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नेहरू-गांधी परिवार से 3 पीएम बनने की वजह देश है, उनकी महानता नहीं

बेशक आनंद शर्मा अपनी नेता-भक्ति में भाव-विभोर हो रहे हैं लेकिन राहुल गांधी की एकमात्र योग्यता है कि वे सोनिया और राजीव के बेटे हैं.

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Nov 28, 2017 06:16 PM IST

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नेहरू-गांधी परिवार से 3 पीएम बनने की वजह देश है, उनकी महानता नहीं

आतंकियों का सरगना हाफिज़ सईद पाकिस्तान में फिर से छुट्टा घूमने लगा है तो इस बात पर राहुल गांधी ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिप्लोमेसी का मजाक उड़ाया और जवाब में बीजेपी के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने राहुल गांधी को लश्कर-ए-तैयबा का हमदर्द कहा. बीजेपी के जवाबी हमले से धराशाई होने के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर से भावनाओं को उभारने का दांव खेला है. कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा ने याद दिलाया है कि इस देश को बनाने में गांधी-नेहरू परिवार का कितना योगदान रहा है.

आनंद शर्मा ने राहुल की तरफदारी में पूरी ताकत झोंक दी है और कहा है कि, 'यह बड़ा शर्मनाक है. इसकी निंदा की जानी चाहिए. मारे घमंड के बीजेपी के नेताओं का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. राहुल कांग्रेस के नेता हैं और कांग्रेस ने आतंकवाद से लड़ते हुए और देश को एक रखने के लिए कुर्बानियां दी हैं. वे लोग अगर ऐसा कह रहे हैं तो मैं यही कहूंगा कि वे लोग नीचता की हद पर उतर रहे हैं.' अगर आनंद शर्मा की मानें तो राहुल गांधी एक खास परिवार में जन्म लेने के कारण सहज ही सारी प्रशंसा के काबिल हैं.

जनता का विश्वास काबिलेतारीफ, कोई विशेष परिवार नहीं

इसमें कोई शक नहीं कि आनंद शर्मा उस पीढ़ी के राजनेता हैं जिसने राजनीति में टिके रहने के लिए एक खानदान से चिपके रहना ठीक समझा और इस खानदान को मौका दिया कि वह कांग्रेस नाम के एक शानदार और गौरवपूर्ण आंदोलन पर एकाधिकार करे, उसे भ्रष्ट बनाए. आज की कांग्रेस को बीते जमाने की कांग्रेस की संतान मानना दरअसल झूठ से भी बदतर बात है.

साल 1959 में जब इंदिरा गांधी का कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आरोहण हुआ तो जवाहर लाल नेहरू के प्रशंसकों तक को यह बात हैरतअंगेज लगी थी. इंदिरा के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के साथ ही एक घटना और घटी. केरल में लोकतांत्रिक रीति से चुनकर बनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया. कांग्रेस में इंदिरा की चली और नेहरू पीछे हो गए. इससे नेहरू का अपने संतान को लेकर अंधमोह ही जाहिर होता है. उस वक्त के दिग्गज नेताओं को नेहरू की यह कमजोरी नागवार गुजरी थी और कई नेता नेहरू से दूर चल गए थे.

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आज के सियासी माहौल के ऐतबार से जब कांग्रेस अपना डूबता जहाज बचाने के लिए किसी तिनके की तलाश में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, यह इतिहास माफिक बैठता है. कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर राहुल का आरोहण इसी का नमूना है. इससे ज्यादा बेवक्त बात और क्या होगी. और फिर इससे बुरी राजनीतिक रणनीति नहीं हो सकती कि राहुल गांधी को एक ऐसे परिवार का बेटा बताकर पेश किया जाए जिसने राष्ट्र के निर्माण में बड़ा योगदान किया है.

वंशवाद की बेल

आइए, यहां सीधे-सीधे इसी पर बात कर लें कि राहुल गांधी के परिवार का योगदान क्या रहा है. यह साबित बात है कि नेहरू इस परिवार में एक अपवाद की तरह हैं और उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. वे बेमिसाल सियासी हस्ती थे, उनकी ताकत और कमजोरी पर ऐतिहासिक रूप से बहस की जा सकती है लेकिन इस बहस से उनके कद की ऊंचाई को कम नहीं किया जा सकता. लेकिन इंदिरा गांधी के बारे में क्या कहेंगे? इंदिरा गांधी को सियासत का ककहरा उनके पिता और आजादी की लड़ाई के बाकी दिग्गजों ने पढ़ाया था लेकिन नेहरू की बेटी होने की बिनाह पर उन्होंने जिस कुटिलता से प्रधानमंत्री का पद हासिल किया उसकी कोई सानी नहीं. राष्ट्र उस वक्त नेहरू की शख्सियत पर मुग्ध था, उसने अभी-अभी अपने पंख पसारे थे और दौर नएपन का था, सो इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद पर जा बैठने के पीछे अगर राष्ट्र को कुछ अनुचित लगा तो उसने जल्दी ही इसे भुला दिया.

