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त्रिपुरा चुनाव 2018: वाम मोर्चा के खिलाफ ‘नेडा’ नहीं, बीजेपी ने खोल रखा है मोर्चा

बीजेपी मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा में अपनी पैठ बनाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है. इन तीनों राज्यों में बीजेपी को नेडा के क्षेत्रीय सहयोगियों से खासी उम्मीदें हैं

Armstrong Chanambam Updated On: Feb 10, 2018 03:12 PM IST

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त्रिपुरा चुनाव 2018: वाम मोर्चा के खिलाफ ‘नेडा’ नहीं, बीजेपी ने खोल रखा है मोर्चा

पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा में चुनावी सरगर्मियां जोरों पर हैं. जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राज्य में सियासी पारा चढ़ता जा रहा है. राजनीतिक दलों के बीच जहां जोड़-तोड़ और शह-मात का खेल पराकाष्ठा पर है, वहीं हर नुक्कड़ हर गली में आम जनता भी चुनावी चर्चा में व्यस्त है. हर कोई अपनी पसंदीदा पार्टी और उम्मीदवार की जीत के दावे और दलीलें पेश कर रहा है.

त्रिपुरा में 18 फरवरी को वोट डाले जाएंगे और 3 मार्च को नतीजों का ऐलान होगा.

उत्तर-पूर्व के 5 राज्यों में बीजेपी के नेतृत्व वाला नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनईडीए) सत्ता में है. इन 5 राज्यों में से 3 में बीजेपी की सरकारें हैं. त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने राज्य की जनजातीय पार्टी इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ भी गठबंधन किया है. वहीं इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के विभाजित गुट आईपीएफटी-तिपराहा के सभी प्रमुख नेता 1 फरवरी को बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. हालांकि, उनमें से कोई भी नेता चुनाव नहीं लड़ रहा है. लिहाजा यह स्पष्ट हो गया है कि, त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस बार विपक्षी दलों का नेतृत्व नेडा (एनईडीए) नहीं बल्कि बीजेपी कर रही है. ऐसा इसलिए, क्योंकि नेडा में शामिल होने को लेकर राज्य की किसी भी जनजातीय पार्टी की स्थिति साफ नहीं है.

नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस यानी 'नेडा' का गठन मई 2016 में हुआ था. नेडा के गठन का मकसद पूर्वोत्तर के राज्यों के सामूहिक हितों की रक्षा और क्षेत्र में गैर-कांग्रेसी दलों को एकजुट करना था.

IPFT-INPT का दावा, राज्य की कोई भी जनजातीय राजनीतिक पार्टी नेडा की सदस्य नहीं

जबकि आईपीएफटी और इंडीजिनस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा (आईएनपीटी) के नेताओं ने दावा किया है कि, राज्य की कोई भी जनजातीय राजनीतिक पार्टी नेडा की सदस्य नहीं है. असम के वित्त मंत्री और नेडा के संयोजक हेमंत बिस्वा सरमा ने भी उनके दावे पर मुहर लगाई है.

त्रिपुरा की दोनों ही मुख्य जनजातीय पार्टियां आईपीएफटी और आईएनपीटी अरसे से अलग राज्य की मांग कर रही हैं. राज्य में सत्तारूढ़ सीपीएम के सामने दोनों ही पार्टियां दशकों से विपक्ष की भूमिका निभाती आ रही हैं.

manik sarkar

त्रिपुरा में बीते 25 साल से सीपीएम की सरकार है और माणिक सरकार यहां के मुख्यमंत्री हैं

बीजेपी ने त्रिपुरा में आईपीएफटी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया है. अलग राज्य की मांग पर अड़ी पार्टी के साथ गठबंधन कर के भगवा पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि, वह राज्य की वाम मोर्चा सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए कितनी बेताब है. हालांकि बीजेपी ने इस बार राज्य में अपनी पूर्व सहयोगी आईएनपीटी को साथ नहीं लिया है. त्रिपुरा में बीजेपी के चुनाव प्रचार अभियान की कमान संभाल रहे लोगों का कहना है कि, सीटों के बंटवारे पर विवाद के चलते आईएनपीटी के साथ गठबंधन नहीं करने का फैसला लिया गया. राज्य में आईएनपीटी का जनाधार तेजी से कम हो रहा है, इसके बावजूद उनकी तरफ से बहुत ज्यादा सीटों की मांग की गई थी. जबकि बीजेपी ने बीके ह्रंगखावल की अगुवाई वाली आईएनपीटी को महज एक या दो सीटों की ही पेशकश की थी.

