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BJP की दुविधा, दलित-सवर्ण दोऊ खड़े काके लागूं पायं?

बीजेपी दलितों के गुस्से और सवर्णों की नाराज़गी के बीच फंसी है। दोनो को साधने का कोई आसान फॉर्मूला नहीं है

Updated On: Sep 07, 2018 08:42 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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BJP की दुविधा, दलित-सवर्ण दोऊ खड़े काके लागूं पायं?

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए. रहीम के दोहे की यह पंक्ति हिंदी पट्टी में सदियों से लोकोक्ति की तरह प्रचलित रही है. इसका मतलब यह कि बहुत जगहों पर ध्यान लगाने से कुछ भी हाथ नहीं आता है. आम जीवन में यह पंक्ति ब्रहवाक्य हो सकती है, लेकिन भारतीय राजनीति में नहीं. राजनीति में सबको साधे बिना सफल होना संभव नहीं है.

2014 में नरेंद्र मोदी ने यही किया. सबको साधने का जो फॉर्मूला कांग्रेसी राज में कही गुम हो गया था, उसे उन्होंने ढूंढ निकाला. ब्राह्मण-बनिया पार्टी कही जाने वाली बीजेपी को सवर्णों के अलावा दलितों के वोट भी भारी मात्रा में मिले. यूपी-बिहार की लगभग सारी आरक्षित सीटें एनडीए ने जीत लीं. दलितों की प्रतिनिधि पार्टी बीएसपी का खाता तक नहीं खुला.

लेकिन 2014 के बाद से राजनीतिक हालात तेजी से बदल चुके हैं. दलितों की नाराजगी की खबरें लगातार सिर उठाती रही हैं. अब नई खबर यह है कि सवर्ण भी सरकार से नाराज हैं. सवर्णों ने गुरुवार को राष्ट्रव्यापी बंद का ऐलान किया है. मध्य-प्रदेश और राजस्थान जैसी कई जगहों से इस बंद के प्रभावी होने की खबरें भी आ रही हैं. बंद का ऐलान एसटी-एसी एक्ट के खिलाफ है लेकिन इसमे आरक्षण विरोध की आवाजें भी साफ सुनाई दे रही हैं. अपने दो बड़े वोटर समूहों यानी सवर्ण और दलितों के बीच मची खींचतान ने बीजेपी की नींद उड़ा दी है. आखिर यह स्थिति क्यों बनी? यह बात समझने के लिए कई तथ्यों पर गौर करना होगा.

जातीय समीकरण और विराट हिंदू समाज का द्वंद्व

RSS Chief at an event

बीजेपी का पितृ संगठन आरएसएस मूलत: ब्राह्मणों के वर्चस्व वाला एक संगठन है. आरएसएस का हमेशा से यह मानना है कि हिंदू धर्म वह धारा है जो अपने संसर्ग से बाकी मलिन धाराओं को भी पावन कर देती है. संघ या आरएसएस की कोशिश एक ऐसा हिंदू समाज गढ़ने की रही है जो ब्राह्मणवादी मान्यताओं के मुताबिक चलकर भारत को एक संपूर्ण हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित कर सके. 2014 में केंद्र में आने के बाद बीजेपी पर संघ या आरएसएस के एजेंडे को लागू करने का दबाव बढ़ने लगा.

केंद्र के अलावा अलग-अलग बीजेपी शासित राज्यों में भी इसका असर दिखाई देने लगा. पाठ्यक्रम में बदलाव, शहरों और इमारतों के नाम में तब्दीली से लेकर गायों के लिए एंबुलेंस सेवा शुरू करने तक संघ को खुश करने के लिए तरह-तरह के फैसले लेने की होड़ मच गई. घर वापसी और हिंसक गोरक्षा आंदोलन जैसे सरकारी प्रश्रय वाले जो काम शुरू हुए, उसका निशाना भले ही मुसलमान हों, लेकिन शिकार बड़ी संख्या में दलित भी बने.

