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The Accidental Prime Minister: मनमोहन सिंह के साथ ज्यादती तो नहीं?

बीजेपी को समझना होगा कि 2019 का चुनाव उनके 5 साल के कार्यकाल में लड़ा जाना है. मनमोहन सिंह की तस्वीर फिर से इस्तेमाल करने से ज्यादा फायदा मिलना मुश्किल है इसलिए उन्हें दोबारा घसीटने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है

Updated On: Dec 29, 2018 11:33 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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The Accidental Prime Minister: मनमोहन सिंह के साथ ज्यादती तो नहीं?

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म पर कांग्रेस ने प्रतिक्रिया नहीं देने का फैसला किया है. पार्टी ने तय किया है कि इस विवाद में पड़ने से फिल्म में लोगों की दिलचस्पी बढ़ेगी. इसलिए बीते शुक्रवार को कांग्रेस के स्थापना दिवस पर मनमोहन सिंह राहुल गांधी के साथ केक काटते हुए दिखाई दिए, लेकिन इस फिल्म पर उन्होंने कुछ भी बोलने से परहेज किया. कांग्रेस ने अपने सभी नेताओं को इस फिल्म के विवाद से दूर रहने के लिए कहा है. कांग्रेस यह समझ रही है कि बीजेपी इस फिल्म को चुनावी मुद्दे के तौर पर भुनाने का प्रयास कर रही है.

मनमोहन सिंह ने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के आखिरी दौर में उम्मीद जताई थी कि इतिहास उनके साथ ज्यादती नहीं करेगा, लेकिन इतिहास की जगह अब भविष्य की बात की जा रही है. मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइजर (सलाहकार) की किताब पर बनी फिल्म से 2019 की राजनीति तय की जा रही है. हालांकि मीडिया एडवाइजर की बहुत सी बात इनसाइडर अकाउंट नहीं मानी जा सकती है. मीडिया का काम सीमित दायरे में रहता है न कि सीक्रेट फाइल तक पहुंच रहती है. बहरहाल किताब की मेरिट पर ज्यादा बात करने की गुजाइंश नहीं है. इसलिए बात इस पूरे मुद्दे पर चल रहे राजनीतिक विवाद की- कहा जा रहा है कि मनमोहन सिंह एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे, जिसका रिमोट कंट्रोल सोनिया गांधी के हाथ में था.

डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल पर बनी द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म 11 जनवरी को रिलीज होने जा रही है

मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइजर रहे संजय बारू की लिखी किताब पर आधारित द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म 11 जनवरी को रिलीज होने जा रही है

काठ की हांडी दोबारा?

2014 के हाई पिच कैंपेन में बीजेपी के निशाने पर मां-बेटे (सोनिया गांधी-राहुल गांधी) की सरकार थी. मनमोहन सिंह को कमजोर पीएम कहा गया था. कांग्रेस चुनाव हार गई, लेकिन बीजेपी को समझना होगा कि यह चुनाव उनके 5 साल के कार्यकाल में लड़ा जाना है. मनमोहन सिंह की तस्वीर फिर से इस्तेमाल करने से ज्यादा फायदा मिलना मुश्किल है. मनमोहन सिंह को दोबारा घसीटने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है. दो प्रधानमंत्री की तुलना में मनमोहन सिंह भारी पड़ सकते हैं.

मनमोहन सिंह ने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रेस वार्ता करने की चुनौती दी थी. जाहिर है कि वर्तमान सरकार ने चुनाव में बड़े वायदे किए थे जिसे पूरा करना मुश्किल है. अब सवाल मनमोहन सिंह से नहीं बल्कि मौजूदा सरकार से होना है. नोटबंदी जैसे फैसले केंद्र सरकार पर भारी पड़ रहे हैं. इसलिए मनमोहन सिंह को घेरना बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

मनमोहन सिंह कैसे बने पीएम

2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ कौन चेहरा है. इस तरह ही 2004 में इंडिया शाइनिंग और अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ कौन की बहस में कांग्रेस सबसे बड़ी संसदीय दल बन गई. एनडीए के हाथ से सरकार चली गई. सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा तूल पकड़ रहा था. कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया, जिसको लेकर कांग्रेस में कई दिन तक ड्रामा चलता रहा. कांग्रेस के नेता गंगाचरण राजपूत ने कनपटी पर रिवॉल्वर रख कर प्रदर्शन भी किया था. जिसे सोनिया गांधी ने सही नहीं माना और गंगाचरण राजपूत पार्टी में हाशिए पर चले गए, फिर पार्टी से खुद बाहर हो गए.

