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यूपी चुनाव 2017: समाजवादी 'साइकिल' की सर्द व्यथा!

समाजवादी पार्टी में घमासान के बीच 'साइकिल' का दुख भी तो सुन लीजिए...

Tarun Kumar Updated On: Jan 13, 2017 08:21 AM IST

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यूपी चुनाव 2017: समाजवादी 'साइकिल' की सर्द व्यथा!

इस सर्द मौसम में आप मेरी सवारी करते हुए ठिठुरन और कंपकंपी महसूस कर रहे होंगे. जबकि मेरे मांसपेशीहीन कंकाल बदन में गर्मी फूट रही है! मैं पसीने से तर-बतर हूं. बेचारगी, फटीचरी, निरीहता और खस्ताहाली का बिंब पैदा करने वाली मैं वही 'साइकिल' हूं. जिसकी लाचार पीठ पर मौजूदा दौर की सबसे बड़ी सियासी लड़ाई लड़ी जा रही है. डेढ़ बित्ते की मेरी संकरी पीठ इस सियासी धींगामुश्ती और केहुनीबाजी की सबसे चौरस जमीन बनी हुई है.

मेरी पीठ पर बैठकर समाजवादी सफर शुरू करते हुए मर्सीडिज, पोर्श, बीएमडब्लू का जुगाड़ कर लेने वाले दुर्दांत छुटभैये सपाइयों से लेकर सपाई सत्ता की धुरी मशहूर ‘यादव परिवार’ के सभी महान नेता आस्तीन चढ़ाकर जंग में कूद पड़े हैं. ऐसा हो भी क्यों न. यह मेरा ही अखंड प्रताप है कि मैंने सपा की सियासी सवारी गाड़ी बनकर जिसे भी अपनी पीठ पर बिठाया. चाहे वह गुंडा-चोर-उचक्का ही क्यों न हो. वह लखटकिया गाड़ियों का हक हासिल करने में पीछे नहीं रहा.

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साहित्य को सादगी और अभाव की सनातन संवेदना सप्लाई करने वाली मैं 'साइकिल' कितनी भाग्यशाली हूं कि आज सुर्खियां बटोरने के मामले में हाइवे पर हवाखोरी करने वाली लग्जरी गाड़ियां मुझसे मीलों पीछे रह गई हैं!

पगडंडियों और सड़कों के जख्मी हाशिए पर धकेली गई मैं आज इन लकदक वाहनों के लिए ईर्ष्या का सबब हूं. मुझ पर कब्जे के लिए जारी महाभारत में साहित्य के सभी नौ रस और तैंतीस संचारी भाव फूट पड़े हैं. इस लड़ाई में कार्यकर्ताओं का करूण रस, मुलायम का रौद्र रस, अखिलेश का वीर रस, शिवपाल का वीभत्स रस, अमर का अद्भुत रस, रामगोपाल का हास्य रस (बार-बार निकाले जाने के कारण), आज़म ख़ान का श्रृंगार रस, साधना गुप्ता-प्रतीक का भयानक रस और डिंपल यादव का शांत रस है.

Mulayam Singh

(फोटो: पीटीआई)

साहित्य के 33 संचारी भावों में से प्रमुख आवेग, उग्रता, उन्माद, लज्जा, हर्ष, मद, दीनता, चिंता, विषाद आदि इस ड्रामे का रोमांच पूरे देश में फैला रहे हैं. नाटकीय लड़ाई के केंद्र में हूं मैं यानि वही 'साइकिल' जिसके चिंतन और चिंता में चुनाव आयोग से लेकर नेता-कार्यकर्ता सभी सूखे जा रहे हैं. हमारी है साइकिल, तो तुम्हारी नहीं है साइकिल!

मेरे जन्मदाता वैरन फॅान डेविस और किर्क पैटिन मैकमिलन ने कभी सपने में मेरी इस हैसियत और रूतबे का अंदाजा नहीं लगाया होगा! जिस साइकिल को इसके जन्मदाताओं ने रेंगने के लिए छोड़ दिया था. आज उसके पीछे सपाई हुजूम रेंगने को अमादा है!