बीजेपी के त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर ने बताया कि, 'हमने आईएनपीटी से गठबंधन करने का अनुरोध किया था, लेकिन सीटों की संख्या को लेकर उनकी मांग बहुत ज्यादा (6 सीट) थी. इसलिए हम उनके साथ गठबंधन नहीं कर सके.'

सुनील देवधर को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का करीबी माना जाता है. वह काफी वक्त से त्रिपुरा में बीजेपी के लिए जमीन तैयार करने में जुटे हैं. राज्य में पार्टी का जनाधार बढ़ाने में देवधर को खासी कामयाबी भी मिली है.

बीजेपी-आईपीएफटी गठबंधन दो-तिहाई बहुमत के साथ अगली सरकार बनाएगा

देवधर त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को लेकर काफी आश्वस्त हैं. आत्मविश्वास से लबरेज देवधर का कहना कि बीजेपी-आईपीएफटी गठबंधन दो-तिहाई बहुमत के साथ राज्य में अगली सरकार बनाएगा. देवधर के मुताबिक अगर आईएनपीटी भी हमसे हाथ मिला लेती तो दोनों पार्टियों को फायदा होता. देवधर का दावा है कि जो मतदाता पहले आईएनपीटी के प्रति निष्ठावान थे, वो अब पाला बदलकर बीजेपी या आईपीएफटी के समर्थन में आते जा रहे हैं.

PM Modi in Tripura

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगरतला में रैली कर सीपीएम सरकार को त्रिपुरा के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार ठहराया (फोटो: पीटीआई)

त्रिपुरा में बीजेपी और आईपीएफटी क्रमश: 11 और 9 आरक्षित आदिवासी सीटों पर चुनाव लड़ रही है. त्रिपुरा विधानसभा की कुल 60 सीटों में से 20 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि 10 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं.

त्रिपुरा में बीजेपी की चुनावी तैयारियों पर नजर रख रहे लोगों ने देवधर के दावों पर अपनी सहमति जताई है. इन लोगों का भी मानना है कि, वाम मोर्चे के विरोधी और आईएनपीटी के समर्थक इस बार अपना वोट बीजेपी-आईपीएफटी गठबंधन को देंगे. क्योंकि वाम मोर्चे के खिलाफ फिलहाल यही गठबंधन मजबूत दावेदार नजर आ रहा है. हालांकि आईएनपीटी 15 आरक्षित आदिवासी सीटों से चुनाव लड़ रही है. वहीं उसने त्रिपुरा नेशनल कॉन्फ्रेंस को 3 सीटें आवंटित की हैं.

आईएनपीटी के अध्यक्ष बीके ह्रंगखावल ने बीजेपी पर आखिरी वक्त में साथ छोड़ने का आरोप लगाया है. ह्रंगखावल का यह भी कहना है कि बीजेपी उनकी पार्टी को कमजोर और कमतर आंक रही है. ह्रंगखावल ने बीजेपी से अलगाव की वजह का भी खुलासा किया. ह्रंगखावल के मुताबिक उनकी पार्टी ने बीजेपी को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें 6 सीटों की मांग की गई थी. चिट्ठी में कहा गया था कि अगर आईएनपीटी 6 से कम सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो चुनाव आयोग से पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द हो सकता है. लेकिन बीजेपी ने इस तथ्य पर गौर करना तक मुनासिब नहीं समझा और साफ इनकार कर दिया. बीजेपी के इस रवैए के चलते ही ह्रंगखावल ने भगवा पार्टी से दूरी बना ली. क्योंकि ह्रंगखावल को आईएनपीटी का बीजेपी में विलय करने के बजाए गठबंधन से बाहर निकलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

नेडा में आईपीएफटी और आईएनपीटी की हैसियत पर संशय

बुजुर्ग जनजातीय नेता ह्रंगखावल ने कहा कि, उनकी पार्टी आईएनपीटी कभी भी नेडा की सदस्य नहीं रही है. और न ही कभी उनकी पार्टी के किसी नेता ने नेडा की किसी बैठक में हिस्सा लिया है. नेडा के संयोजक हेमंत बिस्वा सरमा का भी कहना है कि, त्रिपुरा की कोई भी क्षेत्रीय पार्टी अभी तक नेडा की सदस्य नहीं है. हालांकि, इस संबंध में पिछले साल प्रकाशित कुछ मीडिया रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयान करती हैं. नेडा में आईएनपीटी की सदस्यता पर सवाल का जवाब देने में सरमा टाल-मटोल करते नजर आए. सरमा ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि उनके पास आईएनपीटी से संचार का कोई संपर्क नहीं है.

