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तेलंगाना चुनाव 2018: KCR को सबक सिखाकर क्या राज्य में कमबैक करेगी कांग्रेस

तेलंगाना में कांग्रेस चुनाव के एलान के समय ऑफ गार्ड थी लेकिन धीरे ही सही पार्टी जमीनी स्तर पर मजबूत हो रही है

Updated On: Nov 26, 2018 07:21 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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तेलंगाना चुनाव 2018: KCR को सबक सिखाकर क्या राज्य में कमबैक करेगी कांग्रेस

देश के 3 बड़े राज्यों के चुनावी शोरगुल में तेलंगाना की चर्चा कम हो रही है. लेकिन लोकसभा की सीटों के लिहाज से यह महत्वपूर्ण राज्य है. तेलंगाना में कांग्रेस चुनाव के एलान के समय ऑफ गार्ड थी लेकिन धीरे ही सही पार्टी जमीनी स्तर पर मजबूत हो रही है.

पीपुल्स अलायंस यानी प्रजाकुतामी में 4 पार्टियों का गठबंधन है. जिसमें कांग्रेस, टीडीपी, सीपीआई और तेलंगाना जन समिति हिस्सेदार हैं. इस गठबंधन के वजूद के आने के बाद सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के माथे पर बल पड़ गया है. टीआरएस के नेता केसीआर को एकतरफा चुनाव की उम्मीद थी लेकिन अब संघर्ष कड़ा हो गया है. कांग्रेस भी भांप गई है कि अचानक वो लड़ाई में आ गई है और सत्ता के करीब है. इसलिए सोनिया गांधी को चुनाव प्रचार में उतारा गया है.

राज्य बनाने का क्रेडिट

राज्य बनाने के लिए तेलंगाना के नेता केसीआर ने संघर्ष किया और 2014 में वो राज्य के पहले मुख्यमंत्री भी बन गए. लेकिन कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान हुआ है. आंध्र और तेलंगाना दोनों जगह कांग्रेस साफ हो गई है. सोनिया गांधी ने तेलंगाना के चुनावी सभा में इसका जिक्र भी किया कि उनके लिए यह फैसला करना मुश्किल था कि नया राज्य बनाया जाए या नहीं लेकिन उन्होंने राजनीतिक नुकसान का ख्याल नहीं किया बल्कि लोगों के हित का ध्यान रखा है.

सोनिया गांधी ने भावुकता के साथ अपनी बात कही कि वो ऐसी मां हैं जो कई साल बाद अपने बच्चों से मिल रहीं हैं. वो चाहती हैं कि बच्चे फले-फूलें लेकिन केसीआर के राज में ऐसा नहीं हो पाया है. सोनिया गांधी की टीस का मतलब है कि राज्य बनवाने में अहम किरदार अदा करने के बाद पार्टी की यह हालत हो गई है. अब राज्य बनाने का क्रेडिट कांग्रेस ले रही है. हालांकि तेलंगाना के लिए बीजेपी ने भी समर्थन किया था.

सोनिया गांधी

सोनिया गांधी

कांग्रेस से चूक

यह चुनाव कांग्रेस के लिए टीआरएस से बदला लेने का मौका है. कांग्रेस के तत्कालीन राज्य के प्रभारी दिग्विजय सिंह केसीआर की नीयत को भांप नहीं पाए थे. बताया जाता है कि राज्य के बदले केसीआर ने कांग्रेस में विलय की पेशकश की थी, कांग्रेस को भी लगा सौदा बुरा नहीं है. कांग्रेस की हालत जगन मोहन रेड्डी की बगावत से प्रदेश में खराब थी. पार्टी को लगा जो नुकसान आंध्र में होगा उसकी भरपाई तेलंगाना से हो जाएगी. एक बार राज्य बन जाने के बाद के. चंद्रशेखर राव मुकर गए और विलय की बात तो दरकिनार कांग्रेस से गठबंधन करने से भी इनकार कर दिया था.

केसीआर राज्य गठन में कांग्रेस को कोई क्रेडिट नहीं देना चाहते थे. तेलंगाना के संघर्ष में पार्टी के कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़कर चले गए, जिसमें पार्टी के वर्किंग कमेटी के सदस्य केशव राव भी थे. लेकिन इस चूक की भरपाई कांग्रेस इस चुनाव में करने का प्रयास कर रही है.

सीनियर नेता की निगरानी

कांग्रेस इस चुनाव को गंभीरता से ले रही है. इसलिए पार्टी के सीनियर नेता चुनाव की निगरानी कर रहें हैं. अहमद पटेल की देखरेख में कांग्रेस चुनाव लड़ रही है. कर्नाटक के संकटमोचक डी के शिवकुमार ने प्रदेश में चुनाव की कमान संभाल ली है. वो कई बागी उम्मीदवारों से मिले भी हैं और कुछ को मनाने में उन्होंने कामयाबी भी हासिल की है. कई जगह बागी कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं. कांग्रेस हर सीट के लिहाज से तैयारी कर रही है. कांग्रेस को लग रहा है कि हालात पार्टी के लिए अनुकूल हैं.

