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लेनिन की मूर्ति का तोड़ा जाना कम्युनिस्ट निजाम की राजनीतिक असहिष्णुता के खात्मे की निशानी है

हिंसात्मक राजनीतिक के उफान के ड्रामें में सत्ता का बदलाव अंतिम कार्रवाई थी और मूर्ति का तोड़ा जाना एक तरह से भड़ास निकालने जैसी हरकत है.

Sreemoy Talukdar Updated On: Mar 07, 2018 12:35 PM IST

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लेनिन की मूर्ति का तोड़ा जाना कम्युनिस्ट निजाम की राजनीतिक असहिष्णुता के खात्मे की निशानी है

कानून के शासन वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासनहीन और बेलगाम तरीके से किसी मूर्ति को तोड़ना चिंताजनक बात है. यह बर्बररता और गुंडागर्दी को उजागर करता है. इस लिहाज से दक्षिणी त्रिपुरा में व्लादिमीर इलीइच लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त किए जाने की आवश्यक तौर पर निंदा की जानी चाहिए. हालांकि, कुछ राजनीतिक प्रतीक बेहद ताकतवर होते हैं. लेनिन की मूर्ति को जमींदोज किया जाना गुंडई का नमूना है और यह उंमत्त भीड़ के व्यवहार का इजहार है.

बर्बरता और कथित आक्रोश की इस हरकत को सीमित करने के लिए दूर और नजदीक के ऐतिहासिक पहलू को नजरअंदाज करना होगा. साथ ही, यह भी स्वांग करना होगा कि मूर्ति बनाने वालों और जिन्होंने इसे गिराया- दोनों को एक तरह से बराबर का मौका मिला हुआ था. हालांकि, ऐसा नहीं था. दरअसल, सत्ता की गैर-बराबरी, नैतिक मूल्यांकन के जरिए अहम कड़ियां छूट जाती हैं.

दक्षिणी त्रिपुरा के बेलोनिया में लेनिन की मूर्ति को 'भारत माता की जय' के नारों के बीच जमींदोज कर दिया गया. 25 साल के लेफ्ट का शासन खत्म होने और बीजपी के सत्ता में आने के 48 घंटों के भीतर ऐसा हुआ. त्रिपुरा के संदर्भ में बात करें तो हिंसात्मक राजनीतिक के उफान के ड्रामें में सत्ता का बदलाव अंतिम कार्रवाई थी और मूर्ति का तोड़ा जाना एक तरह से भड़ास निकालने जैसी हरकत है.

lenin-statue

लेनिन की मूर्ति का जमींदोज होना कम्युनिस्ट शासन के खात्मे का प्रतीक था

यहां लेनिन की मूर्ति का गिराया जाना न सिर्फ एक मूर्ति को जमींदोज किए जाने की तरफ इशारा करता है, बल्कि यह कम्युनिस्ट निजाम के प्रतीकात्मक खात्मे को भी दिखाता है, जिसने सत्ता पर पकड़ बनाए रखने और राजनीतिक चुनौतियों से निपटने की खातिर हिंसा को औजार की तरह इस्तेमाल किया. कम्युनिस्ट शासन ने देशभर और पूरी दुनिया में पिछले कई वर्षों में इसी तरीके से काम किया है. ऐसे में जब उनके अधिनायकवादी शासन का अंत होता है, तो उनसे जुड़े प्रतीकों पर भी हमले होते हैं.

यहां यह दलील दी जा सकती है कि भारत एक लोकतंत्र हैं और यहां जनता द्वारा नेता चुने जाते हैं, न कि पार्टी कांग्रेस के जरिए. लिहाजा, किसी निजाम को वोट के जरिए सत्ता से बाहर करना ही गुस्से का सबसे बेहतर इजहार है, न कि गैर-कानूनी व्यवहार. इसके बावजूद इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कम्युनिस्ट ताकतें भारत में भले ही लोकतांत्रिक माध्यम से सत्ता हासिल करती हैं, लेकिन बाद में वे हिंसा को संस्थागत स्वरूप देकर और वोटरों के व्यवहार को बदलकर लोकतंत्र को कमजोर कर देते हैं. वे जनता पर लगाम कसकर और उन्हें डराने के लिए हिंसा का इस्तेमाल कर ऐसा करते हैं. साथ ही, एक खास विचारधारा से लैस संभ्रात लोगों की सेना तैयार करते हैं, जो अपनी तानाशाही की गतिविधियों को बौद्धिक वजन मुहैया कराते हैं.

सॉफ्ट पावर के ठिकानों को नियंत्रित कर और शिक्षा व्यवस्था को अपने हिसाब से गढ़ते हुए सिलसिलेवार तरीके से इसे अंजाम दिया जाता है. शुरुआत में ही विचारधारा थोप देना स्वतंत्र और आलोचनात्मक नजरिए वाली सोच को रोकने का सबसे आसान तरीका है. कम्युनिस्ट स्वतंत्र सोच को खतरा मानते हैं. बंगाल में इस मॉडल को तैयार किया गया और बाकी जगहों पर इसे दोहराया गया. बंगाल में अपने तीन दशकों की सत्ता में वाम मोर्चे ने ब्रेनवॉशिंग (विचारों को थोपने) को कला का एक स्वरूप बना दिया.