दूधियों, डाकियों, सिपाहियों, कूरियर वालों, मास्टर साहबों, विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों सबकी लाचार-लचर किफायती सवारी, मैं साइकिल खबरिया विश्लेषण, बहस, कानूनी दांव-पेंच, सियासी खींचतान, चुनावी जोड़-तोड़ सभी के लिहाज से बड़े काम की चीज बन गई हूं.

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सपाई सियासी वजूद के लिहाज से तो मैं इतने काम की चीज हूं कि कोई मेरे पैडल पर चढ़ने को बेताब है. कोई स्पोक में डंडा फंसा रहा है, कोई चेन का रिंग खींच रहा है. मैं किसी एक के पाले में न चले जाऊं, इसके लिए कोई रियर गियर दबा रहा है. कोई आगे की गियर के साथ मनचाहा जोर-आजमाइश कर रहा है. विपक्ष ऊपर वाले से मेरे टायर से ही हवा फुस्स हो जाने की विनती कर रहा है!

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मेरी सोहबत में बड़े हुए अखिलेश का लगाव अगर मेरे प्रति चट्टानी है तो उनके पिता और चाचा तो मुझे अपनी धोती से बांधे बैठे हैं. ताकि मुझे कोई उनसे दूर न कर दे! इस छीना-झपटी में आप मेरे शॉक-ऑवजर्वर, मड-गियर, हैंडल ग्रिप, सीट सभी की दशा समझ सकते हैं. अजीब सा कन्फ्यूजन है्!

एक तरफ मेरा चुनावी जलवा और अचानक बड़ी हुई हिमालयी हैसियत है. तो दूसरी ओर मेरे ऊपर कब्जे के लिए जारी मार-कुटाई, जिसमें मैं खुद कूटी जा रही हूं! जरा सोचिए, मेरे खानदान के अन्य सदस्य मोटरसाइकिल, ठेले, रिक्शा सुकून के किस सफर होंगे और एक मैं हूं जिसकी तबियत के सभी दुश्मन बने बैठे हैं.

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सच पूछिए तो मेरे पोर-पोर में तब भी इतना दर्द नहीं हुआ था जब वर्ल्ड फेमस साइक्लिस्ट लांस आर्मस्ट्रांग ने मुझे जुनून और जज्बे की रेस ‘टूर द फ्रांस’ में जोता था! तब भी मैं जोटिल-जख्मी नहीं हुई जब वुएल्टा ए स्पाना, वोल्टा ए पुर्तगाल जैसी कठिन रेस में मुझे दौड़ाया गया!

आखिर मैं इतनी बड़ी परीक्षा क्यों दे रही हूं? मैं लाख कुर्बानी दे दूं पर सपाई निजाम ने मुझे दिया क्या? भले ही आज मैं माउंटेन बाइक, हाइब्रिड बाइक, क्रूजर बाइक, एंफिबियस बाइक, रेसिंग बाइक जैसे कई फैशनेबल महंगे अवतारों में अवतरित हूं. पर भारत और खासकर उत्तर प्रदेश की सड़कों पर मेरी क्या हैसियत है? मैं आज भी वही धकियाई हुई निरीह साइकिल हूं, जिसके लिए सपा राज में बने कई हाईवे पर कोई जगह नहीं है!

क्या मैं यमुना एक्सप्रेस, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस आदि साफ-सुथरी चौड़ी सड़कों पर चैन की टुन-टुन घंटी बचाते हुए सफर कर सकती हूं?

Akhilesh Yadav

क्या मेरा यह अंदेशा सही नहीं है कि अगर इन सड़कों पर फटकने की जुर्रत करूं तो या तो ट्रैफिक कानून अपना काम करेगा या हवाईखोरी करती लग्जरी गाड़ियां मुझे भयावह जख्म देते निकल जाएंगी!

सच पूछिए तो सपा में मेरे सिवाय कोई और समाजवादी नहीं बचा है. मुझे अपनी इस पवित्र पहचान की रक्षा के लिए बापू के चश्मे और गाय माता की तरह परीक्षा देते रहना पड़ेगा!

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