख में मुसलमानों के अलावा दूसरे समुदायों के निजी कानूनों में महिला विरोधी बातों को जिक्र किया है. लेकिन इन पर किसी की नजर क्यों नहीं जाती ?

फ़्लैविया - ये दुर्भाग्यपूर्ण है. जहां मुस्लिम कानून के नकारात्मक पहलुओं को उजागर किया जा रहा है. वहीं सकारात्मक चीजों और सामुदायिक प्रयासों की बात नहीं हो रही है.

आप न्यायपालिका के अंदर भी इसे देख सकते हैं. जब हिंदू कानून या संस्कृति में पाई जाने वाली महिला विरोधी प्रथाओं की बात होती है. तो इसे धर्म नहीं बल्कि महिलाओं की समस्याएं बताकर आगे रखा जाता है.

जैसे, दहेज संबंधी हिंसा और मौतें. कोई अध्ययन नहीं है जिससे पता चले दहेज के लोभ में मारी जाने वाली महिलाओं में हिंदू कितनी हैं. लेकिन हमने जो रिसर्च की है उसके मुताबिक ऐसी 90 फीसदी महिलाएं हिंदू हैं. मुस्लिम या अन्य समुदायों की महिलाओं की संख्या दस फीसदी तक सीमित है.ये संख्या क्या कहती है?

अब हाल ही में आए एक फैसले को उदाहरण के तौर पर देखिए. जिसमें पति को इसलिए तलाक मिल गया क्योंकि उसकी पत्नी सास-ससुर के साथ नहीं रहना चाहती थी. संयुक्त परिवार और साझा संपत्ति हिंदुओं तक ही सीमित हैं.

यही फैसला कुछ और होता अगर महिला किसी और समुदाय से होती. लेकिन हम इसे महिला विरोधी हिंदू संस्कृति की प्रथा नहीं मानते हैं.

सवाल - आपने ये भी जिक्र किया है कि कैसे औपनिवेशिक काल में सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए निजी कानूनों को मान्यता दी गई. ऐसा क्यों है कि सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बावजूद अहम सुधार नहीं हो पाए हैं.

फ़्लैविया- जब संविधान को लागू किया गया तब पहला सुधार हिंदुओं के लिए ही था. जो धारा 44 के निर्देशों के खिलाफ था. इसमें तर्क दिया गया कि दूसरे समुदायों के कानूनों से तुलना की जाए तो हिंदू कानून में काफी विषमता है. और इसमें फौरन सुधार की जरूरत है.

बेटियों को खानदानी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था. विधवाओं के अधिकार बेहद सीमित थे. महिलाओं को तलाक देने का अधिकार नहीं था और पुरुष चाहे जितनी शादियां कर सकते थे. बाल विवाह, विधवाओं की बुरी हालत जैसी समस्यायों से महिलाएं जूझ रही थीं.

परपत्नी से संबंध जायज थे. इसलिए आनन-फानन में हिंदू कानूनों को बदलने की जरूरत पड़ी. हालांकि ये सरकार के प्राथमिक उद्देश्य थे पर इसमें राजनीतिक पहलू भी शामिल था. ताकि कानूनी शक्ति प्राप्त की जा सके क्योंकि उस समय हर पंथ के धार्मिक गुरु के पास ही ये अधिकार था. एक कोशिश ये भी थी कि बौद्ध, सिख और जैन धर्मों को भी हिंदू परिवार के भीतर बताया जाए.

आखिरकार, जो कानून बना वो महिलाओं के लिए न्यायसंगत नहीं था. उस समय विभाजन की त्रासदी के ठीक बाद सरकार भी समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को उठाकर अल्पसंख्यकों की भावनाओं से खेलना नहीं चाहती थी. ये माना गया कि आने वाले समय में सभी समुदाय एक-दूसरे के करीब आएंगे.

बाद के सालों में हुई सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं ने इसके उलट काम किया. और मौजूदा हालात में जब केंद्र में दक्षिणपंथी सरकार है मुस्लिम समुदाय सहमा हुआ सा है. उनमें भरोसा नहीं है. इसलिए राजनीतिक माहौल समान नागरिक संहिता के पक्ष में नहीं है.

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सवाल: सरकार ने कहा है कि तीन तलाक महिलाओं की समानता के साथ-साथ अपनी गरिमा के अधिकारों का उल्लंघन है. और इसकी 'एक धर्मनिरपेक्ष देश में कोई जगह नहीं है' इस पर आपकी क्या राय है?

