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अनुच्छेद 35A की आड़ में अमानवीय यातनाएं झेलता भारत का लोकतंत्र

अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर विधानसभा को यह अधिकार देता है कि वह राज्य के मूल निवासियों की पहचान करे और उन्हें विशेषाधिकार दे

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar Updated On: Aug 20, 2017 11:28 AM IST

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अनुच्छेद 35A की आड़ में अमानवीय यातनाएं झेलता भारत का लोकतंत्र

कश्मीर की समस्या का जिक्र हो और अनुच्छेद 370 का उल्लेख न आए, ऐसा हो नहीं सकता. पिछले कई दशकों से कश्मीर की मूलभूत संवैधानिक समस्याओं को समझने-समझाने में इसी अनुच्छेद का संदर्भ दिया जाता रहा है. हमें यह भी बताया जाता रहा है कि इसी एक अनुच्छेद के कारण देश का कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में न जमीन खरीद सकता है और न वहां बस सकता है.

लेकिन फिर एकाएक जब हम आजादी की 70वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहे होते हैं, तभी संविधान के ही एक अनुच्छेद पर घाटी में गर्म हवाएं बहने लगती हैं. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती देश को धमकाते हुए कहती हैं कि यदि इस अनुच्छेद को हटाया गया तो पूरी घाटी में कोई तिरंगा ढोने वाला नहीं रहेगा. क्या हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, क्या कांग्रेस और क्या वामपंथी दल- सब एकजुट होकर इस अनुच्छेद को खत्म करने के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं.

370 की जगह 35A पर बवाल क्यों

आश्चर्य यह है कि जम्मू-कश्मीर में सत्ता से लेकर विपक्ष तक जिस अनुच्छेद को हटाए जाने के खिलाफ एक साथ खड़ा हो गया है, वह अनुच्छेद 370 नहीं है, बल्कि वह है अनुच्छेद 35A. एक ऐसा अनुच्छेद, जो संविधान में है ही नहीं. आप संविधान उठाइए और खोज लीजिए. अनुच्छेद 35 के बाद आपको 35a तो मिलेगा, लेकिन 35A नहीं मिलेगा. और जो 35a. मिलेगा, उसका जम्मू-कश्मीर से कोई लेना-देना ही नहीं है. तो फिर यह बवाल है क्या? इसे समझने के लिए पहले 35A की कहानी समझ लीजिए.

अनुच्छेद 35A मूल संविधान में था ही नहीं. इसे 1954 में संविधान में डाला गया. यानी इसे एक संविधान संशोधन माना जाना चाहिए. लेकिन संविधान संशोधन के लिए अनुच्छेद 368 के तहत जिस प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था, उसके बजाय केवल राष्ट्रपति के आदेश (प्रेसिडेंशियल ऑर्डर) से इसे संविधान में शामिल कर लिया गया.

कायदे से जब भी किसी अनुच्छेद में संशोधन कर कोई उप-अनुच्छेद जोड़ा जाता है तो उसकी जगह मूल अनुच्छेद के नीचे होती है. इस लिहाज से 35A को अनुच्छेद 35 के नीचे रखा जाना चाहिए था, लेकिन इसे मूल संविधान से अलग परिशष्ट में डाला गया. जाहिर है तत्कालीन हुक्मराम नहीं चाहते थे कि देश इस अनुच्छेद के बारे में जाने या इस पर चर्चा करे. आखिर क्यों?

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90 साल पुरानी कहानी में छिपी जड़ें

इसके लिए यह समझना होगा कि 35A में है क्या और इसका मूल कहां से है. दरअसल अनुच्छेद 35A ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा को यह अधिकार देता है कि वह राज्य के मूल निवासियों की पहचान करे और उन्हें विशेषाधिकार दे. इस अनुच्छेद का मूल अब से लगभग 90 साल पहले जारी राजा हरि सिंह के आदेश में है.

पंजाबियों के राज्य में बड़ी संख्या में आने से डरे कश्मीरी पंडितों ने हरि सिंह से गुहार लगाई थी, जिसके बाद 1927 में हरि सिंह ने एक आदेश जारी कर बाहरी लोगों के राज्य में जमीन खरीदने और राज्य सरकार की नौकरियों में आवेदन करने पर रोक लगा दी थी.

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बाद में 1932 में एक और आदेश जारी किया गया, जिसके तहत 'विदेशियों' के जमीन खरीदने में कुछ रियायतें भी दी गईं. लेकिन मोटे तौर पर यही आदेश 35A के तौर पर संविधान में चोर दरवाजे से शामिल कर दिया गया और इसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया कि कश्मीर में रहने वाला कोई युवक देश के किसी भी हिस्से की लड़की से यदि शादी करता है, तो वह लड़की कश्मीर की स्थायी निवासी मान ली जाएगी.