यह तर्क देना कि इंदिरा गांधी गरीबों की हमदर्द थीं कुछ ऐसा ही है मानो कोई यह कहे कि उद्योगपति तो अपने उद्योग गरीबों को नौकरी देने के लिए खड़े करते हैं.

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क्या ये सच नहीं है कि प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे सबसे लंबे कार्यकाल (नेहरू के बाद) में उनका गरीबी हटाओ का नारा ठीक वैसा ही सियासी जुमला था जैसा कि अब कांग्रेस बीजेपी के बारे में शोर करते दिखती है? इस बात को जानने के लिए किसी वैज्ञानिक की तरह गहन छानबीन करने की जरुरत नहीं कि इंदिरा गांधी की देखरेख में लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं को मटियामेट किया गया.

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अब जरा राजीव गांधी के मामले पर गौर कर लें. वे संजय गांधी की मौत के बाद ‘राजनीति के दलदल’ (यह जुमला राजीव गांधी के दोस्त अमिताभ बच्चन ने इस्तेमाल किया था) में ऊपर से टपका दिए जाने के तुरंत पहले तक खुशी-खुशी पायलट की जिंदगी जी रहे थे. चाटुकारिता के चलन ने कांग्रेस में एक बार फिर अपना रंग दिखाया. चाटुकारिता के ये रंग इतना गहरा था कि वीपी सिंह जैसे नेता ने कांग्रेस के सत्र में बड़े भाव भरे स्वर में कहा था, 'मेरा कृष्ण मुझे दे दो.'

इंदिरा गांधी की हत्या की त्रासदी के बाद राष्ट्र ने इस आघात से उबरने के अंदाज में राजीव गांधी को उनका उत्तराधिकारी चुना. एक बार फिर भावनाओं का उमड़ा हुआ ज्वार कांग्रेस के लिए निजात की राह साबित हुआ. पंजाब में उभरे भयावह उपद्रव के बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ था, फिर प्रधानमंत्री की हत्या हुई और उसके बाद सिख-विरोधी दंगे हुए. इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में देश की जनता ने देश की एकता और सामंजस्य का ठोस संदेश देने के लिए शहीद प्रधानमंत्री के बेटे को उत्तराधिकारी चुना.

ऊपर से घोटाले का कलंक

हमारी छवि एक ऐसे समाज की है जो अतीत के गौरवगान में लगा रहता है. जो लोग आज राजीव गांधी की प्रशंसा करते नहीं थकते उन्हें 1987-89 के वक्त के अखबार की सुर्खियां देखनी चाहिए जब वीपी सिंह ने राजीव गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और बोफोर्स की दलाली वाले कांड में उन्हें 'चोर' बताया था. और, ऐसा भी नहीं कि इस आरोप में कोई दम ही ना हो.

संजय गांधी और राजीव गांधी के साथ इंदिरा गांधी

संजय गांधी और राजीव गांधी के साथ इंदिरा गांधी

राजीव गांधी एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता से बेदखल हुए जिसके पद पर रहते देश ने उस वक्त तक का सबसे बड़ा घोटाला देखा था. और इसी वाकये से वीपी सिंह का उभार हुआ जबकि उनका अपना कोई पार्टी-संगठन नहीं था. बोफोर्स सत्ता के ऊंचे पदों पर होने वाले भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया और बाद को बोफोर्स-घोटाले की जगह 2जी, सीडब्ल्यूजी तथा कोयला-खदान के आवंटन के घोटाले ने ले ली जो 10 जनपथ तथा 12 तुगलक रोड (सोनिया गांधी और राहुल गाधी) के इशारे पर कदम-ताल करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नाक के नीचे हुए.

