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तीन तलाकः अब बदल गए हैं शाहबानो मामले में राजीव को सलाह देने वाले एम जे अकबर

स्कूल में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के जूनियर और संजय गांधी के सीनियर रहे वरिष्ठ अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह ने शाहबानो प्रकरण के दौरान एम जे अकबर की भूमिका पर फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत की है

Updated On: Jan 07, 2018 09:27 AM IST

Ajaz Ashraf

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तीन तलाकः अब बदल गए हैं शाहबानो मामले में राजीव को सलाह देने वाले एम जे अकबर

लोकसभा में ट्रिपल तलाक बिल पेश करते वक्त दिए भाषण के लिए विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर की खूब तारीफ हुई. अकबर का यह भाषण शाहबानो प्रकरण में उनके स्टैंड के ठीक उलट था. ऐसा माना जाता है कि एम जे अकबर ने ही राजीव गांधी को इस बात के लिए राजी किया था कि वो संविधान में संशोधन करके शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दें.

आखिर अकबर ने उस वक्त राजीव गांधी को इस फैसले के लिए कैसे राजी किया, इस बात को जानने के लिए हमने वजाहत हबीबुल्लाह से बात की. वजाहत हबीबुल्लाह आईएएस से रिटायर होने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त रहे. फिर वो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे. 1986 में शाहबानो विवाद के दौरान वजाहत हबीबुल्लाह पीएमओ में काम कर रहे थे. वो अकबर और राजीव गांधी के बीच हुई बातचीत के गवाह रहे थे.

पेश हैं वजाहत हबीबुल्लाह से फ़र्स्टपोस्ट की बातचीत के प्रमुख अंश-

फ़र्स्टपोस्ट- ट्रिपल तलाक बिल पर लोकसभा में एम जे अकबर के भाषण पर आपकी प्रतिक्रिया क्या थी ?

वजाहत हबीबुल्लाह- मेरी प्रतिक्रिया ये थी कि अकबर का भाषण विवादित था, जैसा कि अक्सर नेताओं का होता है. जहां तक ट्रिपल तलाक बिल का सवाल है, इस पर काफी विवाद हो चुका है. लेकिन इस मुद्दे पर कानून बनाना एक अहम कदम है. मैं इसका स्वागत करता हूं.

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फ़र्स्टपोस्ट- लेकिन अकबर के भाषण के तथ्यों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया थी ?

वजाहत हबीबुल्लाह- अकबर ने अपनी पार्टी यानी बीजेपी की लाइन के हिसाब से भाषण दिया.

MJ AKBAR

फ़र्स्टपोस्ट- लेकिन अकबर के विचार 1986 में उनकी राय के ठीक उलट थे. जैसा कि आप ने 2016 में द हिंदू अखबार में लिखा था. उस लेख में आपने लिखा था कि अकबर ने राजीव गांधी को इस बात के लिए राजी किया था कि वो शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान संशोधन के जरिए पलट दें. उस विधेयक का नाम मुस्लिम महिला तलाक अधिकार संरक्षण बिल 1986 था. क्या हुआ था ?

वजाहत हबीबुल्लाह- जब शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया तो प्रधानमंत्री के दफ्तर में इसके खिलाफ कई अर्जियां आई थीं. इनमें से ज्यादातर मुस्लिम धर्मगुरुओं की थीं. जो इस फैसले के खिलाफ थे. मैं उस वक्त प्रधानमंत्री के दफ्तर में संयुक्त सचिव था. ये अर्जियां मेरे पास ही आती थीं, क्योंकि राजीव गांधी के पीएमओ में मैं अल्पसंख्यकों के मामले देख रहा था.

मैंने इन अर्जियों को देखते हुए राजीव गांधी के लिए एक नोट तैयार किया. मैंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है. इसलिए हमें इसके फैसले का सम्मान करना चाहिए. लेकिन अगर मुस्लिम धर्म गुरु ये कह रहे हैं कि इस मामले में सरकार को दखल देना चाहिए, तो उन्हें बताया जाना चाहिए कि वो इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करें. सरकार सिर्फ यही कर सकती है कि वो इन अर्जियों को चुनौती न दे.