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हेमंत बिस्वा सरमा (फोटो: फेसबुक से साभार)

हालांकि, बीजेपी के कुछ लोगों ने स्पष्ट किया कि नेडा महज एक चुनावी सौदा नहीं है, बल्कि यह प्लेटफॉर्म तो कहीं बड़े उद्देश्य के लिए है. बीजेपी के इन्हीं कुछ लोगों का कहना है कि आईएनपीटी यकीनन गठबंधन का हिस्सा हुआ करती थी. मानवाधिकार कार्यकर्ता एंथनी देव वर्मन ने बताया कि 2 जनजातीय पार्टियों को नेडा की बैठकों में आमंत्रित किया गया था, लेकिन कोई भी यह नहीं जानता है कि वो औपचारिक रूप से गठबंधन की सदस्य हैं या नहीं.

पिछले साल सितंबर में नेडा की बैठक में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी हिस्सा लिया था. बैठक के दौरान शाह ने उम्मीद जताई थी कि पूर्वोत्तर में सभी 8 मुख्यमंत्री एनडीए के होंगे. बीजेपी पूर्वोत्तर के 3 राज्यों- असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में सत्ता में है. जबकि नगालैंड और सिक्किम में बीजेपी की सहयोगी पार्टियों का शासन है. मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में इस महीने के अंत में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. वहीं मिजोरम की सत्ता पर वर्तमान में कांग्रेस काबिज है.

मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा में अपनी पैठ बनाने के लिए बीजेपी पुरजोर कोशिश कर रही है. इन तीनों राज्यों में बीजेपी को नेडा के क्षेत्रीय सहयोगियों से खासी उम्मीदें हैं. लेकिन बीजेपी की हिंदुत्व छवि को देखते हुए ईसाई बहुल्य मेघालय और नागालैंड में ऐसा संभव होता नजर नहीं आ रहा है. मेघालय में नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) ने चुनाव के मद्देनजर बीजेपी से दूरी बना ली है. वहीं नागालैंड में सत्ताधारी नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) ने हाल ही में बीजेपी के साथ अपने 20 साल पुराने गठबंधन को खत्म कर लिया है. इन नाकामियों को देखते हुए बीजेपी अब त्रिपुरा पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है.

mbasa : BJP President Amit Shah addresses an election rally in Ambasa, Tripura on Sunday. PTI Photo (PTI1_7_2018_000092B)

त्रिपुरा के अंबासा में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

आईपीएफटी का गठबंधन सिर्फ चुनाव तक सीमित

त्रिपुरा में राजनीतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहे हैं. बीजेपी और 2 क्षेत्रीय पार्टियां हर दूसरे दिन अपने रुख से पलट रही हैं. बीजेपी-आईपीएफटी का गठजोड़ काफी हद तक बेमेल नजर आता है. दोनों ही पार्टियों के गठबंधन का आधार बहुत असुविधाजनक है. क्योंकि ट्विपरलैंड के मुद्दे पर दोनों ही पार्टियों के विचार एक-दूसरे के खिलाफ हैं. बीजेपी जहां अविभाजित त्रिपुरा के पक्ष में खड़ी है, वहीं आईपीएफटी एक अलग राज्य की मांग पर अड़ी है.

आईपीएफटी के अध्यक्ष एनसी देबबर्मन ने जोर देकर कहा है कि, आईएनपीटी के साथ छोड़ने के बाद बीजेपी ने उनकी पार्टी से चुनावी गठबंधन करने के लिए संपर्क किया था. राज्य में बीजेपी की मौजूदा साख और राजनीतिक कौशल को देखते हुए उन्होंने भी साथ मिलकर चुनाव लड़ने की उत्सुकता दिखाई. देबबर्मन ने स्पष्ट किया कि बीजेपी के साथ आईपीएफटी का चुनावी समझौता केवल वाम मोर्चा सरकार को बेदखल करने के लिए हुआ है. देबबर्मन के मुताबिक अगर बीजेपी ने राज्य में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई, लेकिन आईपीएफटी की मांग पूरी नहीं की, तो वो भगवा पार्टी से समर्थन वापस ले लेंगे.

बीजेपी और आईपीएफटी के गठबंधन के बाद दोनों पक्षों का संयुक्त बयान भी जारी हो चुका है. लेकिन संयुक्त बयान जारी होते वक्त आईपीएफटी का कोई भी नेता मौके पर मौजूद नहीं था. इस घटना से बीजेपी-आईपीएफटी गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं. आईएनपीटी के मुखपत्र चिनी कोक के संपादक श्रोतोतारंजन खिसा का दावा है कि, आईपीएफटी सिर्फ जनजातीय लोगों को गुमराह कर रही थी, वह अलग राज्य की मांग पहले ही छोड़ चुकी है.

(लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101 रिपोर्टर्स डॉट कॉम के सदस्य हैं)

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