गठबंधन में ऑल इज नॉट वेल

कांग्रेस की अगुवाई में बने गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है. कहीं बागी खेल बिगाड़ने में तुले हैं. कांग्रेस ने खुद तयशुदा सीट से ज्यादा उम्मीदवार उतार दिए हैं. कांग्रेस ने 99 सीट पर अपने कैंडिडेट उतारे हैं, जबकि चुनावी समझौते के तहत पार्टी को 94 सीट पर लड़ना था, अब 5 सीट पर टीजेएस भी मुकाबले में है. लेकिन राज्य में टीआरएस को पटखनी देने के लिए सभी दल एकजुट नजर आ रहें हैं. हालांकि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता कितना एकजुट हैं, यह बड़ा सवाल है. हालांकि केसीआर के सामने भी कई चुनौतियां हैं.

केसीआर

केसीआर

केसीआर का दांव उल्टा

तेलंगाना चुनाव में केसीआर का दांव उल्टा पड़ सकता है. केसीआर को लगा कि लोकसभा चुनाव के साथ चुनाव कराने में बीजेपी के विरोध में कांग्रेस को फायदा हो सकता है. केसीआर की प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात ने इस दांव को बेकार कर दिया है. बीजेपी के साथ चल रही आंख-मिचौली का भी नुकसान टीआरएस को हो रहा है. कई सांसदों ने टीआरएस से इस्तीफा दे दिया है.

केसीआर ने जब विधानसभा भंग करने का फैसला किया था, तो ऐसा लग रहा था कि मुकाबले में कोई नहीं है. किसी राजनीतिक दल की तैयारी भी नहीं थी. लेकिन गठबंधन बनने से टीआरएस को नुकसान हो रहा है. टीआरएस को भी अंदाजा नहीं था कि कांग्रेस इतना बड़ा गठबंधन खड़ा कर लेगी, सरकार के खिलाफ माहौल बन जाएगा, लेकिन चुनाव में मतदान तक समीकरण बनते बिगड़ते हैं. बाजी किसके हाथ लगेगी यह कहना मुश्किल है, लेकिन केसीआर को हालात का अंदाजा है. मीडिया रिपोर्टस के हवाले से खबर आ रही है कि पहले केसीआर एकतरफा चुनाव की बात करते थे लेकिन अब 90 सीट जीतने का दावा कर रहे हैं.

केसीआर के सामने नीलू, निधूलू और नियामाकालू का सवाल उठाया जा रहा है. उनके विरोधी पानी, फंड और नौकरी का मसला उठा रहे हैं. कांग्रेस का आरोप है कि इन सभी फ्रंट पर सरकार फेल हो गई है. सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि टीआरएस परिवारिक पार्टी बन गई है.

किस ओर अल्पसंख्यक

बीजेपी के साथ रिश्ते सुधारने से टीआरएस का मुस्लिम वोट छिटका है, एआईएमएम भी टीआरएस के विरोध में है. लेकिन कांग्रेस के बड़े अल्पसंख्यक नेता आबिद रसूल खान चुनाव में टिकट वितरण से नाराज होकर टीआरएस में शामिल हो गए हैं, जिससे कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. केसीआर ने भी मुस्लिम आबादी को खुश करने के लिए एक डिप्टी सीएम बनाया था, राज्य में रिजर्वेशन का कोटा भी बढ़ाया है.

फोटो एएनआई से

केसीआर पूर्व में कई बार विभिन्न मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सहमति जता चुके हैं (फोटो: एएनआई से)

तेलंगाना में तकरीबन 13 फीसदी मुस्लिम आबादी है. इस आबादी का ज्यादा हिस्सा हैदराबाद में रहता है. करीमनगर, निजामाबाद, महबूबनगर में इस अल्पसंख्यक समुदाय की काफी तादाद है. आंकड़ों के हिसाब से 29 सीट पर मुस्लिमों का रोल तय करेगा कि कौन चुनाव जीतेगा, वही 30 अन्य सीट पर निर्णायक वोट है. तेलंगाना में विधानसभा की 119 सीटें हैं.

कांग्रेस के पूर्व अल्पसंख्यक विभाग के सचिव अनीस दुर्रानी का कहना है कि वहां बीजेपी का वजूद नहीं है, मुस्लिम भी समझ रहा है कि केसीआर बीजेपी के साथ जा सकते है. कांग्रेस लड़ाई में है, इसलिए चुनाव में कांग्रेस को वोट मिलेगा, एआईएमआईएम का बीजेपी विरोध बीजेपी को ही फायदा पहुंचाने के लिए है. एआईएमआईएम के अकबरुद्दीन ओवैसी का कहना है कि कांग्रेस का विरोध करो तो प्रो-बीजेपी होने का आरोप लगाया जाता है, हम कांग्रेस-बीजेपी दोनों के विरोध में हैं.

ओपिनियन पोल में टीआरएस को बढ़त

कांग्रेस पुरजोर कोशिश कर रही है, लेकिन कई सर्वे रिपोर्ट टीआरएस की बढ़त दिखा रहे हैं. ओपिनियन पोल केसीआर की पार्टी को तकरीबन 70 सीट दे रहे हैं. यह तादाद पिछले चुनाव से 20 कम है. वर्ष 2014 में टीआरएस को 90 सीटें मिली थी. अगर हालात बदले तो केसीआर के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है. हालांकि 119 सदस्य वाली विधानसभा में 60 सीट वाली पार्टी सरकार बना सकती है.

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