फ़र्स्टपोस्ट- आपका सुझाव नहीं माना गया ?

वजाहत हबीबुल्लाह- मैंने राजीव गांधी को जो नोट भेजा था, उसका काफी वक्त तक जवाब नहीं आया था. मुझे ऐसा लगा कि वो इस मामले में सलाह-मशविरे कर रहे होंगे. राजीव गांधी के साथ मेरा बहुत अनौपचारिक ताल्लुक था. हम स्कूल में साथ थे.

फ़र्स्टपोस्ट- क्या आप राजीव गांधी के क्लासमेट थे ?

वजाहत हबीबुल्लाह- राजीव दून स्कूल में मुझसे एक साल सीनियर थे. संजय गांधी मुझसे एक साल जूनियर थे.

RajivGandhi

फ़र्स्टपोस्ट- क्या आप उन दोनों को अच्छे से जानते थे ?

वजाहत हबीबुल्लाह- संजय मेरे करीबी दोस्त थे. राजीव बहुत रिजर्व बच्चे थे. संजय खिलंदड़ मिजाज के थे. वो बहुत शरारती और नटखट थे.

तो, मैं बता रहा था कि एक दिन मैं राजीव गांधी के चेंबर में दाखिल हुआ तो देखा कि अकबर भी उनके साथ बैठे हुए थे. वो दोनों शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बातचीत कर रहे थे. जब राजीव ने मुझे देखा तो कहा कि, 'अंदर आओ वजाहत, तुम हम में से ही हो'.

फ़र्स्टपोस्ट- राजीव गांधी की इस बात का क्या मतलब था कि तुम हम में से ही एक हो ?

वजाहत हबीबुल्लाह- (हंसते हुए) मैं पीएमओ में था. उनका दोस्त था. जाहिर है मैं उनका करीबी था. मुझे बाद में पता चला कि अकबर ने ही राजीव गांधी को इस बात के लिए राजी किया था कि अगर शाहबानो मामले में सरकार दखल नहीं देती है, तो मुसलमानों को ये लगेगा कि सरकार को उनके हितों की फिक्र नहीं. मुस्लिम समुदाय को ये भरोसा देने के लिए अगर वो किसी मसले पर चिंतित हैं, तो सरकार उनकी मदद करने और उनका साथ देने को तैयार है, ये कदम उठाना जरूरी समझा गया.

फ़र्स्टपोस्ट- क्या राजीव और एम जे अकबर के बीच बातचीत आपकी मौजूदगी में हुई थी ?

वजाहत हबीबुल्लाह- जब मैं कमरे में घुसा, तो बातचीत चल ही रही थी. मुझे सारी बातें याद नहीं हैं. लेकिन जितना मैंने बताया वो उनकी पूरी बातचीत का लब्बो-लुबाब है.

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अकबर की शाहबानो मामले में राय कोई छुपी हुई नहीं थी. आरिफ मोहम्मद खान के साथ बहस में भी अकबर ने यही बात कही थी. आरिफ मोहम्मद खान उस वक्त कांग्रेस में ही थे. वो शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए बिल लाने के खिलाफ थे. अकबर और उनके बीच दूरदर्शन पर चर्चा हुई थी.

खान का कहना था कि सरकार को इस बारे में कोई कानून नहीं बनाना चाहिए. उन्होंने कुरान का हवाला देते हुए कहा था कि इस्लाम में कुछ बातें अनिवार्य हैं. लेकिन तलाकशुदा महिला को गुजारा भत्ता देने का मामला इनमें से नहीं है. इस पर कुरान की राय साफ नहीं है. कुरान सिर्फ सुझाव देती है कि इस बारे में मुस्लिम मर्द को क्या करना चाहिए. आरिफ मोहम्मद खान का कहना था कि कुरान की व्याख्या करना सरकार का काम नहीं है.

Photo: YouTube Grab

Wajahat Habibullah, Photo: YouTube Grab

फ़र्स्टपोस्ट- अकबर का क्या कहना था ?

वजाहत हबीबुल्लाह- अकबर का मानना था कि इस मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय काफी फिक्रमंद है. इसलिए सरकार को चाहिए कि वो बिल लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दे.