गुजरात के ऊना में मरी गाय के खाल उतार रहे दलितों की पिटाई ने पूरे देश में इस समुदाय के लोगो के बीच नाराजगी का माहौल बनाया. मामला यहीं नहीं रुका हरियाणा और राजस्थान जैसे बीजेपी शासित राज्यों में घोड़ी चढ़ने से लेकर मूंछ रखने तक जैसे मामलों में दलितों के उत्पीड़न और उनकी हत्या तक खबरें भी आईं.

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार दलितों में बढ़ रही नाराजगी से बेखबर थी. प्रधानमंत्री मोदी ने ज्यादातर गोरक्षकों को गुंडा बताया. पीएम और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह दोनों ने भरोसा दिया कि दलितों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा. आरक्षण भी पहले की तरह जारी रहेगा. लेकिन यह सच है कि दलित उत्पीड़न के वाकये कम नहीं हुए बल्कि लगातार बढ़े.

एसटी-एसी एक्ट बना टर्निंग प्वाइंट

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इस साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में पचास के दशक से चले आ रहे एसटी-एसी एक्ट के कुछ प्रावधानों को बदल दिया. कोर्ट ने कहा कि इस एक्ट के तहत मामला दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी बल्कि गिरफ्तारी से पहले किसी हाइयर अथॉरिटी से मंजूरी लेनी होगी. साथ ही इसकी धाराएं भी जमानती होंगी, जो अब तक गैर-जमानती हैं.

कोर्ट के इस फैसले से दलित समुदाय में जबरदस्त गुस्से की लहर दौड़ पड़ी. अप्रैल में दलितों ने भारत बंद का ऐलान किया जिसमें बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और कई प्रदर्शनकारी मारे गए. लगातार बढ़ते विरोध को ध्यान में रखते हुए सरकार ने संविधान संशोधन के जरिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को निरस्त करने का निर्णय लिया. संसद में सभी दलों ने इस पर अपनी मुहर लगाई.

इस तरह केंद्र सरकार ने यह संदेश दिया कि वह दलित विरोधी नहीं है। लेकिन सरकार की इस पहल एक अलग असर हुआ. बीजेपी के कोर वोटर यानी सवर्ण तबकों में एक ऐसी नाराजगी देखने को मिली जो पिछले चार साल में नजर नहीं आई थी. मध्य-प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर सवर्णों ने चप्पल फेंका. कई मंत्रियों और सांसदों के कार्यक्रमों में इस तरह हंगामा हुआ कि उन्हे प्रोग्राम बीच में छोड़कर पिछले दरवाज़े से बाहर निकलना पड़ा. सवर्णों ने दलितों के भारत बंद के तर्ज पर अप्रैल में ही भारत बंद का आह्वान किया जो कामयाब नहीं हो पाया. लेकिन नाराजगी जताने का सिलसिला जारी है. ताजा भारत बंद इसी की कड़ी है.

बीजेपी प्रतीकवाद की राजनीति करती है. इसके तहत अलग-अलग समुदायों के महापुरुषों का महिमामंडन, मूर्तियों की स्थापना, संस्थाओं, गलियों और चौराहों का नामकरण जैसे तरीके अपनाए जाते हैं, जो अब तक कारगर भी रहे हैं. अंबेडकर के नाम पर भीम एप शुरू किये जाने से लेकर दिल्ली में अंबेडकर मेमोरियल बनाए जाने तक प्रतीकवादी राजनीति के ऐसे ढेरो उदाहरण मौजूद हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी को एकजुट करने के लिए राजा सुहलदेव का महिमामंडन शुरू किया. राजा सुहलदेव का नाता राजभर समुदाय से माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि 11वीं सदी में उन्होंने तुर्क अफगानों के साथ युद्ध किया था. बड़े पैमाने पर शबरी जयंती मनाना भी ऐसी ही कोशिशों का हिस्सा है.

