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पाटीदार आंदोलन, दलितों का प्रदर्शन और भाजपा की अंदरूनी कलह

कल्पना से परे था कि गुजरात में अमित शाह का विरोध हो सकता है.

Updated On: Nov 17, 2016 07:23 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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पाटीदार आंदोलन, दलितों का प्रदर्शन और भाजपा की अंदरूनी कलह

हाल ही में सैकड़ों की संख्या में दलित समुदाय के लोग अहमदाबाद में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के लिए लिखे गए पोस्टकार्ड लेकर इकट्ठा हुए.

इस पोस्टकार्ड में संदेश लिखा हुआ था,' कुछ दिन गुजारे गुजरात में और महसूस करें बदबू गुजरात की.'

पहली नजर में यह लगता है कि दलित आंदोलनकारियों ने अमिताभ बच्चन के कैंपेन'खुशबू गुजरात की' टैगलाइन का बहुत चतुराई से इस्तेमाल किया है.

लेकिन अगर हम गौर से देखें तो वास्तव में गुजरात बदबूदार दिखाई पड़ेगा. कुछ महीने पहले उना में गौसेवकों द्वारा दलितों पर किए गए हमले के बाद से इस समुदाय के लोगों ने मरे हुए पशुओं की सफाई का काम बंद कर दिया है.

इसके चलते गुजरात के कई हिस्सों में मरे हुए पशुओं की ठीक से सफाई न होने के चलते बदबू फैली हुई है. यह वास्तव में गुजरात की बदबू है.

अमिताभ बच्चन अब अपने विज्ञापन खुशबू की जगह इसको महसूस कर सकते हैं. इस सड़ांध को गुजरात भाजपा के अंदर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल ने बढ़ा दिया है.

पुराने मित्र और अब प्रतिद्वंद्वी बने नेताओं ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें षडयंत्रों और साजिशों की बू आ रही है.

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रस के मुताबिक गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली बुलाया.

सूरत में हुई एक रैली में भाजपा नेताओं के साथ हुई अप्रिय घटना के बाद उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी थी.

पाटीदार समुदाय पर पकड़ के लिए रैली

इस रैली का आयोजन पाटीदार समुदाय में अपनी पकड़ को दिखाने के लिए किया गया था. दुर्भाग्य से भाजपा के राजनीतिक पतन को दिखाने के बाद खत्म हुई.

कुछ महीने पहले हम यह कल्पना ही नहीं कर सकते थे कि अमित शाह को गुजरात में ही विरोध का सामना करना पड़ सकता है.

पर इस रैली में पाटीदार युवकों ने 'जनरल डायर गो बैक' का नारा लगाया और इतना हंगामा किया कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी को अपना भाषण छोटा कर देना पड़ा.

डीएनए अखबार के मुताबिक अमित शाह ने चार मिनट में और विजय रूपानी ने तीन मिनट में अपना भाषण पूरा किया.

इस रैली के आयोजकों ने अचानक कार्यक्रम के खत्म करने की घोषणा की और नेता वहां से निकल गए.

इस रैली में उपस्थित आनंदीबेन पटेल को इस अफवाह के बाद दिल्ली बुलाया गया कि उन्होंने कार्यक्रम के दौरान पाटीदार समुदाय के लोगों को उकसाया था.

पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल इस बात से नाराज है कि शाह और रूपानी ने उनको हटाये जाने की भूमिका तैयार की थी. शायद इसी कारण के चलते वह बदला लेना चाह रही थी.

बीते दिनों में भाजपा को तीन तरफ से मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. जहां उना में हुई घटना के बाद से दलित हमलावर है तो एक साल बीत जाने के बाद भी पाटीदार शांत नहीं हुए हैं.

उनके नेता हार्दिक पटेल को राज्य से बाहर भेज दिया गया है जबकि दूसरे बहुत सारे नेताओं पर पुलिस ने मामले दर्ज किए हैं.

इन सबके बीच भाजपा नेताओं के बीच आपस में चलने वाली नूराकुश्ती मुश्किलें बढ़ा रही हैं.

बीजेपी को हराने की धमकी

अगस्त में जब आनंदीबेन पटेल ने अचानक फेसबुक पोस्ट के जरिये अपने इस्तीफे की सूचना दी तब शाह ने मोदी से कहा कि राज्य के मामले में मुझे खुली छूट दी जाय, हम जीत की गारंटी देते हैं.

लेकिन दलित (करीब 7 प्रतिशत) और पाटीदार (15-18 प्रतिशत) अगले चुनाव में भाजपा को हरा देने की धमकी दे रहे हैं.

कम होने के बजाय दलित और पाटीदारों का बढ़ता गुस्सा गुजरात में भाजपा के सामने चुनौती पेश कर रहा है.

गुजरात भाजपा के लिए इस कारण महत्वपूर्ण है क्योंकि इस राज्य में बड़ी संख्या में भाजपा का परंपरागत वोट बैंक है.

अगर हम कुछ दूसरे राज्यों की चर्चा करें जहां पर अगले कुछ महीने में चुनाव होने वाले हैं तो पंजाब में भाजपा और उसके सहयोगी अकाली दल की हार सुनिश्चित बताई जा रही है.

दूसरे राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने मायावती और सपा-कांग्रेस संभावित गठजोड़ के रूप में कठिन चुनौती मौजूद है.

अगस्त महीने में मोदी ने 2014 में चुनावी जीत के बाद पहली बार जब गुजरात में सार्वजनिक रैली को संबोधित किया तब डीएनए अखबार ने टिप्पणी की थी कि प्रधानमंत्री को 27 महीने में केवल 180 मिनट गुजरात के लिए मिले.

अब मोदी लगातार गुजरात का दौरा कर रहे हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि वह अपने वोटरों को जोड़ना चाह रहे हैं.

इसी के साथ भाजपा पाटीदारों के साथ नरम रुख अपना रही है. सूरत में हुए हंगामे के बाद पुलिस ने 130 से ज्यादा पाटीदार युवकों को हिरासत में लिया था लेकिन अगली सुबह तक सबको रिहा कर दिया गया था.

यह 2015 में पाटीदार आरक्षण को लेकर अपनाये गए रुख के बिल्कुल विपरीत है. जाहिर है पाटीदारों के साथ भाजपा अभी किसी तरह का मुठभेड़ नहीं चाह रही है.

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