मुझे लगता है कि अकबर ने जो बात संसद में अपने भाषण में कही, वो मेरी भी राय है. लेकिन जो बात उन्होंने राजीव गांधी से कही, वो उनकी असल सोच है. मेरी हमेशा से ये राय रही थी कि इस मामले में सरकार को दखल नहीं देना चाहिए था.

फ़र्स्टपोस्ट- द हिंदू में अपने लेख में आपने लिखा था कि अकबर ने राजीव गांधी को कहा कि, 'अगर शाहबानो मामले में आपकी सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करती है, तो मुस्लिम समुदाय को लगेगा कि आप अल्पसंख्यकों को लेकर अपने परिवार की विरासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं'. लेकिन पिछले हफ्ते संसद में अपने भाषण में अकबर ने गिनाया कि किस तरह नेहरू, इंदिरा और राजीव के राज में देश ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के मौके गंवा दिए. ये तो पूरी तरह से पलटी मारना ही है न ?

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वजाहत हबीबुल्लाह- मैंने इस इंटरव्यू की शुरुआत में ही कहा था कि अकबर ने जो भाषण दिया वो उनकी पार्टी की लाइन थी. 1986 में अकबर जो सलाह राजीव गांधी को दे रहे थे, यानी बिल लाकर शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने को कह रहे थे, वो राजनैतिक सूझ-बूझ वाली सलाह समझकर दे रहे थे. संसद में जो बात उन्होंने पिछले हफ्ते कही वो उनकी पार्टी के सियासी हित की बात थी. अब अपनी राजनैतिक पार्टी की वजह से अकबर के बोल बदल गए हैं.

फ़र्स्टपोस्ट- लेकिन, ये अकबर का पलटी मारना नहीं कहलाएगा ?

वजाहत हबीबुल्लाह- हां, किसी विचार को लेकर ये पलटी मारने जैसा ही है. लेकिन जिस बात की वकालत वो कर रहे हैं, वो पलटी मारना नहीं है. दोनों ही मामलों में अकबर की राय सियासी थी. दोनों ही दफे अकबर ने यही कहा कि सरकार को पर्सनल लॉ में दखल देना चाहिए.

Supreme Court Of india

फ़र्स्टपोस्ट- लेकिन पर्सनल लॉ में दखलंदाजी का अकबर का सुझाव उनकी 1986 की राय से बिल्कुल अलग है ?

वजाहत हबीबुल्लाह- हां, ये बात सच है. उन्होंने उस वक्त कहा था कि सरकार को दखल देना चाहिए. आज भी वो यही कह रहे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट- सरकारी दखल का उनका विचार आज बिल्कुल ही...

वजाहत हबीबुल्लाह- उनकी पार्टी की नीति से मेल खाता है.

फ़र्स्टपोस्ट- आपने अपने लेख में लिखा था कि अकबर का विचार था कि शाहबानो मामले में वो यही मानते थे कि मुस्लिम अपने धार्मिक हितों की रक्षा करना चाहते थे ?

वजाहत हबीबुल्लाह- ये मुस्लिम धार्मिक हितों की बात नहीं, कट्टरपंथी परंपरा की हिफाजत का मामला था. मुझे नहीं लगता कि मैंने लिखा था कि धार्मिक हितों की रक्षा की बात थी. अगर इसे संपादित कर दिया गया हो, तो मैं नहीं कह सकता. शाहबानो मामले में मुस्लिम धर्मगुरु सिर्फ अपनी खुदगर्जी की हिफाजत कर रहे थे.

फ़र्स्टपोस्ट- उस बारे में अकबर का क्या कहना था ?

वजाहत हबीबुल्लाह- अकबर ने इसे इस तरह देखा कि मुस्लिम धर्मगुरुओं का जो कहना था, वो पूरे मुस्लिम समुदाय का मानना था. शाहबानो मामले में मैं पूरी तरह से उनकी बातों से असहमत था. ये सिर्फ मुस्लिम धर्मगुरुओं की राय थी.

फ़र्स्टपोस्ट- तो आप ये कह रहे हैं कि मुस्लिम धर्मगुरुओं और मुस्लिम समुदाय की राय अलग-अलग बातें हैं ?

