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त्रिपुरा बीजेपी: ‘चलो पालटाई’ का फॉर्मूला या ‘सबका साथ सबका विकास’

बीजेपी की बड़ी चुनौती बंगाली और आदिवासी समुदायों को साथ लाना है

Amitesh Amitesh Updated On: Mar 06, 2018 06:29 PM IST

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त्रिपुरा बीजेपी: ‘चलो पालटाई’ का फॉर्मूला या ‘सबका साथ सबका विकास’

त्रिपुरा बीजेपी अध्यक्ष बिप्लब देब को बीजेपी विधायक दल का नेता चुन लिया गया है. बिप्लब देब को 9 मार्च को त्रिपुरा के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी. जबकि जिश्नु देबबर्मा उपमुख्यमंत्री होंगे.

बीजेपी की इस रणनीति से साफ है कि बीजेपी त्रिपुरा में सबको साथ लेकर चलने की तैयारी कर रही है. बीजेपी बंगाली समुदाय से आने वाले बिप्लब देब को मुख्यमंत्री पद पर बैठाकर एक साथ कई निशाने साधना चाहती है.

बिप्लब देब युवा नेता हैं. संघ के साथ-साथ बीजेपी आलाकमान के करीबी हैं. दिल्ली के नेताओं का आशीर्वाद भी उनको प्राप्त है. ऐसे में एक भरोसेमंद युवा नेता को नायक बनाकर बीजेपी ने त्रिपुरा जैसे लाल दुर्ग को फतह करने के बाद अब सबको साधने की कोशिश कर रही है.

बंगाली समुदाय के बिप्लब देब को मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी की इसी सोच को दिखाता है. बीजेपी की रणनीति से साफ है कि त्रिपुरा के बाद उसकी नजर अब बंगाल पर है. हालाकि बंगाल में लेफ्ट का किला ध्वस्त हो चुका है. वहां अब ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी की सरकार है. लेकिन, लेफ्ट और कांग्रेस से आगे निकलकर बीजेपी बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के तौर पर सामने आ गई है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा की जीत के बाद मिशन बंगाल को लेकर अपनी रणनीति का इशारा भी कर दिया है. ऐसे में बीजेपी त्रिपुरा में बंगाली समुदाय के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाकर बंगाल को भी साधना चाहती है.

Tripura Assembly elections results

दूसरी तरफ, बीजेपी की दो-तिहाई से भी ज्यादा सीटों पर मिली जीत में त्रिपुरा की आदिवासी बहुल सीटों पर मिली जीत का बड़ा योगदान है. आदिवासी समुदाय में पैठ रखने वाली पार्टी आईपीएफटी के साथ समझौते का इस बड़ी जीत में बड़ा योगदान है.

आदिवासी बहुल इलाकों में 20 में से 18 सीटों पर मिली जीत से साफ हो गया है कि इस बार चुनाव में बीजेपी और आईपीएफटी गठबंधन को आदिवासी समाज का एकतरफा समर्थन मिला है.

आईपीएफटी ने चुनाव परिणाम आने के बाद किसी आदिवासी को त्रिपुरा का मुख्यमंत्री बनाने की मांग रख दी थी. सरकार बनने के पहले ही इसे गठबंधन में खींचतान के तौर पर देखा गया. लेकिन, बीजेपी ने आदिवासी समुदाय के जिश्णु देबबर्मा को डिप्टी सीएम बनाने का फैसला कर आदिवासी समुदाय को खुश करने की कोशिश की है.

दरअसल, त्रिपुरा में हमेशा बंगाली समुदाय बनाम आदिवासी समुदाय की तनातनी रही है. ऐसी सूरत में बंगाली समुदाय के वयक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के बाद आदिवासी समुदाय के व्यक्ति को उपमुख्यमंत्री बनाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि किसी की उपेक्षा नहीं की जा रही है. आईपीएफटी का विरोध भी इससे शांत हो जाएगा.

मुख्यमंत्री के अलावा उपमुख्यमंत्री भी बीजेपी के पुराने कार्यकर्ता हैं. त्रिपुरा की एसटी सुरक्षित सीट चारीलाम से जिश्णु देबबर्मा बीजेपी के उम्मीदवार हैं. इस सीट पर सीपीएम उम्मीदवार नारायण देबबर्मा के निधन के चलते चुनाव नहीं हो पाय था. अब यहां 12 मार्च को चुनाव होना है. लेकिन, उसके पहले ही जिश्णु देबबर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाया जा रहा है.

लेकिन, एक बात साफ है बीजेपी ने अपनी ही पार्टी के जनजातीय नेता को उपमुख्यमंत्री पद पर बैठाने का फैसला कर आदिवासी समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाने की पूरी कोशिश की है. यह बीजेपी की दूरगामी रणनीति का परिणाम है जिसके तहत वो आईपीएफटी के अलावा भी अपने-आप को मजबूत करना चाहती है. संघ परिवार का आदिवासी इलाकों में चलाया जा रहा जनकल्याणकारी कार्यक्रम तो पहले से ही चल रहा है.

बीजेपी के लिए त्रिपुरा की जीत उसकी स्वीकार्यता और विचारधारा के स्तर पर बडी जीत माना जा रहा है. इस जीत ने दक्षिणपंथ बनाम वामपंथ की सीधी लडाई में वामपंथ को पहली बार पटखनी दी है.

Tripura Lenin Idol

पीएम मोदी ने भी बीजेपी संसदीय दल की बैठक में त्रिपुरा की जीत को विचारधारा की जीत बताया है. उन्होंने कहा कि ‘बहुत सारे लोग इसे त्रिपुरा को छोटा राज्य कहकर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं कि यह छोटा राज्य है. वहां लोकसभा की सीटें ही कितनी हैं. लेकिन, यह लोकसभा की सीट की नहीं विचारधारा की लड़ाई की बड़ी जीत है.’

प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के सांसदों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘देश का कोई भी हिस्सा परिवर्तन की आग में जल रहा हो, वहां परिवर्तन हो तो ये स्वागतयोग्य है.’

बीजेपी ने चुनाव के दौरान त्रिपुरा में परिवर्तन कर दिया है. चलो पालटाई का उसका नारा अब साकार हो चुका है. लेकिन, लंबे वक्त तक इस दुर्ग को बचाने और आगे बंगाल में भी फतह करने के लिए उसे सबका साथ सबका विकास के नारे को ही ध्यान में रखकर चलना होगा. प्रधानमंत्री मोदी का सबका साथ सबका विकास का सपना तभी साकार हो सकता है जब सही मायने में ऐसा हो. वरना बदले की भावना से की गई कार्रवाई और लेनिन की प्रतिमा तोड़ने जैसी घटना सबका साथ सबका विकास के सपने में बड़ा रोड़ा बन सकते हैं.

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