दलित-सवर्ण दोनों का साधने की चुनौती

‘Bharat Bandh’

यकीनन प्रतीकवाद के अपने फायदे हैं. लेकिन किसी बुनियादी सवाल पर दो बड़े वोटर समुदाय एक-दूसरे के सामने खड़े हों तो फिर पार्टी क्या करे, किसका साथ दे? बीजेपी का धर्मसंकट यही है. वह दलितों के पक्ष में भी दिखना चाहती है और परंपरागत वोटर यानी सवर्णों को भी नाराज नहीं करना चाहती है. इस समस्या से बचने के लिए बीजेपी ने यहां भी वही रास्ता अपनाया है, यानी प्रतीकवाद. एससीएसटी एक्ट पर विवादास्पद फैसला देने के बाद रिटायर हुए जस्टिस आदर्श गोयल को केंद्र सरकार ने फौरन एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित अभिकरण का प्रमुख बना दिया. ऐसा करके सरकार ने सवर्ण वोटरों को एक तरह का संदेश दिया.

बीजेपी सवर्ण वोटरों को लगातार यह समझाने की कोशिश कर रही है कि एससी-एसटी एक्ट के प्रावधान कोई नए नहीं हैं बल्कि पहले से हैं. उन्हें बहाल रखने जाने का फैसला सिर्फ बीजेपी का नहीं है बल्कि देश की तमाम पार्टियों ने यह बात आम-सहमति से तय की है. सवर्ण नेताओं से यह कहा गया है कि यह बात वे अपने वोटरों को समझाएं. बीजेपी का मीडिया सेल भी बेहद सक्रिय ढंग से व्हाट्स एप मैसेज और फेसबुक पोस्ट के जरिए यह काम कर रहा है.

दूसरी तरफ बीजेपी दलित वोटरों को यह बता रही है कि वह उनके हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है. यह प्रतिबद्धता इतनी बड़ी है कि उसने इसकी खातिर कोर वोटरों यानी सवर्णों की नाराजगी तक मोल ले ली है. बीजेपी के आलोचकों का एक तबका यह भी दावा कर रहा है कि कथित सरकार विरोधी सवर्ण आंदोलन खुद पार्टी ने ही खड़ा किया ताकि दलित वोटरों के मन में सरकार के लिए हमदर्दी पैदा हो. सच्चाई क्या है, इस बारे में दावे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. लेकिन यह बात बहुत साफ है कि अगर दलित और सवर्ण में किसी एक पक्ष की तरह झुका दिखना हो तो बीजेपी दलितों की तरफ जाना पसंद करेगी.

कारण बहुत साफ है. पिछले तीस साल से सवर्ण बीजेपी के परंपरागत वोटर रहे हैं. वे भले ही सरकार से नाराज हों लेकिन उनके बड़े हिस्से के टूटकर कहीं और जाने की आशंका ज्यादा नहीं है. उन्होंने अगर सरकार के खिलाफ एकमुश्त वोटिंग की तब भी बीजेपी को कम नुकसान होगा लेकिन अगर दलितों ने ऐसा किया तो कहानी पूरी तरह बदल जाएगी.

साढ़े बाइस फीसदी तादाद वाले दलित इस देश में ओबीसी के बाद दूसरे सबसे बड़े वोटर समूह का दर्जा रखते हैं. मुसलमान हमेशा से बीजेपी के खिलाफ रहे हैं. अगर मुसलमान और दलितों को इकट्ठा किया जाए तो यह आंकड़ा 40 फीसदी तक पहुंच जाता है. मतलब दलितों की नाराजगी बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है.

जटिल सामाजिक समीकरणों पर टिका दांव

Bharat bandh in Patna

एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान करने वाली संस्था का नाम सपाक्स है. इसका फुल फॉर्म सामान्य, पिछड़ा, अल्पसंख्यक अधिकारी-कर्मचारी वर्ग है. यह नाम खासा दिलचस्प है. बीजेपी विरोधी पार्टियां अपनी लड़ाई ब्राह्मणवाद के खिलाफ बताती हैं और इसके लिए वे गैर-सवर्ण जातियों को लामबंद करने की कोशिश करती हैं. इनमें एससी-एसटी के साथ ओबीसी और अल्पसंख्यक भी शामिल हैं.

