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राजस्थान में नौकरियां: पकौड़े तो बेच लेंगे, मौका तो मिले!

राजस्थान पात्रता परीक्षा (REET) में 35 हजार पदों के लिए 9.5 लाख से ज्यादा आवेदन आए हैं, राजस्थान पुलिस के साढ़े 5 हजार पदों के लिए तो 17 लाख से ज्यादा आवेदन पहुंचे हैं

Mahendra Saini Updated On: Jan 29, 2018 11:49 AM IST

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राजस्थान में नौकरियां: पकौड़े तो बेच लेंगे, मौका तो मिले!

एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए स्टेटमेंट पर पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने चुटकी ली है. चिदंबरम ने ट्वीट किया कि अगर पकौड़े बेचना रोजगार है तो भीख मांगने को भी नौकरी कहना चाहिए. चिदंबरम ने कहा कि मोदी की महत्वाकांक्षी मुद्रा योजना में एक शख्स को सिर्फ 43 हजार का लोन मिला. अब इतने से रुपए में क्या तो उसका बिजनेस स्टार्ट होगा, क्या उसका स्केल अप होगा और क्या वो दूसरों को नौकरी दे पाएगा.

प्रधानमंत्री ने कहा था कि किसी ऑफिस के बाहर पकौड़े बेचने का काम भी रोजगार की श्रेणी में ही आना चाहिए. मोदी से एक करोड़ रोजगार देने के उनके चुनावी वादे के मौजूदा हालात पर सवाल किया गया था. उत्तर में प्रधानमंत्री ने 17 लाख नए पीएफ खातों, पहले से ज्यादा बन रही सड़कों, ज्यादा बिछ रही रेल पटरियों और ज्यादा उत्पादित हो रही बिजली की मिसाल देते हुए बढ़ रहे रोजगार अवसरों का दावा किया था. मोदी के मुताबिक 2014 के बाद जिन 3 करोड़ लोगों को लोन दिया गया है, उसका मतलब भी रोजगार के नए मौके ही होता है.

जमीनी हकीकत रंगीन नहीं स्याह है

प्रधानमंत्री चाहे अपनी पीठ खूब थपथपा लें लेकिन जमीनी हकीकत दूसरी ही फिल्म दिखाती है. ऐसी फिल्म जो चटख रंगीन तो बिल्कुल ही नहीं है. पूरे देश की छोड़िए, अगर देश के सबसे बड़े राज्य यानी राजस्थान की ही बात करें तो हालात बेहद भयावह नजर आते हैं. 11 फरवरी को होनेवाली राजस्थान पात्रता परीक्षा (REET)में 35 हजार पदों के लिए 9.5 लाख से ज्यादा आवेदन आए हैं. राजस्थान पुलिस के साढ़े 5 हजार पदों के लिए तो 17 लाख से ज्यादा आवेदन पहुंचे हैं.

Call Centre Job

विधानसभा में चपरासी के 18 पदों के लिए पहुंचे आवेदनों ने तो सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले. इन 18 पदों के लिए 18 हजार से ज्यादा लोगों ने फॉर्म भरा यानी एक सीट के लिए एक हजार से ज्यादा लोग कतार में थे. इनमें भी आधे से ज्यादा ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमबीए, पीएचडी जैसी बड़ी-बड़ी डिग्रीधारी युवा थे. जिस पद की न्यूनतम योग्यता पांचवी या ज्यादा से ज्यादा दसवीं पास हो, वहां भी एमबीए, पीएचडी डिग्री धारी आवेदन कर रहे हों तो बेरोजगारी के हालात समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है.

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ये तब है जब राजस्थान सरकार ने रोजगार उपलब्ध कराना अपनी प्राथमिकता में होने का दावा किया है. 2013 में बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में जनता से वादा किया था कि 5 साल में 15 लाख लोगों को नौकरी दी जाएगी. लेकिन जमीनी हकीकत यहां भी ब्लैक एंड व्हाइट ही है. सरकार का पांचवा साल चल रहा है और नौकरियों का आंकड़ा 15 लाख तो छोड़िए, इसका 10 फीसदी भी नहीं पहुंच सका है.

