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‘The Accidental Prime Minister’ पर BJP और कांग्रेस का हो-हल्ला कहां तक जायज़?

बीजेपी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से फिल्म का प्रचार करके इस धारणा को मजबूत किया है कि, द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक प्रोपेगेंडा फिल्म है

Updated On: Dec 30, 2018 08:23 PM IST

Sreemoy Talukdar

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‘The Accidental Prime Minister’ पर BJP और कांग्रेस का हो-हल्ला कहां तक जायज़?

भारतीय राजनीतिक में वैचारिक अपरिपक्वता का दौर बदस्तूर जारी है. फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर मची कलह इस बात की ताजा नज़ीर है. फिल्म का ट्रेलर रिलीज होते ही देश भर में हो-हल्ला और हाय-तौबा शुरू हो चुकी है. एक तरफ बीजेपी है, जो इस फिल्म के बहाने गांधी परिवार पर निशाना साध रही है. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस है, जो फिल्म को बीजेपी का प्रोपेगेंडा करार दे रही है.

कांग्रेस का आरोप है कि, आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी फिल्म के जरिए उसके खिलाफ राजनीतिक दुष्प्रचार का प्रयास कर रही है. ज्यादातर कांग्रेसियों का कहना है कि, वे अपनी पार्टी के नेताओं की छवि को नुकसान पहुंचाए जाने की हर कोशिश को नाकाम करेंगे. लिहाजा उन्होंने फिल्म के पुरजोर विरोध का फैसला किया है.

फिल्म 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' एक बायोपिक है. यह फिल्म 11 जनवरी को रिलीज़ होने वाली है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बनी फिल्म 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' इसी नाम की संजय बारू की किताब पर आधारित है. दरअसल संजय बारू साल 2004 से लेकर 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे थे.

बारू ने अपनी किताब में मनमोहन सिंह के बारे में कई अंदरूनी बातों को बेपर्दा किया है. बारू ने किताब में बताया है कि, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह किस तरह यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों की कठपुतली थे. बारू ने किताब में बताया है कि, जिस वक्त मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, उस वक्त प्रधानमंत्री कार्यालय में सोनिया गांधी का कितना दबदबा हुआ करता था.

संजय बारू ने अपनी किताब में लिखा है कि, बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कंधों पर सभी तरह की जिम्मेदारियां तो थीं, लेकिन शक्ति और अधिकार के नाम पर उनके पास कुछ भी नहीं था. उस वक्त सत्ता की असली चाबी तो सोनिया गांधी के पास हुआ करती थी.

मनमोहन सिंह सिर्फ कहने भर के पीएम थे, जबकि प्रधानमंत्री की कुर्सी का असली आनंद तो सोनिया गांधी उठाया करती थीं. उस वक्त यूपीए सरकार पर कई घोटालों के आरोप लगे, लेकिन बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन सभी आरोपों को मौन रहकर सहा.

फिल्म कांग्रेस में परिवारवाद की आंतरिक झांकी भी पेश करती है

संजय बारू के मुताबिक, मनमोहन सिंह तो एक तरह से पीएम की कुर्सी पर खड़ाऊं रखकर राज कर रहे थे, ताकि वक्त आने पर वह कांग्रेस के युवराज यानी राहुल गांधी को गद्दी सौंप सकें. बारू की किताब के इन्हीं दावों ने फिल्म को पेचीदा बना दिया है. यह एक ऐसी बायोपिक है, जो मनमोहन सिंह की जिंदगी के पोशीदा (अदृश्य) पहलुओं पर रौशनी डालती है. इसके अलावा यह फिल्म कांग्रेस में परिवारवाद की आंतरिक झांकी भी पेश करती है.

The accidental prime minister

इसमें कोई दो राय नहीं कि आजादी के बाद से ही कांग्रेस में गांधी परिवार का दबदबा रहा है. लेकिन पार्टी में गांधी परिवार के दखल के तरीके से ज्यादातर लोग वाकिफ नहीं हैं. लिहाजा संजय बारू की किताब और उस पर बनी फिल्म कांग्रेस में गांधी परिवार के राजनीतिक दबदबे और उसके अदृश्य पारिस्थितिक तंत्र की भी तस्वीर पेश करती है.

साल 2014 में बीजेपी के जबरदस्त उत्थान ने भारत में बहुत सी चीजों को बदल कर रख दिया है. कई संरचनात्मक बदलावों के बीच, भारतीय राजनीति में जहां कांग्रेस का प्रभाव घटा, वहीं बीजेपी के सियासी दबदबे में व्यापक वृद्धि हुई. बीते साढ़े चार साल में इन्हीं बदलावों के बीच 'इंदु सरकार' जैसी फिल्मों के लिए जगह बनी.

