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Tipu Sultan Jayanti (Part 2): टीपू सुल्तान जयंती मनाना कोडावू में कांग्रेस को क्यों पड़ा भारी?

सूबे की सरकार टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के लिए तैयार है और इससे जिले में सामाजिक अशांति और तनाव का माहौल पैदा हो रहा है

Updated On: Nov 10, 2018 05:12 PM IST

Coovercolly Indresh

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Tipu Sultan Jayanti (Part 2): टीपू सुल्तान जयंती मनाना कोडावू में कांग्रेस को क्यों पड़ा भारी?
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(संपादकीय नोट: बीजेपी और अन्य धड़ों के विरोध के बावजूद कर्नाटक में कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन की सरकार 10 नवंबर को टीपू जयंती मनाने की तैयारी कर रही है. लेकिन संभव है, इस साल माहौल उत्सवी रूप ना ले सके. सभी आयोजन चारदीवारी के भीतर किए जाएंगे और हिंसा की आशंका को देखते हुए सुरक्षा-तंत्र को हाईअलर्ट पर रखा गया है. कर्नाटक में कई समूह टीपू सुल्तान की विरासत को याद करने के इस राजकीय आयोजन के विरोध में हैं. इन समूहों का मानना है कि टीपू सुल्तान एक निर्दयी और विवादास्पद किरदार है. श्रृंखला की इस दूसरी कड़ी में हम कोडगू से रिपोर्ट पेश कर रहे हैं. कोडगू में टीपू सुल्तान को लेकर जनमत खास तौर पर विरोध में है. साल 2015 से, जब विरोध-प्रदर्शनों में दो जन की मौत हुई थी, इस जिले में टीपू सुल्तान की जयंती भारी विरोध और बढ़े हुए तनाव के माहौल में मनाई जाती है.)

छोटा सा पहाड़ी शहर मदीकेरी कर्नाटक के कोडगू जिले के मुख्यालय के तौर पर जाना जाता है. साल 2015 से हर नवंबर में यह शहर लगातार हंगामे की चपेट में आता है. 2015 में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने घोषणा की थी कि राज्य की सरकार टीपू सुल्तान की जयंती मनाएगी. कांग्रेस की अगुवाई में बनी तत्कालीन सरकार ने ऐलान किया कि जयंती सूबे के हर तालुक और जिला मुख्यालय में मनायी जाएगी. इस घोषणा से स्थानीय कोडवा समुदाय के लोग नाराज हुए. इस समुदाय के लोगों का मानना है कि 18वीं सदी के शासक टीपू ने 1785 में उनके पूर्वजों का संहार किया था. साल 2015 में सूबे के कई हिस्सों में टीपू सुल्तान की जयंती के वक्त विरोध प्रदर्शन हुए. मदीकेरी में माहौल ज्यादा बिगड़ा और यहां दो लोगों की मौत हो गई. हालांकि 2015 के बाद के सालों में ऐसी कोई दुखद घटना नहीं हुई है लेकिन बीजेपी और अन्य दक्षिणपंथी तत्व जयंती मनाने का हर साल विरोध करते हैं और जयंती के मौके पर बंद का आह्वान करते हैं.

कोडवा समुदाय के कई बुजुर्गों का कहना है कि ‘मैसूर का शेर’ कहे जाने वाले टीपू सुल्तान ने 1784 से 1799 के बीज कोडवा समुदाय के सैकड़ों लोगों को पकड़ा और उनकी हत्या की. फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान कर्नाटक कोडवा साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष बी पी अप्पन्ना ने कहा कि टीपू सुल्तान एक निर्दयी शासक था. उसने जिले में 300 मंदिर तोड़े. अपन्ना का दावा है कि टीपू सुल्तान ने 'हजारों कोडवा लोगों का जोर-जबर्दस्ती से धर्म-परिवर्तन किया. नापेकुलू के हजारों मुसलमान कोडवा परंपरा और संस्कृति के दायरे में इस्लाम का पालन करते हैं जो इस बात का प्रमाण है कि उनके ऊपर जुल्म हुआ था.' अप्पन्ना ने कहा कि टीपू सुल्तान और उसके पिता हैदर अली ने जिले को जीतने के लिए 30 दफे चढ़ाई की लेकिन हर बार नाकाम रहे. अप्पन्ना के मुताबिक, 'टीपू सुल्तान मौके की तलाश में था और उसे 1785 में ऐसा मौका हाथ लगा जब उसने कोडवा लोगों का संहार किया.'