नौकरी एक नहीं, बहाने हजार हैं

राजस्थान सरकार अब नए-नए बहाने ढूंढ़ रही है. यहां कौशल विकास के आंकड़ों को सामने रखा जा रहा है. सवाल पूछने वालों से कहा जा रहा है कि देखिए, रोजगार का मतलब सरकारी नौकरी ही नहीं होता. सरकार ने लोगों के कौशल को इतना उन्नत कर दिया है कि वे नौकरी मांगने वाले नहीं बल्कि नौकरी देने वाले बन रहे हैं. निस्संदेह कौशल विकास के ये आंकड़े सरकारी नजर में लाखों में तो हैं ही.

लेकिन सरकारी आंकड़ेबाजी में सब फंस ही जाएं, ये संभव तो नहीं है. लोग सरकार की इस गणना पर सवाल उठाते हैं और नाराजगी भी जताते हैं. राजस्थान एकीकृत बेरोजगार महासंघ के अध्यक्ष उपेन यादव का कहना है कि नई भर्तियों की तो बात ही मत कीजिए, 4 साल बाद भी अभी कांग्रेस सरकार के समय निकली 62 हजार से ज्यादा भर्तियां ही लंबित चल रही हैं.

यादव का दावा है कि सरकार की वादाखिलाफी की वजह से युवाओं को खाने के लाले पड़ गए हैं. हालात इतने विकट हैं कि कम से कम 26 विद्यार्थी मित्र खुदकुशी कर चुके हैं लेकिन वसुंधरा सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है. यही वजह है कि युवाओं ने अजमेर, अलवर और मांडलगढ़ उपचुनाव में बीजेपी को सबक सिखाने का फैसला किया है.

चेते तो सही लेकिन उलझन बना आरक्षण

चुनावी साल में राजे सरकार को भी इस बात का बखूबी अंदाजा है कि हालात पक्ष में नहीं हैं. उपचुनावों में प्रचार के दौरान बीजेपी को अहसास हो गया है कि जमीनी स्तर पर कुछ किए बिना काम चलने वाला है नहीं. यही वजह है कि हाल में मुख्य सचिव बने निहालचंद गोयल ने सबसे पहले रोजगार को अपनी प्राथमिकता में रखा है. गोयल ने राजस्थान लोकसेवा आयोग और अधीनस्थ चयन बोर्ड जैसी संस्थाओं के साथ बैठक कर अटकी भर्तियों को पूरी करने और नई भर्तियां जल्द से जल्द शुरू करने के आदेश दिए हैं.

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इसी बैठक के दौरान सामने आया कि इस वक्त करीब 85 हजार भर्तियां किसी न किसी कारण से अटकी पड़ी हैं. इनमें आरक्षण का मसला सबसे बड़ा है. राजस्थान में गुर्जर आरक्षण की तस्वीर अभी तक साफ नहीं है. गुर्जर समुदाय पहले अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग कर रहा था. वहां मीणाओं के साथ जातीय संघर्ष के हालात पैदा होने पर विशेष पिछड़ा वर्ग (SBC) की मांग उठाई गई. 49% आरक्षण पहले से होने की वजह से सरकार ने SBC के तहत 1% अतिरिक्त आरक्षण दे दिया.

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हालांकि गतिरोध कायम रहा क्योंकि गुर्जर 5% आरक्षण की मांग कर रहे थे. विधानसभा से एक से ज्यादा बार इस संबंध में प्रस्ताव पारित होने के बावजूद कोर्ट में ये नहीं टिक सके. इसके बाद सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 21% कोटे को बढ़ाकर 26% करने और गुर्जरों को ये बढ़ा हुआ आरक्षण देने का प्रस्ताव किया. लेकिन 50% से ऊपर जाने की वजह से ये भी कोर्ट में नहीं टिक सका. गुर्जरों ने राजस्थान सरकार को स्पष्ट चेतावनी दे रखी है कि आरक्षण नहीं मिलेगा तो भर्ती भी नहीं  खुलने देंगे.