वामपंथी नेताओं ने छठी क्लास तक अंग्रेजी को सिलेबस से हटा लिया, जबकि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ रहे थे. इससे कृत्रिम खाई पैदा हुई. गड़बड़ शिक्षा नीति के कारण यह खाई और चौड़ी हुई. ममता बनर्जी द्वारा 2011 में वाम मोर्चे के लगातार 34 साल के शासन को खत्म किए जाने के बाद अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने लिखा था, पहली वाम सरकार ने बंगाल के हर प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल पर नियंत्रण हासिल करने का लक्ष्य तय किया था.इस नियंत्रण के जरिए स्कूलों में ही पार्टी काडरों की भर्ती होने लगी, जो वाम के समर्थन की रीढ़ बन गए.कम्युनिस्टों का मकसद शैक्षिक संस्थानों (स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक) पर नियंत्रण बनाए रखना था.

वामपंथी नेताओं ने यूनियन के जरिए संस्थानों में घुसपैठ करने पर जोर दिया. इससे उनके समर्थन का आधार मजबूत हुआ. जानकार अनिर्बाण गांगुली लिखते हैं, कम्युनिस्ट पार्टी का लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में बेहद खून-खराबा वाला दौर रहा. स्वराज्यमग के लिए अपने लेख में वह पांच ऐसी घटनाओं का जिक्र करते हैं, जो बंगाल में हिंसा की पद्धति की तरफ इशारा करते हैंः 1970 में सेनबारी हत्याकांड, 79 में मरीचझंपी नरसंहार, आनंदमार्गी साधुओं को जिंदा जलाया जाना (82), 2000 में ननूर हत्याकांड और 2007 में नंदीग्राम फायरिंग.

सेनबारी में जुल्म की एक घटना के तहत एक मां को अपने बेटे के खून से सना चावल खाने को मजबूर किया गया था, जिसकी हत्या कर दी गई थी. इस वजह से महिला का मानसिक संतुलन बिगड़ गया. पश्चिम बंगाल, केरल और यहां तक कि त्रिपुरा की हत्याओं की जमीन में ऐसी कई कहानियां छिपी हैं. हालांकि, सवाल यह है कि वे क्यों छिपी हैं?

यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिनिस्टर, लंदन के देबदत्त चौधरी ने भारत में शरणार्थी पुनर्वास के इतिहास में सबसे ज्यादा नरसंहारों  से जुड़े अपने रिसर्च पेपर में लिखा है, 'मरीचझपी जैसी घटनाएं सबालटर्न विमर्श का हिस्सा हैं, जिसके बारे में न तो संभ्रांत राष्ट्रवादी इतिहास-भूगोल के जानकार बताते हैं और न ही मौजूद मौजूद सबालटर्न स्कूल इस बारे में जानकारी देते हैं'.

Communist Party Of India CPI Cpim

हिंसा भरे इतिहास को साफ करने में कम्युनिस्टों का कोई जवाब नहीं

हिंसा की ये गतिविधियां हमारे आधिकारिक इतिहास से छुपी हैं, क्योंकि अतीत को साफ करने में कम्युनिस्टों का कोई जवाब नहीं है. दुनिया के सबसे हिंसात्मक, क्रूर कम्युनिस्ट निजामों, जिसने लाखों की हत्या करवाई, उसने इतने असरदार तरीके से इसे अंजाम दिया कि मौत की परंपरा के ये नेता अब भी दुनिया की जानी-मानी शख्सियतें हैं और अकादमिक जगत के खोखले हलकों और आम तौर पर भी इन्हें सम्मान की नजर से देखा जाता है.

एडोल्फ हिटलर ने शवों का ढेर छोड़ा, ताकि अन्य खलनायक की तरह इस शख्स की पहचान कर सकें. माओत्से तुंग ने चीन के अतीत के बड़े हिस्से को मिटा दिया और इस तरह से हमेशा के लिए उसका डीएन बदल दिया. लुजिया लिम के शब्दों में कहें, तो तुंग ने चीन को 'भुलक्कड़ लोगों का गणराज्य' बना दिया.

फॉरेन अफेयर्स में ऑरविले शेल लिखते हैं कि माओ की 'स्थाई क्रांति' ने 'करोड़ों लोगों की जान' ली. हालांकि, आधिकारिक या गैर-आधिकारिक तौर पर इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. न तो उन लाखों लोगों का कोई हिसाब है, जिनकी हत्या कर दी गई और न ही उन लाखों लोगों के बारे में कुछ पता है, जिन्हें लेबर कैंप में भेज दिया गया.

लेख के मुताबिक, 'सेंट्रल प्रोपगेंडा डिपार्टमेंट को सरकार के अन्य विभागों के साथ मीडिया पर सेंसरशिप कायम करने और यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी जाती है कि शिक्षा से जुड़ी सभी सामग्री यानी किताबों में पार्टी की लाइन का पालन किया जाए. इन किताबों में चीन की अतीत के सभी क्षेत्रों को सील कर दिया गया है.'