दो दशकों से उठ रही है कोडवा समुदाय के लिए अलग प्रदेश की मांग

कोडवा नेशनल काउंसिल (सीएनसी) नाम का एक संगठन बीते दो दशकों से कोडवा लोगों के लिए स्वायत्त प्रदेश की मांग करते हुए संघर्ष कर रहा है. टीपू सुल्तान ने कोडवा लोगों पर कथित तौर पर जो जुल्म किए थे, उसे लेकर यह संगठन बहुत मुखर रहा है. सीएनसी के अध्यक्ष एनयू नचप्पा का कहना है कि कोडवा लोग उस जुल्म की याद को कभी नहीं भूलेंगे और ना ही उसे माफ करेंगे. नचप्पा बताते हैं कि 'साल 1785 के 13 दिसंबर को टीपू सुल्तान ने कोडवा लोगों को भागमंडलम के नजदीक देवापरलंब में सुलह-समझौते की गरज से बुलाया. फिर उसने फ्रांसिसी सेना की मदद से निहत्थे पुरुष, स्त्री और बच्चों की हत्या कर दी. टीपू बंदियों को ऋरंगपट्ट की जेल में भी ले गया.' नचप्पा का दावा है कि जिले में कोडवा के 1500 खानदान थे लेकिन संहार के बाद इनकी तादाद 800 रह गई. उन्होंने कहा कि टीपू सुल्तान के अत्याचारों के कारण कोडवा अब बड़ी कम संख्या में रह गए हैं. कोडवा के इतिहास ग्रंथ पटोले पलामे में जिक्र आता है कि टीपू सुल्तान पड़ोस के सुल्लिया से गौड़ा समुदाय के लोगों को लेकर आया. उसने इन लोगों को कोडवा लोगों के खाली घर-मकानों में बसाया.

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उन्होंने ये भी कहा कि एक निर्दयी शासक की जयंती मनाने की जगह सूबे की सरकार को चाहिए था कि वह इस फंड से हाल की बाढ़ में बेघर हुए लोगों का पुनर्वास करती. उन्होंने आरोप लगाया कि टीपू सुल्तान को महिमामंडित करने की दोषी कांग्रेस की सरकार है जिसने अपना वोट बैंक बनाने के लिए ऐसा किया. नचप्पा का कहना है कि जो राजनेता 'टीपू सुल्तान की तरफदारी कर रहे हैं उन्हें कम से कम टीपू सुल्तान को लेकर लिखी गई इतिहास की किताबों पर गौर करना चाहिए. इन किताबों में उन्हें टीपू सुल्तान के जुल्मों का जिक्र मिलेगा. टीपू सुल्तान फ्रांसिसियों और अंग्रेजों के समान ही विदेशी था.'

कोडवा समुदाय के लोगों ने 1 नवंबर को दिल्ली में फ्रांस के दूतावास के सामने भी एक विरोध-प्रदर्शन किया था और मांग की थी कि फ्रांस की सरकार 1785 में देवतपरालंब में किए गए नरसंहार के लिए माफी मांगे. नचप्पा ने बताया कि सीएनसी ने संयुक्त राष्ट्र संघ से भी कहा है कि वो जनसंहारों की अपनी सूची में देवतपरालंब में हुए नरसंहार को भी शामिल करे.

हजारों रुपए खर्च किए जाने हैं आयोजन पर

सामाजिक कार्यकर्ता केपी मंजुनाथ ने टीपू सुल्तान की जयंती पर रोक लगाने के लिए 2017 में हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी. मंजुनाथ का कहना है कि टीपू सुल्तान हरगिज स्वतंत्रता सेनानी नहीं था और सूबे की सरकार सिर्फ वोटबैंक के लिए उसका महिमामंडन कर रही है. मंजुनाथ ने कहा कि टीपू सुल्तान पर कोडवा लोगों का संहार करने, जबरिया धर्म-परिवर्तन कराने और कोडवा समुदाय पर जुल्म करने के आरोप हैं. हमलोग करदाताओं की रकम उसकी जयंती मनाने पर खर्च करने का विरोध करते हैं. सूबे की सरकार के कन्नड़ और संस्कृति विभाग द्वारा जारी सर्कुलर (परिपत्र) के मुताबिक तालुका केंद्रों में जयंती के दौरान उत्सव मनाने पर 25000 रुपए खर्च किए जाएंगे जबकि जिला मुख्यालयों पर उत्सव के लिए 50 हजार रुपए खर्च होंगे- मंजुनाथ ने यह दावा किया.

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उन्होंने कहा कि रिट याचिका के लंबित होने के बावजूद, सूबे की सरकार टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के लिए तैयार है और इससे जिले में सामाजिक अशांति और तनाव का माहौल पैदा हो रहा है. उन्होंने कहा कि 'राज्य की अदालत ने एक डेडलाइन तय की थी. इस तारीख के बीत जाने के बाद भी राज्य की सरकार ने अदालत में अपने तर्क पेश नहीं किए. इसके बाद कोर्ट ने पिछले हफ्ते सुनवाई की अनदेखी करने के कारण सरकार पर 1000 रुपए का जुर्माना आयद किया.' अगली सुनवाई के लिए 9 नवंबर का दिन तय किया गया है.