फिल्म 'इंदु सरकार' की विषय वस्तु आपातकाल थी. जाहिर है कि, इससे पहले भारतीय राजनीति में सिर्फ कांग्रेस का एकतरफा बोलबाला हुआ करता था. लिहाजा कोई भी फिल्मकार आपातकाल जैसे विषय पर आधारित फिल्म के निर्माण के बारे में सोच भी नहीं सकता था, क्योंकि तब उस फिल्म को सेंसर बोर्ड से पास करा पाना लगभग नामुमकिन था. लेकिन अब वक्त के साथ हालात बदल चुके हैं.

दरअसल फिल्में हमारी लोकप्रिय संस्कृति (पॉपुलर कल्चर) का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं. हमारे समाज के आम जनमानस पर फिल्मों का सामूहिक प्रभाव पड़ता है. फिल्में हमारे रवैए, हमारी सोच, हमारी जिंदगी में अहम बदलाव लाती हैं. लिहाजा एक जीवंत लोकतंत्र में, किसी भी विषय विशेष को एक टैबू (निषेध) के रूप में अलग-थलग करके नहीं रखा जा सकता है.

बीजेपी को बैठे-बिठाए मिला कांग्रेस पर हमला करने का बढ़िया मौका

बायोपिक होने का दावा करने वाली फिल्म 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में मनमोहन सिंह के अलावा कई और व्यक्तियों के जीवन को चित्रित किया गया है. फिल्म में सभी चरित्रों के लिए उनके असल जिंदगी के वास्तविक नामों का उपयोग हुआ है. फिल्म में कांग्रेस पार्टी की आंतरिक कार्यशैली, पार्टी में गांधी परिवार के प्रभुत्व को दर्शाया गया है.

ऐसे में बीजेपी को बैठे-बिठाए कांग्रेस पर हमला बोलने का बढ़िया मौका मिल गया है. बीजेपी अब एक बार फिर नए सिरे से कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाकर दनादन तीर छोड़ रही है. दूसरी ओर फिल्म को लेकर कांग्रेस खासी असहज नजर आ रही है. फिल्म का विषय ऐसा है कि, कांग्रेस जनता के बीच इसकी चर्चा करने से बचना चाहती है.

तथ्य यह है कि, फिल्म 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' एक अंदरूनी सूत्र द्वारा लिखित किताब पर आधारित है. इस किताब के जरिए कांग्रेस में गांधी-नेहरू परिवार के आंतरिक कामकाज के तौर-तरीकों की पड़ताल और उनके गंभीर मूल्यांकन की कोशिश की गई है. जाहिर है, ऐसे विषय पर बनी फिल्म से कांग्रेस की पेशानी पर बल पड़ना लाजमी है.

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कांग्रेस की दलील है कि, फिल्म का ट्रेलर मनमोहन सिंह की घटिया छवि पेश करता है. दूसरी ओर कई लोगों का मानना है कि, पूर्व पीएम के रोल में अभिनेता अनुपम खेर बेहतरीन अभिनय करते नजर आ रहे हैं. हालांकि फिल्म में अनुपम के अलावा कोई और बड़ा स्टार नहीं है. फिल्म के साथ सिर्फ एक यही समस्या नहीं है.

बेहद कम बजट और खराब स्क्रिप्ट के चलते भी फिल्म ज्यादा प्रभाव छोड़ती नजर नहीं आती है. पेशेवर प्रोडक्शन क्वालिटी के मानकों पर भी फिल्म खरी उतरती नहीं दिखती. जैसा कि लेखक और फिल्म समीक्षक अर्नब रे ने ट्वीट करके कहा है, कमजोर प्रोडक्शन क्वालिटी के चलते फिल्म को कला (आर्ट) का दर्जा देकर भी इसका बचाव करना मुश्किल है.

राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय पर आधारित फिल्म के लिए यह बेहद जरूरी होता है कि, वह पेशेवर मानकों पर खरी हो. ऐसी फिल्मों को निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी, स्क्रिप्ट, एडिटिंग, अभिनय और निर्माण के संदर्भ में अपनी पकड़ बनाने में सक्षम होना चाहिए. दरअसल संवेदनशील विषयों पर आधारित फिल्मों पर हमेशा प्रोपेगेंडा फिल्म होने के आरोप लगा करते हैं. लिहाजा दुष्प्रचार फैलाने का आरोप लगाकर उन्हें खारिज किए जाने का खतरा अक्सर मंडराता रहता है.