सोनिया गांधी के सामने एक निर्विवाद व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने की चुनौती थी. अर्जुन सिंह और प्रणब मुखर्जी की दावेदारी मजबूत थी. यह दोनों नेता सोनिया गांधी के करीबी थे लेकिन दोनों में किसी एक को चुनना पार्टी के भीतर खेमेबंदी को बढ़ावा देता. इसलिए डॉक्टर मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए. संसदीय प्रणाली में सांसद अपना नेता चुनते हैं. इसलिए यह बहस बेकार है कि कौन किसके सामने चेहरा हो सकता है. 1996 में एच.डी देवगौड़ा चेहरा नहीं थे.

फाइल फोटो

नरेंद्र मोदी-मनमोहन सिंह

मोस्ट अंडर एस्टीमेटेड राजनीतिक शख्सियत

मनमोहन सिंह को राजनीतिक नहीं माना जाता है, लेकिन मनमोहन सिंह का ज्यादातर काम राजनीतिक था. 2008 में अमेरिका से सिविल न्यूक्लियर डील में सरकार का दांव लगाना आसान नहीं था. यह जुर्रत करना मुश्किल है. जब पार्टी आपके साथ नहीं चल रही है. मनमोहन ने पार्टी को राजी कर के अपनी सरकार बचाई. वहीं पार्टी के कहने पर कर्ज माफी जैसा बड़ा काम किया था.

2009 में लाल कृष्ण आडवाणी को बीजेपी ने मनमोहन सिंह के विरोध में पेश किया था. काला धन का मुद्दा गरम किया, मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री साबित करने का प्रयास किया गया. मगर 2009 में मनमोहन सिंह दोबारा से  प्रधानमंत्री बने. बीजेपी के नेता सरेआम यह कबूल करते रहे कि मनमोहन सिंह पर हमला करना पार्टी के लिए भारी पड़ गया क्योंकि इस चुनाव में कांग्रेस ने परंपरागत बीजेपी के शहरी सीटों पर कब्जा जमा लिया था.

रिमोट कंट्रोल से संचालन का आरोप?

इस फिल्म में यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि मनमोहन सिंह सोनिया गांधी के रिमोट से संचालित होते रहे हैं. यही आरोप बीजेपी पर लग रहा है कि सरकार का रिमोट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हाथ में है. जिस तरह से संघ का दखल सरकार में है वो जगजाहिर है. संसदीय प्रणाली में पार्टी और जनता महत्वपूर्ण अंग हैं. जनता पहले पार्टी को चुनती है. पार्टी फिर संसदीय दल के नेता का चुनाव करती है. जो भी सरकार बनती है उसकी जवाबदेही संसद और जनता के प्रति होती है.

पार्टी की पॉलिसी नई सरकार लागू करती है. अगर मनमोहन सिंह की महत्वपूर्ण विषयों पर सोनिया गांधी से राय-मशविरा होता रहा है तो इसमें क्या बुराई है?दूसरे हर शुक्रवार को कोर ग्रुप की बैठर में अहम मुद्दों पर बातचीत होती रही है. अटल जी के कार्यकाल में अहम विषयों पर पार्टी के बड़े नेताओं से विचार-विमर्श होता रहा है. हालांकि मनमोहन सिंह की स्थिति एक-आधा मौके पर जरूर खराब हुई है. जिसमें राहुल गांधी का सबके सामने अध्यादेश फाड़ना एक अहम घटना थी. प्रधानमंत्री उस वक्त विदेश यात्रा पर थे. जिसके बाद सरकार ने उसको वापस ले लिया था.

Manmohan Singh

सोनिया गांधी पर मनमोहन सिंह सरकार को रिमोट कंट्रोल से चलाने के आरोप हमेशा लगते रहे हैं

घोटालों के लगे आरोप?

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 3 बड़े घोटाले होने के आरोप लगाए गए हैं. पहला, सीएजी के रिपोर्ट के आधार पर 2जी घोटाला, जिसमें आरोपित मंत्री मुकदमे से बरी हो गए हैं. कोयला घोटाले में किसी मंत्री को सजा नही हुई है. वहीं 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के केस में फैसला आना बाकी है. जाहिर है इन सब की वजह से मनमोहन सिंह की स्थिति खराब हुई थी.

गठबंधन की सरकारों में सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की मजबूरी भी थी. लेकिन मनमोहन सिंह सरकार की उल्टी गिनती निर्भया कांड और लोकपाल के आंदोलन की वजह से हुई है. मनमोहन सिंह की सरकार ने लोकपाल कानून बना दिया लेकिन नई सरकार लोकपाल 5वें साल भी नियुक्त नहीं कर पाई है. महिलाओं की दुर्दशा में भी ज्यादा तब्दीली नहीं आई है.

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