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वजाहत हबीबुल्लाह- मैं ये बात तो नहीं कहूंगा. 1937 का मुस्लिम पर्सनल लॉ या शरीयत एक्ट मुस्लिम धर्मगुरुओ के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था. उस वक्त ब्रिटिश सरकार जोर-शोर से मुस्लिम धर्मगुरुओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही थी. अंग्रेज लंबे वक्त से इस जुगत में थे. 1937 का एक्ट इसी का नतीजा था. अंग्रेजों को लगता था कि मुस्लिम धर्मगुरुओं को रिझा कर वो मुस्लिम समुदाय को नियंत्रित कर सकते हैं. आजादी के बाद की कांग्रेस सरकारों की सोच भी अंग्रेजों जैसी ही थी.

शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध असल में मुस्लिम समुदाय का नहीं, मुस्लिम धर्मगुरुओं का था. वो सिर्फ अपना स्वार्थ देख रहे थे.

असल में 1986 में अकबर ने जो सलाह दी वो ये सोचकर दी कि मुस्लिम समुदाय यही चाहता है. अब वो ये कह रहे हैं कि अगर समुदाय के खयालात गलत हैं, तो सरकार को दखल देना चाहिए. ये 1986 से उनके रुख में आया बदलाव है. उस वक्त अकबर का ये मानना था कि अगर मुस्लिम समुदाय की सोच गलत भी है, तो भी उसका समर्थन किया जाना चाहिए. ताकि मुस्लिम समुदाय को ये भरोसा दिया जा सके कि सरकार उनके हितों की रक्षा करेगी.

Najma Heptulla

फ़र्स्टपोस्ट- द हिंदू के अपने लेख में आपने लिखा था कि अकबर ने राजीव गांधी को सलाह दी कि वो अदालत के फैसले को पलट दें. आपको क्या लगता है कि अकबर अकेले शख्स थे, जिन्होंने राजीव गांधी को ये सलाह दी ?

वजाहत हबीबुल्लाह- और लोग भी रहे होंगे.

फ़र्स्टपोस्ट- मैंने 2015 में आरिफ मोहम्मद खान का इंटरव्यू किया था. उन्होंने कहा था कि एम जे अकबर और नजमा हेपतुल्ला ने उन्हें ये सलाह दी थी. आज दोनों ही बीजेपी में हैं

वजाहत हबीबुल्लाह- (हंसते हुए) राजीव ने नजमा हेपतुल्ला की बात तो कतई नहीं मानी होगी.

फ़र्स्टपोस्ट- लेकिन अकबर ?

वजाहत हबीबुल्लाह- हां, राजीव गांधी अकबर को बहुत गंभीरता से लेते थे. वो अकबर को बुद्धिजीवी और गंभीर सोच रखने वाला मानते थे. वो अकबर की बात सुनते थे. कश्मीर मसले पर भी राजीव अकबर की सलाह को अहमियत देते थे. मैं राजीव और अकबर दोनों को अच्छे से जानता था. किसी दौर में मैं और अकबर अच्छे दोस्त थे. हाल के दिनों में हम एक या दो बार मिले होंगे. लेकिन मैं अब दावा नहीं कर सकता कि अकबर मेरे दोस्त हैं.

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फ़र्स्टपोस्ट- अकबर की राय को लेकर क्या राजीव गांधी ने आप से भी चर्चा की थी ?

वजाहत हबीबुल्लाह- नहीं उन्होंने इस बारे में कोई चर्चा नहीं की. मैंने अपना रुख पहले ही साफ कर दिया था. राजीव गांधी एक सियासी फैसला ले रहे थे. वो जिस बुनियाद पर फैसला ले रहे थे, मैं उससे इत्तेफाक नहीं रखता था.

फ़र्स्टपोस्ट- आरिफ मोहम्मद खान ने मुझे ये भी बताया था कि राजीव गांधी आधुनिक खयालात के थे. वो सेक्यूलर थे और शाहबानो मामले पर अदालत का फैसला पलटना नहीं चाहते थे. ये तो दूसरे लोग थे जिन्होंने राजीव को इस बात के लिए राजी किया.