बीजेपी ने ट्वीट कर साबित कर दिया कि यह एक प्रोपेगेंडा फिल्म है

विडंबना यह है कि, बीजेपी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से फिल्म का प्रचार करके इस धारणा को मजबूत किया है कि, द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक प्रोपेगेंडा फिल्म है. यानी भगवा पार्टी ने अनचाहे यह संदेश दे दिया है कि फिल्म उसकी ओर से प्रायोजित है. ऐसे में इसे 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले की चुनाव प्रचार अभियान सामग्री से ज्यादा तवज्जो मिलना मुश्किल लगता है.

एक फिल्म के जरिए राजनीतिक लाभ लेने और आधिकारिक स्तर पर अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश में, बीजेपी ने न केवल एक अच्छे कार्य और उसके उद्देश्य के मूल्यांकन को असंभव बना दिया है, बल्कि इसने फिल्म की क्वालिटी को भी घटा दिया है.

अपनी सभी वास्तविक और कथित खामियों के लिए फिल्म ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को अब 'बीजेपी का प्रोपेगेंडा' होने के कलंक से जूझना होगा. ऐसे में इस फिल्म के लिए तटस्थ दर्शकों को आकर्षित कर पाना मुश्किल नजर आता है.

खैर, सूचना और प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर अपनी पार्टी की कारगुजारियों और बयानों को यह कहकर सही ठहरा सकते हैं कि, बीजेपी केवल एक फिल्म के लिए 'शुभेच्छाएं' दे रही है. फिल्म में अनुपम खेर के बेजोड़ अभिनय की हर ओर चर्चा हो रही है. लिहाजा उनके काम को खारिज करना कठिन है.

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बीजेपी की तरफ से फिल्म को लेकर दिए गए बयानों को मार्केटिंग गिमिक या प्रचार के स्टंट भी करार दिया जा सकता है. लेकिन बीजेपी यह भूल रही है कि, किसी चीज के प्रचार को सफल बनाने के लिए 'अहिंसा' का रास्ता सबसे जरूरी होता है.

हालांकि, भारत में राजनीतिक चर्चा-परिचर्चाएं और कार्रवाइयां अक्सर हास्यास्पद और सोच से उल्टे हालात पैदा कर देती हैं. फिल्म ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के साथ भी कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है. राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित होने की वजह से फिल्म पर हाय-तौबा मची हुई है.

ठंडे दिमाग से कांग्रेस को उठाना चाहिए कदम

बीजेपी जहां आधिकारिक रूप से फिल्म को बढ़ावा देकर एक बड़ी भूल कर बैठी है, वहीं कांग्रेस ने फिल्म के ट्रेलर पर हंगामा खड़ा करके उससे भी बड़ी भूल कर दी है. हो-हल्ला और विवाद के चलते फिल्म को पर्याप्त प्रचार मिल रहा है. लोगों में फिल्म को लेकर उत्सुकता पैदा हो रही है. ऐसे में फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर हिट होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं.

कांग्रेस को इस फिल्म के मुद्दे से ठंडे दिमाग के साथ होशियारी से निपटना चाहिए था. दरअसल किसी फिल्म को लेकर लोगों की धारणाएं उस फिल्म की 'तटस्थता' में निहित होती हैं. इस फिल्म से चिंतित होने के लिए कांग्रेस के पास पर्याप्त कारण मौजूद हैं. फिल्म से निश्चित रूप से कांग्रेस की छवि पर दाग लग सकता है. कांग्रेस के बारे में जनता की धारणाएं प्रभावित हो सकती हैं.

इसके अलावा, मनमोहन सिंह जो बतौर प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान हमेशा भ्रष्टाचार के आरोपों और उनकी जांच से घिरे रहे, अगर फिल्म में उन्हें 'अपराधी' के बजाय 'शहीद' और कांग्रेस की आंतरिक राजनीति के शिकार के रूप में दर्शाया गया है, तो इससे उनकी साख को बट्ठा लग सकता है.

लिहाजा कांग्रेस रिलीज से पहले फिल्म की 'स्क्रीनिंग' की मांग कर सकती है. कांग्रेस की ओर से फिल्म की सेंसरशिप की भी मांग की जा सकती है. इसके अलावा फिल्म को 'झूठा प्रचार' और वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश भी करार दिया जा सकता है. यानी कांग्रेस के पास कई विकल्प हैं, जिनके जरिए वह इस फिल्म की प्रासंगिकता को खत्म कर सकती है और बढ़ते प्रचार पर पानी फेर सकती है.

राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों ने फिल्म ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को रिलीज से पहले ही खासा चर्चित कर दिया है. फिल्म का ट्रेलर बड़ी तादाद में जनता का ध्यान खींच रहा है. फिल्म अगर वास्तव में सफल हो जाती है, तो यह भारतीय राजनीति की अपरिपक्वता का प्रमाण होगी. उम्मीद है कि, कम से कम बीजेपी तो इस मामले में को शिकवा-शिकायत नहीं करेगी.

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