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अब इंदिरा गांधी के बाद देश के सबसे बड़े ताकतवर नेता के रूप मे नरेंद्र मोदी के उभार पर बात कर लें. सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के पद पर अपना मनचाहा आदमी बैठाकर देश का राजकाज चलाया और इसी पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी का ताकतवर नेता के रूप में उदय हुआ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने से ऐन पहले जिस तरीके से कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी के संविधान में संशोधन करके सदन का नेता (दरअसल प्रधानमंत्री) चुनने का सारा अधिकार सोनिया को दे दिया उससे साफ पता चलता है कि सत्ता की डोर किसके हाथ में थी.

मनमोहन सिंह की किस्मत कहिए कि उनके पहले कार्यकाल के दौरान विपक्ष का चेहरा एल के आडवाणी थे और वे प्रधानमंत्री को कमजोर ठहराने के अलावे विरोध का और कोई मुहावरा खड़ा नहीं कर पाए. आडवाणी का गढ़ा मुहावरा उस वक्त खारिज हो गया क्योंकि तब तक मजबूत नेता होने का आडवाणी का प्रभामंडल कमजोर पड़ चुका था, आरएसएस-बीजेपी के नेतृत्व ने सिलसिलेवार उनकी बेअदबी की थी.

आडवाणी के एकदम उलट मोदी ने 2014 में विरोध का नया मुहावरा गढ़ा. पार्टी के भीतर दबदबा बढ़ने के साथ मोदी ने उन मुद्दों पर अभियान चलाना शुरु किया जिसका पूरे देश की जनता के साथ जुड़ाव था. मोदी के साढ़े तीन साल के कार्यकाल की ढेरों कमियां हो सकती हैं लेकिन एक बात एकदम तय है- आज सियासत की कथा के नायक नरेंद्र मोदी ही हैं.

अगर कोई गौर करे कि मोदी के पसंदीदा विषय छोटे-छोटे अंतराल के बाद कैसे उभरकर सामने आते हैं तो बड़ा अचंभा होगा. मोदी के उठाए मुद्दों को जुमला मात्र कहना बचकानापन है. उज्ज्वला और जन-धन योजना का ग्रामीण इलाकों में लोगों की जिंदगी पर सकारात्मक असर हुआ है. स्वच्छ भारत अभियान अभी जमीनी तौर पर गति पकड़ने की स्थिति में है और इस योजना के जरिए लोगों की मानसिकता, जीवनशैली और देश के ग्रामीण इलाकों में सेहत की दशा सुधारने में मदद मिली है.

नरेन्द्र मोदी और इंदिरा गांधी

नरेन्द्र मोदी और इंदिरा गांधी

सियासी मुहावरों के इस नए और बदले हुए माहौल में क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी के पास मोदी की काट करने के लिए कोई नया विचार है? वे बस कच्चे उम्र की अधपकी बातें उछालते रहते हैं जिनका जोर सोशल मीडिया पर तो चल सकता है लेकिन व्यापक जनता के बीच उसकी पैठ नहीं हो सकती. अच्छा होगा कि राहुल गांधी मन लगाकर इस बात का अध्ययन करते कि नीतीश कुमार ने 2015 में बिहार के चुनावों में मोदी को कैसे मात दी. नीतीश ने बड़ी बारीकी से अपना मुहावरा गढ़ा था और बीजेपी उस मुहावरा के इर्द-गिर्द प्रतिक्रियाएं देने के लिए मजबूर हो गई थी. बड़ी समस्या ये है कि आनंद शर्मा जैसे नेता सहानुभूति जगाने की बेकार की कोशिश में हाथ-पैर मार रहे हैं जबकि सहानुभूति कहीं है ही नहीं.

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किसी एक परिवार ने राष्ट्र की निस्वार्थ सेवा की है तो इसमें कोई खास बात नहीं. अगर तीन प्रधानमंत्री, एक सुपर प्रधानमंत्री और एक प्रधानमंत्री पद का दावेदार मेरे या फिर आपके परिवार से निकलें तो फिर हमें भारत के मतदाताओं की उदारता की प्रशंसा करनी चाहिए ना कि अपने परिवार की तथाकथित महानता की. बेशक आनंद शर्मा अपनी नेता-भक्ति में भाव-विभोर हो रहे हैं लेकिन राहुल गांधी की एकमात्र योग्यता है कि वे सोनिया और राजीव के बेटे हैं और ये दोनों इंदिरा गांधी के बेटा-बहू हैं और खुद इंदिरा गांधी जवाहरलाल नेहरू की बेटी थीं.

अगर इस वंशावली को अलग कर दें तो फिर राहुल गांधी के पास ऐसी कोई साख नहीं कि वे देश के ऊंचे पद के काबिल लगें.

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