लेखक ने बागी चीनी बुद्धिजीवी फांग लिझी के काम के हवाले से भी लिखा है. लिझी ने 1990 में लिखा था कि 'कम्युनिस्ट पार्टी का मकसद जोर-जबरदस्ती से पूरे समाज को इतिहास के बारे में भुला देना है, खास तौर पर चाइनीज कम्युनिस्टी पार्टी के सही इतिहास के बारे में....पूरे समाज को लगातार भुलावे में रखने की खातिर ऐसी नीति की जरूरत होती है, जिसमें वैसे इतिहास को किसी भी भाषण, किताब, दस्तावेज या अन्य माध्यम में शामिल नहीं किया जाता है, जो चीनी कम्युनिस्टों के हित में नहीं हो'.

Protest in Bengaluru

ब्लादिमीर लेनिन इसी हिंसात्मक विचार में विश्वास करते थे और उनकी मूर्ति इसी विचारधारा की नुमाइंदगी करती थी और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट निजाम इसी का प्रचार-प्रसार करता था. त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति जमींदोज होने के बाद से जो 'पवित्र आक्रोश' उभरा है, वह कम्युनिस्ट के इतिहास और वामपंथ के पोस्टर बॉय लेनिन की इसमें भूमिका से पूरी तरह अनभिज्ञ है.

रॉबर्ट गेलेटली अपनी किताब 'किलर्स विद आइडियालॉजीज (लेनिन स्टालिन एंड हिटलर)' में लिखते हैं कि हमेशा की तरह इतिहास के पूरे दायरे को इस कदर साफ कर दिया गया है कि एक 'विक्षिप्त जन हत्यारे' को हमारे सामने एक 'बेहतरीन शख्स' के तौर पर पेश किया गया है. रिचर्ड पाइन की किताब 'अननोन लेनिन' (1996) और रॉबर्ट सर्विस की लेनिन (2000) में 'वास्तविक, क्रूर लेनिन' के बारे में विस्तार से बताया गया है.

क्या थी कम्युनिजम की विचारधारा

'द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म' में कम्युनिस्ट शासन की बर्बरता के बारे में विस्तार से बताया गया है. इसमें तथ्यों और सबूतों के हवाले से कहा गया है कि इसके दौरान बड़े पैमाने पर हुई हत्याएं का आंकड़ा निश्चित तौर पर हिटलर द्वारा अंजाम दिए नरसंहारों के मुकाबले ज्यादा है. रॉबर्ट फुलफोर्ड ब्लैक बुक पर लिखते हैं कि 'कम्युनिस्ट विचाराधारा ने इतिहास में आगे की तरफ बड़े कदम का वादा किया और इसके उलट अतीत के अंधेरे की तरफ वापसी सुनिश्चित की, यानी हालात बद से बदतर हुए.ज्यादातर राजा और जार हत्यारे थे, लेकिन लेनिन की क्रांति ने पहले कुछ हफ्तों में ही उससे ज्यादा लोगों की हत्या कर दी, जितनी जारों ने पूरी 19वीं सदी में की थीं.

जर्मनी में नाजियों द्वारा किए गए नरसंहार और कम्युनिस्ट शासन में हुई हत्याओं को लेकर एक दिक्कत यह है कि प्रचलित विमर्श में नस्लीय घृणा को वर्गीय घृणा से ज्यादा खतरनाक माना गया है, मानो यह हत्या के शिकार और उनके सगे-संबंधियों के लिए कुछ सांत्वना की बात होगी. नाजियों के अपराध को लेकर जहां पश्चाताप और अपराध के लिए प्रायश्चित करने की बात होती है, वहीं कम्युनिस्ट हिंसा को ताकतवर के खिलाफ दबे-कुचले लोगों की प्रतिक्रिया के तौर पर सही ठहराया जाता है.

लोग खुद के बारे में बेहतर महसूस कर सकें, इसके बेहतर संकेत के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा मानवीय आवश्यकताओं से जुड़ती है. लेनिन की मूर्ति को हटाया जाना अन्य मामलों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. हर वैचारिक बदलाव में एक एक अहम सूत्र की जरूरत होती है. सत्यजीत रे की बच्चों की मशहूर फिल्म 'हीरक राजार देशे' (हीरा बादशाह के देश में) आम लोग एक तानाशाह के बर्बर शासन की मूर्ति को गिराकर उसका प्रतीकात्मक अंत करते हैं. इस फिल्म की राजनीतिक व्यंग के तौर पर पेश किया जा सकता है. हर बंगाली इन पंक्तियों को दिल से जानता हैः डोरी धोरे मारो तान/राजा होबे खान खान (रस्सी खींचो और राजा की मूर्ति जमींदोज कर दो). बंगलाभाषी त्रिपुरा भी इन पंक्तियों की अहमियत समझता होगा.

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