जयंती मनाना कांग्रेस को पड़ा है भारी

जिले में कांग्रेस के कुछ नेता बीते सालों में टीपू सुल्तान की जयंती के आयोजन में शिरकत करने से दूर रहे हैं. साल 2015 में जिले की कांग्रेस कमिटी के तत्कालीन अध्यक्ष बिद्दातंदा प्रदीप ने जयंती के दौरान उत्सव में भाग नहीं लिया. उन्होंने कहा था कि टीपू सुल्तान की सेना ने नपोकुलू में उनके 40 पूर्वजों को घर में आग लगाकर मार डाला था. दरअसल आज भी साल के एक खास समय पर नरसंहार को याद किया जाता है. कोडवा समुदाय के लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं. शायद यही वजह है जो टीपू सुल्तान की जयंती मनाना काडवू में कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ा है. इस साल मई महीने में हुए विधानसभा चुनाव में जिले की दोनों ही सीटों पर बीजेपी के विधायकों ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की. विराजपेट के विधायक केजी बोप्पाइयाह ने 10 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की जो 2013 में उन्हें मिली जीत के अंतर से दोगुना ज्यादा है. मदीकेरी से विधायक एम पी अप्पाचू रंजन ने 15000 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की जो पिछले चार चुनावों का सबसे ज्यादा है.

जिला प्रशासन ने अप्रिय घटनाओं से बचने के लिए सुरक्षाबलों को विशेष निर्देश दिए हैं. अधिकारी पसोपेस में हैं कि टीपू सुल्तान की जयंती के लिए बीजेपी के जिला परिषद् और ग्राम पंचायत के सदस्यों के बीच निमंत्रण पत्र कैसे बांटे क्योंकि पिछले साल बीजेपी के सदस्यों ने ही आयोजन में बाधा पहुंचाई थी और उत्सव को सोमवारपेट और विराजपेट में रोकना पड़ा था. नियम के मुताबिक जिला परिषद् और पंचायत के सदस्यों के बीच निमंत्रण पत्र बांटना जरूरी है.

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विरोध और हाईअलर्ट

बीजेपी की जिला इकाई के अध्यक्ष बीबी भरातीश का कहना है कि पार्टी 8 से 10 नवंबर के बीच पूरे कोडगू में विरोध-प्रदर्शन का आयोजन करेगी. पार्टी की राज्य इकाई ने इसके लिए निर्देश दिया है. तकरीबन 30 कोडवा समाज, कोडवा के विभिन्न संगठन और संघ परिवार के सदस्य इस साल टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का विरोध कर रहे हैं. 10 नवंबर को कर्नाटक में काला दिवस मनाया जा रहा है. टीपू जंयती विरोधी होराता समिति ने भी 10 नवंबर को कोडगू बंद का आह्वान किया है. बुधवार के रोज एक प्रेस सम्मेलन में समिति के संयोजक एमबी अभिमन्यु ने कहा कि टीपू एक निर्दयी राजा था जबकि कांग्रेस उसे स्वतंत्रता सेनानी कहकर महिमामंडित करने की कोशिश कर रही है.

Photo Source: News-18

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जिला-प्रभारी मंत्री एसआर महेश ने बुधवार को मेदीकेरी में एक बैठक की अध्यक्षता की. बैठक टीपू जयंती के दौरान किए जाने वाले इंतजाम पर चर्चा करने के लिए बुलाई गई थी. बैठक के दौरान उन्होंने लोगों से अपील की कि वे आयोजन को शांतिपूर्ण बनाए रखने में प्रशासन के साथ सहयोग करें. दक्षिणी क्षेत्र के आईजीपी केवी शरथचंद्र ने कहा कि पुलिस ने सुरक्षा-बंदोबस्त सख्त कर दिए हैं और अस्थायी किस्म के चेकपोस्ट बनाए गए हैं. उन्होंने आगाह किया कि शांति में बाधा पहुंचाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

हिंसा की घटनाओं पर अंकुश रखने के लिए पुलिस ने संघ-परिवार के उन कार्यकर्ताओं को समन देकर बुलाया है जिन्होंने पिछली दफे टीपू जयंती के मौके पर हुए संघर्ष में हिस्सेदारी की थी. ऐसे कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वो जमानत के तौर पर अपना पहचान-पत्र जमा करें. संघ परिवार के कई नेताओं ने इस कदम की निंदा की है. मदीकेरी में 155 लोगों को समन देकर बुलाया गया है जबकि विराजपेट से 88 और सोमवारपेट से 105 लोगों को बुलाया गया है. जिला-प्रशासन ने यह आदेश भी जारी किया है कि शराब की दुकानें गुरुवार की मध्यरात्रि से 11 नवंबर की सुबह 6 बजे तक बंद रखी जाएं.

(लेखक मदिकेरी के फ्रीलांस पत्रकार और पत्रकारों के जमीन से जुड़े अखिल भारतीय नेटवर्क 101reporters.com के सदस्य हैं.)

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