दूसरी जातियों में इस बात का रोष है कि बीजेपी सरकार ने उन गुर्जरों के आगे घुटने टेक दिए हैं, जिनकी आबादी 6% से ज्यादा नहीं है. जबकि गुर्जरों के अलावा बाकी ओबीसी जातियों का कुल आबादी में हिस्सा 45% से भी ज्यादा बताया जा रहा है. ऐसे में बाकी जातियां बीजेपी से दूर जाती दिख रही हैं. आने वाले चुनावों में बीजेपी इनके वोट से भी महरूम रह सकती है.

आरपीएससी में 'चलता है' कब तक चलेगा?

वैसे, रोजगार का मुद्दा ऐसा है जिसमें ऊपर से नीचे तक जबरदस्त लापरवाही और 'चलता है' वाला रवैया दिखता है. व्हाट्एप पर तो ऐसे-ऐसे संदेश भी फॉरवर्ड किए जाते हैं जिनका मजमून ये है कि RPSC की भर्ती के 3 नहीं, 4 चरण होते हैं- पहला प्रीलिम्स, दूसरा मेन्स, तीसरा इंटरव्यू और चौथा कोर्ट. पिछले कुछ साल में ऐसी कोई भर्ती नहीं देखी गई जो किसी न किसी कारण से कोर्ट में न गई हो. मुद्दा चाहे आरक्षण का हो, पेपर लीक का हो, गलत आंसर की का हो या कॉपियों में ही हेरफेर का हो. एक बानगी देखिए कि RAS-2013 की परीक्षा 2016 में हुई, जूनियर क्लर्क-2013 तो अभी तक उलझी हुई है.

बीते रविवार को गुरुग्राम में एटीएम के सामने लाइन में लगे लोग (फोटो: पीटीआई)

संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) का कैलेंडर निश्चित है और तारीखों का सख्ती से पालन किया जाता है. लेकिन RPSC की साख ऐसी हो गई है कि अभ्यर्थियों को तैयारी के साथ-साथ ये टेंशन भी रहती है कि परीक्षा होगी भी या नहीं. यहां तक कि परीक्षा होने के बाद भी कोई भरोसा नहीं कि वह रद्द होकर दोबारा न हो. RAS-2013 में ही ऐसा देखा जा चुका है. प्रीलिम्स होने के 8 महीने बाद रिजल्ट आया और महीने भर बाद जो ये रद्द हुई तो डेढ़ साल बाद दोबारा हो पाई.

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आरपीएससी की छवि कैसी है, इसका अंदाजा प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी कर रहे सत्यनारायण मीणा के तंज से अच्छी तरह लगाया जा सकता है. मीणा के अनुसार आरपीएससी का फॉर्म भरते वक्त छात्र कुंवारा होता है, मेंस देते वक्त उसकी शादी हो चुकी होती है और इंटरव्यू में इस बात पर तकरार हो रही होती है कि उसके दो बच्चे हैं तो फॉर्म में अविवाहित क्यों लिखा है.

बहरहाल, राजस्थान ही नहीं पूरे देश के हालात भयावह हैं. रोजगार विहीन संवृद्धि की बातें तो उदारीकरण के बाद से ही की जा रही थी. लेकिन 2014 के बाद ये बहस और तेज हो गई है. वैश्विक स्तर की संस्थाएं तक अपनी रिपोर्ट्स में कह रही हैं कि भारत में नौकरियां लगातार कम हो रही हैं. पिछली सदी में कम्प्यूटर क्रांति को नौकरियां कम होने का कारण बताया जा रहा था. आज कम्प्यूटर तो बीपीओ, आईटी जैसे रोजगार के नए क्षेत्र बना रहा है जबकि सरकार मैन्यूफैक्चरिंग और इंफ्रांस्ट्रक्चर जैसे परंपरागत क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर बरकरार नहीं रख पा रही.

हैरानी इस बात पर है कि लगातार कम होते अवसरों के बावजूद हम 65 करोड़ युवाओं की विश्व की सबसे बड़ी आबादी को डेमोग्राफिक डिविडेंड की संज्ञा दे रहे हैं. मुझे आशंका है कि कहीं ये डिविडेंड ऐसा चेक न बन जाए जो कहीं भुनाने लायक न रहे.

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