फ़्लैविया: सरकार की तरफ से दायर किया गया हलफनामा पूरी तरह से बेमानी है. क्योंकि 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने शमीम आरा केस में फौरन और मनमाने ढंग से लिए गए ट्रिपल तलाक को पहले से ही अवैध घोषित कर दिया गया था. मुसलमानों में तलाक के लिए प्रक्रिया निर्धारित की गई है.

यहां तक कि हलाला प्रक्रिया के तहत भी ये कोशिश की गई कि फौरन तलाक. और तीन महीने के अंदर होने वाले तलाक को रोका जा सके. लेकिन इसे भी बेमानी और निरर्थक करार दे दिया गया.

चूंकि इस अहम कदम पर मीडिया का ध्यान नहीं गया जिसकी वजह से लाइमलाइट में नहीं आ सका. यही एक वजह भी है कि लोगों तक यह जानकारी नहीं पहुंच पाई.

हाईकोर्ट का एक और अहम फैसला 1981 में शमीम आरा के बारे में आया. जिसे दूसरे हाईकोर्ट ने सही ठहराया. जिसमें कहा गया कि अगर किसी महिला को तलाकनामा मिलता है. तो वह अपने हक के लिए कोर्ट में जा सकती है. कोर्ट में इसकी पूरी तरह से जांच-पड़ताल की जाएगी. और महिला को उसका हक दिलाने के लिए पूरी तरह से कोशिश की जाएगी.

इसलिए, इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं है. जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही गैर-विवादास्पद बता चुका है.

बॉम्बे हाईकोर्ट

सवाल: सरकार ने भी 1952 में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर पुर्नविचार की मांग की. जिसमें अनुच्छेद 13 के तहत पर्सनल लॉ संविधान के अंतर्गत नहीं आता. इस बारे में आपकी क्या राय है.

फ़्लैविया: मुझे इससे कोई समस्या नहीं है. लेकिन सवाल यह है मौजूदा माहौल में यह एक राजनीतिक रंग ले लेगा. 1952 में बॉम्बे हाईकार्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट के लिए बाध्यकारी नहीं है.

वहीं, दूसरे और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले भी मिल जाएंगे. जिसमें मुस्लिम और ईसाई निजी कानूनों को रद्द कर दिया गया. उचित संशोधन भी किए गए.

शमीम आरा पर फैसला इस बात का एक उदाहरण है. ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जिसमें ईसाई धर्म से जुड़े निजी कानूनों के कुछ हिस्सों को रद्द किया गया.

इन सभी मुकदमों के दौरान राजनीति नहीं हुई. लेकिन वहीं इस मुद्दे को जानबूझकर राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है.

सवाल: कई मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि ट्रिपल तलाक 'गैर इस्लामी' है. कहा यह भी जा रहा है कि इसकी व्याख्या भी गलत तरीके से की गई है. यहां तक कि ट्रिपल तलाक का कहीं जिक्र तक नहीं है. लेकिन अगर ऐसा है तो इसके समर्थन का आधार क्या है?

फ़्लैविया: मैं बिल्कुल इस बात से सहमत हूं. लेकिन अगर हम एक बार शमीम आरा के फैसले को स्वीकार कर लेते हैं तो फिर कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता.

आश्चर्यजनक तौर पर मुस्लिम बोर्ड ने भी अपने हलफनामे में इस फैसले का जिक्र किया है. और इससे आगे नहीं बढ़ने की अपील की है. हालांकि बाद में लॉ बोर्ड ने विरोधाभासी बयान देना शुरू कर दिया. इसके बावजूद मुझे खुशी है कि वो शमीम आरा जजमेंट को स्वीकार करते हैं.

सवाल: विधि आयोग ने सवालों की सूची तैयार कर लोगों से राय मांगी है. क्या ये किसी बड़े बदलाव का संकेत है?

फ़्लैविया: जिस तरीके से सवाल दिए गए हैं उससे लगता है ये सिर्फ मुसलमानों पर केंद्रित है. एआईएमपीएलबी ने इसका विराेध किया है. मुझे नहीं लगता कि इससे समान नागरिक संहिता जैसी कोई चीज हो जाएगी. सरकार को पहले बातचीत करनी चाहिए थी.

सवाल: एआईएमपीएलबी के मौलाना वली ने आरोप लगाया है कि समान नागरिक संहिता देश के हित में नहीं है. विविध संस्कृति वाले इस देश में एक विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही है. आपका क्या मानना है?

फ़्लैविया: मैं उससे सहमत हूं. सभी निजी धार्मिक कानूनों में विसंगतिया हैं और महिलाओं के प्रति भेदभाव की प्रथा कायम है. हमें कदम दर कदम आगे बढ़ना चाहिए. और विचार विमर्श के आधार पर फैसला करना चाहिए.

