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उमा भारती शायद संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ भूल गईं

मंत्री जिस कार्य को करने का दावा कर रही हैं, वह आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है.

Updated On: Feb 13, 2017 08:30 AM IST

Aakar Patel

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उमा भारती शायद संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ भूल गईं

उमा भारती शायद भूल गईं कि उन्होंने संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी.

भारत में पदभार ग्रहण करते वक्त सभी मंत्री और प्रधानमंत्री यह शपथ लेते हैं, ‘मैं ईश्वर के नाम पर शपथ लेता हूं कि मैं संविधान के प्रति सत्यनिष्ठा और आस्था रखूंगा. मैं भारत की संप्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा, मैं निष्ठापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करूंगा...और मैं संविधान और कानून के अनुरूप बिना किसी भय या पक्षपात, ईर्ष्या या लगाव के लोगों के हितों के लिए कार्य करूंगा.’

पद और गोपनीयता की शपथ

यह शपथ संविधान के तीसरे शेड्यूल से ली गई है. गोपनीयता की एक शपथ भी मंत्रियों को दिलाई जाती है, ‘मेरे समक्ष लाए जाने वाले किसी मसले को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को संसूचित या प्रकट तब के सिवाय नहीं करूंगा जबकि ऐसा करना एक मंत्री के रूप में मेरे कर्तव्यों के निर्वहन के लिए अनिवार्य न हो.’

हमारे मंत्री और नेता संविधाने के प्रति निष्ठावान होने, जिसका मतलब है कि हर हाल में कानून को स्थापित रखना, की इस शपथ को कितनी गंभीरता से लेते हैं?

इस हफ्ते बीबीसी पर यह खबर आई, ‘एक भारतीय मंत्री ने कहा कि उन्होंने बलात्कारियों को अपनी जिंदगियां बख्श देने के लिए गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया था और पुलिस को इन्हें टॉर्चर करने का आदेश दिया था.’

उमा भारती के दावे

uma bharti

केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने दावा किया है कि उन्होंने बलात्कार के आरोपियों को उल्टा लटकाकर पिटवाया. खबरों के मुताबिक मंत्री ने कहा, ‘बलात्कारियों को पीड़ितों के सामने तब तक टॉर्चर करना चाहिए जब तक कि वे दया की भीख न मांगने लगें. बलात्कारियों को उल्टा लटकाकर खाल उधड़ने तक पीटना चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘इनके जख्मों पर नमक और मिर्च रगड़नी चाहिए ताकि इनकी चीखें निकलने लगें. माताओं और बहनों को यह देखना चाहिए ताकि उन्हें शांति मिल सके.’

आपराधिक कृत्य हैं मंत्री के दावे

मंत्री जिस कार्य को करने का दावा कर रही हैं, वह आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है. कानून और संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता है जो भारती ने किया है. संविधान में अपराध से निपटने की प्रक्रिया साफतौर पर बताई गई है.

पुलिस केस रजिस्टर करती है और इसकी जांच करती है. राज्य अभियोजन करता है और न्यायपालिका इसका निर्णय करती है. भारती जो बता रही हैं वह कानून का उल्लंघन है और इस तरह से उन्होंने कानून को अपने हाथ में लिया है.

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मंत्री अपनी ली शपथ के प्रति कितने गंभीर

हम यह बात मान सकते हैं कि भीड़ किसी अपराधी को पकड़ ले और बिना किसी ट्रायल के उसे सजा दे दे. लेकिन बतौर मंत्री ऐसा करना और इसे गर्व के साथ बताना यह साबित करता है कि भारत में कानून को किस तरह से लिया जाता है. इससे यह भी पता चलता है कि देश के मंत्री पद की शपथ को कितनी गंभीरता से लेते हैं.

दूसरी बात यह है कि बलात्कारियों के साथ सख्ती से पेश आने के ये दावे भारत में इस अपराध पर वास्तव में होने वाली कार्रवाइयों के बिलकुल उलट हैं.

न्याय के लिए भटक रहे रेप पीड़ित

2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों में गैंगरेप की एफआईआर करने वाले 7 पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिल सका है. एक महिला की मौत हो चुकी है, जबकि छह अन्य अपने लिए न्याय की तलाश में सिस्टम से लड़ रही हैं.

इन महिलाओं को उनके कथित बलात्कारियों द्वारा धमकाया गया है और इन्हें ऐसे लोगों से कोई सपोर्ट नहीं मिला है जो सेक्सुअल वॉयलेंस के खिलाफ अपने महान कार्यों का प्रचार कर रहे हैं.

दिल्ली में निर्भया मामले के बाद पूरे देश में एक जबरदस्त आंदोलन चला. इसके बाद कानून और प्रक्रिया में बदलाव किए गए ताकि इस तरह की घटनाओं की पीड़ितों को जल्द न्याय मिल सके.

जमीनी हालात जस के तस

हकीकत यह है कि धरातल पर कोई बदलाव नहीं हुआ है, जैसा कि मुजफ्फरनगर के गैंगरेप मामलों से भी साबित होता है. एक राज्य के तौर पर हम बलात्कारियों और सेक्सुअल वॉयलेंस में न्याय दिला पाने में पूरी तरह से नाकाम रहे हैं.

दूसरी ओर, हमारे सामने इस तरह के मंत्रियों के कानून को अपने हाथ में लेकर अपने तरीके से दंड देने के मामले आते हैं.

कानून का राज या मनमानी

supreme court

भारती शायद इस बात से परिचित भी नहीं होंगी कि जो वह कह रही हैं उससे वह संविधान का उल्लंघन कर रही हैं क्योंकि उन्हें भरोसा है कि जो उन्होंने जो किया, सही किया. और उनके जैसे लोगों के लिए सही का मतलब अनिवार्य तौर पर कानूनी तौर पर सही होने का नहीं है.

उन्होंने शपथ ली थी, ‘मैं हर दृष्टि से लोगों के हितों के लिए काम करूंगी.’

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अच्छे परिवारों से नहीं आते अपराधी

लेकिन, एक आरोपी और दोषी साबित हुए शख्स के बीच में एक ऐसे समाज में शायद कोई फर्क नहीं किया जाता है, जो कि मानता है कि कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अच्छे परिवारों से आते हैं.

जो लोग अच्छे परिवारों से नहीं आते हैं वे जन्म से बुरे हो सकते हैं और उन्हें इसके लिए सजा मिलनी चाहिए.

कानून का सभ्यता का विचार यही है कि यह आरोपी को सुरक्षा देता है और इसी वजह से हमारे पास वाक्य है, ‘दोषी सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है.’ लेकिन, यह हमारी मंत्री की दिखाई गई सोच के विपरीत है.

इस शपथ में पूरा फोकस ‘भारत की एकता और अखंडता पर है.’ यह पवित्र है और जो लोग इस भावना का उल्लंघन करने के आरोपी हैं, भले ही मौखिक रूप से, उन्हें दंड दिया जाना चाहिए और वह भी बना ट्रायल के.

इस शपथ का बाकी हिस्सा कि संविधान और भारत के कानून के प्रति निष्ठावान रहना प्रासंगिक है.

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