लेकिन एक कश्मीरी लड़की यदि देश के दूसरे किसी हिस्से के लड़के से शादी करती है, तो उसे बाहरी माना जाएगा और उसका और उसके वंशजों का कश्मीर में उसकी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा.

चारू खन्ना की अपील से उठा मौजूदा विवाद

अनुच्छेद 35A पर मचे मौजूदा बवाल की जड़ में दरअसल उसका यही प्रावधान है. जम्मू की चारू वली खन्ना, जिन्हें उनकी पुश्तैनी जायदाद से इसलिए बेदखल कर दिया गया क्योंकि उन्होंने राज्य के बाहर शादी कर ली, ने इस अनुच्छेद को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

खन्ना का तर्क है कि यह अनुच्छेद संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है और इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए. पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस पर विचार कर रही है. जल्दी ही इस पर फैसला आना है. यही कारण है कि राज्य के सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों में हड़कंप मचा है.

दशकों बाद भी नहीं मिले मौलिक अधिकार

लेकिन यह हड़कंप मचा क्यों है? क्या केवल चारू वली खन्ना की पैतृक संपत्ति पर अधिकार का मुद्दा ही सबकी रातों की नींद उड़ा रहा है? नहीं. अनुच्छेद 35A के कारण कश्मीर में कई पीढ़ियां घोर अमानवीय यातनाओं का शिकार हुई हैं और हो रही हैं. यह केवल एक चारू खन्ना का मामला नहीं है. यह दरअसल हजारों ऐसे परिवारों को जीवन के मूलभूत अधिकार सौंपने का मसला है, जो सभी हिंदू हैं.

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1947 में देश के विभाजन के बाद पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से लाखों परिवार पंजाब, कश्मीर, हिमाचल, राजस्थान, बंगाल, दिल्ली इत्यादि राज्यों में आए. सारे राज्यों में आने वाले परिवार तुरंत प्रभाव से भारतीय नागरिक हो गए और जिन राज्यों में भी उन्होंने शरण ली, वहां के सारे अधिकार उन्हें मिल गए. लेकिन कश्मीर इसका अपवाद था. कश्मीर में बसने वाले ऐसे परिवारों की संख्या 5764 थी, जो भारतीय नागरिक तो बन गए, लेकिन कश्मीर के डोमिसाइल नहीं हो सके.

नतीजा यह हुआ कि उनके बच्चे आज 70 साल बाद भी राज्य सरकार की नौकरियों में आवेदन नहीं कर सकते. वो सारे लोग संसदीय चुनावों में तो वोट डालते हैं, लेकिन विधानसभा या स्थानीय निकायों के चुनाव में वे वोट नहीं डाल सकते. वो न कोई स्थानीय चुनाव लड़ सकते हैं, न अपना घर खरीद सकते हैं. ऐसी ही एक त्रासदी और है.

1957 में कश्मीरियों को सफाई कर्मचारियों की जरूरत पड़ी क्योंकि उन्हें लगा कि वो खुद का मल-मूत्र साफ नहीं कर सकते. इसके लिए राज्य की कैबिनेट ने एक खास फैसला किया. पंजाब से वाल्मीकि समाज के 200 परिवारों को लाकर राज्य में बसाया गया, इस शर्त के साथ कि वो केवल सफाई कर्मचारी की ही नौकरी करेंगे.

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अनुच्छेद 370 का अस्तित्व भी तय करेगा 35A का फैसला

आज 60 साल बाद भी उन परिवारों के युवक और बच्चे कश्मीर में प्रोफेसर, डॉक्टर या राज्य प्रशासन में नौकरी नहीं पा सकते. वो केवल सफाई कर्मचारियों की नौकरी की लिए ही योग्य हैं. इस घोर अमानवीय और असंवैधानिक व्यवस्था को चलाते रहने के लिए पीडीपी, हुर्रियत, कांग्रेस और वामपंथियों को अनुच्छेद 35A की जरूरत है.

ऐसे में यदि यह अनुच्छेद हटता है, तो यह कश्मीर के भारत की मुख्यधारा में शामिल होने की दिशा में एक अहम कदम होगा. यह ‘कश्मीरियत’ के छलावे और अलगाववाद को खत्म कर कश्मीर के ‘भारतीयता’ में विलय की पृष्ठभूमि तैयार करेगा. इसीलिए कश्मीर में यथास्थिति बनाए रखने के तमाम पैरोकार 35A हटने की संभावना से हलकान हुए जा रहे हैं. बहरहाल गेंद अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. लेकिन इतना तो तय है कि 35A के हश्र से ही अनुच्छेद 370 की जीवनरेखा भी तय हो जाएगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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