सवाल: समान नागरिक संहिता को लागू करने का मतलब है कि मुसलमानों के अलावा अन्य अल्पसंख्यक समुदाय जैसे ईसाई और पारसी अपनी शादी, तलाक और विरासत जैसे मुद्दों पर निजी धार्मिक कानून बनाने का अधिकार खो बैठेंगे?

फ़्लैविया: ऐसा इसलिए क्योंकि ये हिंदू-मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण का मुद्दा बन गया. सुप्रीम कोर्ट में कई ऐसे मुकदमों का निपटारा हुआ जिसमें पर्सनल लॉ का अहम योगदान था.

चाहे वो जॉन वेल्लोथम या सरला मुद्गल का मामला हो जिसमें हिंदुओं के बीच बहुविवाह को चुनौती दी गई. लेकिन तब पूरे मुकदमे के दौरान समान नागरिक संहिता का जिक्र नहीं हुआ.

दूसरी ओर मुसलमानों से जुड़ा मामला आते ही इसे समान नागरिक संहिता की जरूरत से जोड़ दिया जाता है. इसमें मीडिया ने भी पूरी भूमिका निभाई है जो दुखद है.

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सवाल: आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जारी रखे गए पक्षपाती कार्यों के खिलाफ मजबूती से अपना पक्ष रखा है. उन्होंने इमराना और शाह बानो मामले का जिक्र करते हुए कहा कि ये समाज में फैली गंदगी के महज कुछ उदाहरण हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी स्थापना के समय से ही इन चीजों का समर्थन करता रहा है. क्या इस बार भी एमपीएलबी का विरोध समान नागरिक संहिता की दिशा में जारी प्रयासों पर ब्रेक लगा पाएगा?

फ़्लैविया: अपने स्तर पर बात करूं तो मैं खुद ही समान नागरिक संहिता को किसी धर्म या समुदाय पर जबरन थोपने का विरोध करती हूं. मैं इस सवाल का जवाब देने से भी बचती हूं.

आरिफ़ जी का पूरा सम्मान करते हुए कहना चाहती हूं कि अगर केवल मुसलमान महिलाओं के साथ भेद-भाव पर ही ध्यान देंगे. तो महिलाओं का मसला हल नहीं होगा. ऐसा कर हम पूरे मुद्दे को गलत तरीके से देख रहे हैं.

गलत मानसिकता को ठीक करने के लिए हम बहुत संतुलित तरीके से इस मुद्दे को पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाली वकील होने के नाते कई समुदायों की महिलाएं हमसे संपर्क करती हैं. अदालत की कार्रवाई में हमें कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि मुस्लिम महिलाओं को हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है. बल्कि ये उलट है.

हिंदुओं में महिलाओं के लिए अपनी शादी को साबित करना तब बहुत मुश्किल हो जाता है जब पुरुष मना कर देते हैं. तस्वीरों और कुछ गवाहों के अलावा उनके पास कोई सबूत नहीं होता.

इस्लाम में शादियां किसी कांट्रैक्ट की तरह होती है और मेहर इसका एक हिस्सा होता है. हिंदुओं में विवाह को एक संस्कार के रूप में देखा जाता है और दहेज इसका एक अटूट हिस्सा है. ये कानूनी रूप से प्रतिबंधित है फिर भी बेरोकटोक जारी है.

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार कन्यादान भी भेदभावपूर्ण है. एक बार जब लड़की की शादी हो जाती है तो उसे पराए धन की तरह देखा जाने लगता है. घर के दरवाजे उसके लिए बंद कर दिए जाते हैं.

इन सबके कारण महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है. और वो तनाव में आकर आत्महत्या जैसा कदम तक उठा लेती है. अब इमराना मामले को ही लीजिए तो वो मुस्लिम समुदाय के लिए कोई नई बात नहीं है. ऐसा हिंदू परिवारों में भी होता है. इमराना में सबसे खास बात यह थी कि उसमें अपने पिता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने और मुकदमा चलाने का साहस था.

इस मामले में जारी फतवे का एक पत्रकार ने राजनीतिकरण करने का प्रयास किया था. इस पूरे मामले में सबसे अच्छी बात यह थी कि इमराना ने फतवे को नजरअंदाज किया और अपने पति के साथ रही. पर मीडिया ने इन पहलुओं के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं की. बस बेकार की बहस से मुस्लिम समुदाय की छवि खराब करने की कोशिश करते रहे.

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