वजाहत हबीबुल्लाह- मैंने राजीव गांधी को सलाह दी थी कि वो इस मामले में दखल न दें. बहुत मुमकिन है कि जब राजीव गांधी ने इस बारे में आरिफ से बात की, तो उनके जहन में मेरी राय भी रही हो. अब ये समझना दिलचस्प होगा कि राजीव गांधी ने अकबर की बात क्यों मानी. अकबर भी तो आधुनिक सोच वाले हैं.

फ़र्स्टपोस्ट- मुझे लगता है कि राजीव गांधी की नजर में अकबर मॉडर्न खयालात के थे. ऐसे में उनके सुझाव को भी राजीव ने अहमियत दी कि मुस्लिम समुदाय को भरोसा देना जरूरी है.

वजाहत हबीबुल्लाह- जरूर इस बात से फर्क पड़ा होगा.

Rajiv Gandhi

फ़र्स्टपोस्ट- क्या आप ये मानते हैं कि अकबर की सलाह की वजह से ही राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में दखल दिया ?

वजाहत हबीबुल्लाह- मुझे लगता है कि अकबर के कहने पर ही राजीव गांधी ने ये फैसला लिया. अब सवाल ये है कि राजीव गांधी ने अकबर की सलाह को लेकर मुझसे मशविरा क्यों नहीं किया? अब अगर ये राय मुस्लिम कट्टरपंथी सोच रखने वालों की तरफ से आई होती तो यकीनन राजीव मुझसे पूछते कि तुम तो ये कहते हो, जरा इस मसले पर दूसरों की भी राय ले ली जाए. अगर आरिफ भी ये सलाह देते तो भी शायद राजीव मुझसे जरूर चर्चा करते. लेकिन अकबर कोई कट्टरपंथी नहीं थे. वो मेरे और राजीव गांधी जैसी आधुनिक सोच वाले थे. शायद यही वजह रही कि अकबर की सलाह पर राजीव ने मुझसे चर्चा नहीं की. वैसे भी मैंने तो अकबर के उलट ही सलाह दी थी.

मुझे लगता है कि अकबर ने राजीव को ये बात समझाई होगी कि शाहबानो मामले में दखल सियासी समझदारी होगी. मुझे नहीं लगता कि राजीव गांधी ने ये फैसला मुस्लिम समुदाय के हित को ध्यान में रखकर लिया. मुझे ये लगता है कि राजीव गांधी ने सियासी फायदे के लिए ये फैसला लिया.

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राजीव मानते थे कि अकबर की सियासी समझ काफी अच्छी है. अब अकबर वाकई राजनैतिक तौर पर इतने समझदार थे या नहीं, ये अलग बात है. राजीव गांधी उन्हें आधुनिक मुस्लिम मानते थे. राजीव को लगता था कि वो मुस्लिम कट्टरपंथी सोच नहीं रखते हैं. इसीलिए राजीव ने अकबर पर भरोसा करते हुए शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया.

फ़र्स्टपोस्ट- बीजेपी ने ट्रिपल तलाक बिल के बचाव के लिए अकबर को उतारा. इस बारे में आपका क्या सोचना है ?

वजाहत हबीबुल्लाह- अब अगर बीजेपी ने अकबर को सिर्फ इसलिए इस मामले में बोलने के लिए कहा क्योंकि वो सिर्फ मुसलमान हैं. और अकबर ने इसे मंजूर कर लिया, तो मैं इसके लिए उन्हें बधाई नहीं दूंगा. लेकिन अगर बीजेपी ने उन्हें एक काबिल शख्स होने के नाते बोलने को कहा. उन्हें इसलिए मौका दिया क्योंकि वो सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने वाले बिल लाने के फैसले में भी शामिल थे, तो मुझे ये बात ठीक लगती है कि उन्हें ट्रिपल तलाक बिल पर बोलने को कहा गया.