लेकिन एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों का विरोध करने वाली संस्था खुद को अल्पसंख्यक और ओबीसी का नुमाइंदा भी बता रही है. इससे लगता है कि यह संस्था बीजेपी प्रायोजित हो या ना हो लेकिन जाने-अनजाने में उसी के हितों के लिए काम कर रही है. बीजेपी की पुरजोर कोशिश है कि दलित-पिछड़ा एकता न बनने पाए. अगर ऐसा हुआ तो उसे यूपी नहीं पूरे देश में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.

ओबीसी या पिछड़े वोटरों का एक बहुत बड़ा तबका बीजेपी के साथ रहा है. बीजेपी ने पिछड़ों को सत्ता में पर्याप्त भागीदारी दी है. खुद प्रधानमंत्री गर्व से बताते हैं कि वे पिछड़े समाज से आते हैं. पिछड़ों को दलितों से अलगाये रखना, दलितों को महत्वपूर्ण होने का एहसास दिलाते रहना, यूपी बिहार के पिछड़े क्षत्रपों के वोट बैंक में सेंध लगाना, सवर्णों के गुस्से को एक सीमा से बाहर ना जाने देना और इन सबके बीच हिंदुत्व के नैरेटिव को मजबूती से स्थापित करना. 2019 में बीजेपी का दांव इन्हीं जटिल सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों पर आधारित है, जिसे खूबसूरती से चला पाना आसान नहीं हैं.

क्या कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा?

अब आखिर में कांग्रेस की बात! 2014 के बाद ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर आई कांग्रेस पार्टी नये समीकरणों के साथ खुद को पुनर्जीवित करके 2019 में वापसी की कोशिश कर रही है. कांग्रेस के जातीय समीकरणों ने गुजरात विधानसभा चुनाव में बखूबी काम किया और पीएम मोदी के राज्य में बीजेपी हारते-हारते बची.

कर्नाटक में भी चुनाव से पहले की सोशल इंजीनियरिंग और चुनाव के बाद एलायंस ने कांग्रेस को हारी हुई बाजी जितवा दी. सवाल यह है कि दलित और सवर्णों की सरकार से नाराजगी क्या कांग्रेस के लिए छींका टूटने जैसा है? कम से कम कांग्रेस पार्टी यह मानकर चल रही है. कांग्रेस के रवैये से यह साफ है कि उसने मान लिया है कि अब इस देश में अब चुनाव पहले की तरह नहीं लड़े जा सकते हैं. पार्टी अब खुल्लम-खुल्ला अवसरवाद अपनाने की राह पर है.

सेक्यूलरिज्म को ताक पर रखकर अब कांग्रेस अलग-अलग वोटर समूहों को अपने तरीके से साधने की कोशिश कर रही है. मुसलमानों से सुरक्षा का वादा तो किया जा रहा है लेकिन इस बात का ध्यान रखा जा रहा है कि पार्टी पर मुस्लिम परस्त होने का इल्जाम ना लगे. हिंदू वोटर आजकल आक्रमक है, इसलिए कांग्रेस भी बीजेपी की राह पर चल रही है. राहुल गांधी की कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदुओं को खुश करने का ही एक पैंतरा है.

कांग्रेस और बीजेपी में एक बेहद दिलचस्प समानता है. जिस तरह बीजेपी यह मान रही है कि सवर्ण वोटर उसे छोड़कर कहीं नहीं जाएगा, इसलिए दलितों को रिझाना ज्यादा जरूरी है. कांग्रेस भी यह मान रही है कि सरकार से नाराज दलित खुद-ब-खुद उसके पाले में आएंगे. लिहाजा उसका पूरा जोर सवर्ण वोटरों को रिझाने में है. राहुल गांधी के करीबी नेता रणदीप सुरजेवाला ना सिर्फ ब्राह्मणों को कांग्रेस का डीएनए बता रहे हैं बल्कि उनके लिए आरक्षण तक की बात कर रहे हैं. दिल जीतने के ये पैंतरे आनेवाले दिनों में कई तरह राजनीतिक ड्रामे पैदा करेंगे.

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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