मुझे ये बात हमेशा खराब लगती है कि कोई काम इसलिए करने को मिले कि मैं मुसलमान हूं. किस्मत से मेरे करियर में न तो मैंने कभी चाहा और न ही मुझे कभी ये कहा गया कि मैं मुसलमान हूं, इसलिए मुझे कोई जिम्मेदारी दी जा रही है. जब 2003 में मुझे पहली बार उपभोक्ता मामलों का सचिव बनाया गया, तो पत्रकार हरीश खरे (द ट्रिब्यून के मौजूदा संपादक) ने लिखा था कि 2002 के दंगों के बाद वाजपेयी सरकार खुद को मुस्लिम विरोधी दिखने से बचाना चाहती थी, इसीलिए वजाहत को उपभोक्ता मामलों का सचिव बनाया गया. मुझे ये बात बहुत खराब लगी थी.

मैंने जसवंत सिंह से इस मामले में बात की थी. जसवंत मेरे भाई जैसे ही हैं. मैंने उनसे कहा कि जो बात खरे ने लिखी, क्या वो सच है. जसवंत ने कहा कि ये बिल्कुल गलत है. बल्कि वो तो उस वक्त मुझे वित्त मंत्रालय में अपने साथ लेना चाहते थे. जसवंत उस वक्त वित्त मंत्री थे. जसवंत ने कहा कि जिस वक्त नियुक्ति का फैसला लिया गया, उस वक्त उनके सचिव बैठक में नहीं जा सके, इसलिए उन्हें उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय में नियुक्त किया गया. जसवंत ने ये भी कहा कि मैं जब भी चाहूं, वित्त मंत्रालय में आ सकता हूं. वो चाहते थे कि मैं बैंकिंग से जुड़े मामले देखूं. उन्होंने मुझे बाद में भी एक पद का प्रस्ताव दिया था. लेकिन तब मै एक फेलोशिप पर विदेश चला गया था. हरीश खरे ने जो लिखा था, वो बेहद काबिले-ऐतराज बात थी.

Jaswant Singh

फ़र्स्टपोस्ट- देश में लव जिहाद, गौहत्या के मामलों में पर बढ़ती तकरार पर आपका क्या कहना है ?

वजाहत हबीबुल्लाह- मैं उन सरकारी अधिकारियों में शामिल हूं, जिन्होंने इस बारे में चिंता जताते हुए लंबा खत लिखा था. मेरा अब भी यही मानना है कि देश के सामाजिक ताने-बाने पर दबाव बढ़ रहा है. भारत का पूरा इतिहास मेल-जोल का रहा है. मुगलों के दौर में ये बात और भी हुई. आप किसी शासक की नीतियों पर सवाल उठा सकते हैं. लेकिन मुगलों के दौर में संगीत, खान-पान से लेकर साहित्य तक, समाज में मेल-जोल की मिसाल बने. आप दो समुदायों के खान-पान या संगीत में फर्क नहीं कर सकते थे. सुल्तानों के दौर में ऐसा नहीं था. उस वक्त शासक वर्ग मुसलमान था. लेकिन मुगल राजवंश में राजपूतों की भी बड़ी हिस्सेदारी थी.

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फ़र्स्टपोस्ट- लेकिन बीजेपी तो ये बात नहीं कहती. इससे अलग मैंने कभी एम जे अकबर को ऐसी हिंसक बातों के खिलाफ कुछ भी कहते हुए नहीं सुना. वो ट्रिपल तलाक को लेकर मु्स्लिम पर्सनल लॉ में दखल की तो वकालत करते हैं. लेकिन किसी एक समुदाय को निशाना बनाने पर चुप रहते हैं. आप इसे कैसे देखते हैं ?

वजाहत हबीबुल्लाह- हर अच्छी सोच रखने वाले को इस मुद्दे पर बोलना चाहिए. अकबर इकलौते नहीं हैं जिन्हें इस मामले पर बोलना चाहिए था. सवाल ये नहीं है कि वो मुस्लिम हैं फिर भी उन्होंने इस मसले पर कुछ नहीं बोला. ये भारत देश का मामला है. आज देश के सामाजिक ताने-बाने को उधेड़ा जा रहा है. ऐसे में हर संवेदनशील और देशभक्त इंसान को इस मसले पर बोलना चाहिए. भारत सिर्फ एक भौगोलिक जगह नहीं है. यह एक विचार भी है, जिसकी हर एक को हिफाजत करनी चाहिए.

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