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तेलंगाना के चुनावों पर जबरदस्त असर डाल सकता है आदिवासी-लंबाडा विवाद

लंबे समय से चल रहा तेलंगाना का आदिवासी-लंबाडा विवाद अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 10 विधानसभा सीटों पर चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकता है.

Updated On: Nov 20, 2018 04:54 PM IST

Maheswara Reddy

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तेलंगाना के चुनावों पर जबरदस्त असर डाल सकता है आदिवासी-लंबाडा विवाद

लंबे समय से चल रहा तेलंगाना का आदिवासी-लंबाडा विवाद अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 10 विधानसभा सीटों पर चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकता है. राज्य में 7 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए तेजी से तैयारी चल रही है.

अविभाजित आंध्र प्रदेश सरकार की सरकार द्वारा 1976 मे घुमंतू लंबाडा या बंजारा समुदाय को अनुसूचित जनजाति कैटेगरी में शामिल किए जाने के बाद से ही दोनों समुदायों के बीच सरकारी लाभों को लेकर संघर्ष होता रहा है. बंजारा समुदाय को अध्यादेश के जरिये इस कैटेगरी में जोड़ा गया था.

लंबाडा समुदाय के आरक्षण पर आदिवासियों को सख्त ऐतराज

यहां के आदिवासियों की शिकायत यह है कि घुमंतू लंबाडा समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने के योग्य नहीं है, क्योंकि उन्हें इस श्रेणी में शामिल किए जाने की प्रक्रिया आधी-अधूरी रह गई थी. आदिवासी समुदाय के लोगों का यह भी आरोप है कि लंबाडा समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किए जाने से उसके अपने समुदाय को नौकरियों, कोटा और अन्य कई तरह के अवसरों से वंचित होना पड़ा है.

2011 की जनगणना के मुताबिक, तेलंगना में लंबाडा समुदाय के लोगों की संख्या 22 लाख और आदिवासियों की संख्या 9.50 लाख थी. अक्टूबर और नवंबर 2017 में दोनों समुदायों के बीच तनाव उस वक्त सामने आया, जब आदिवासियों ने अदिलाबादा जिला अधिकारी ऑफिस के बाहर दो दिनों तक विरोध-प्रदर्शन किया.

साथ ही, इस विवाद ने उस समय हिंसात्मक मोड़ ले लिया, जब दो समूहों ने अदिलाबाद में एक-दूसरे समुदाय के गांव पर हमला कर दिया. साथ ही, आदिवासी पेरेंट्स ने उन स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने से मना कर दिया, जहां लंबाडा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले शिक्षक काम करते थे. हालात इस स्तर तक पहुंच गए कि पुलिस को नियंत्रण संबंधी आदेश जारी करना पड़ा. इसके तहत पुलिस ने सूचनाएं को छापने और प्रसारित करने पर रोक लगा दी और असिफाबाद, अदिलाबाद और निर्मल जिलों में इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदी लगी दी.

आदिलाबाद में आदिवासी समुदाय की एक बैठक की तस्वीर

आदिलाबाद में आदिवासी समुदाय की एक बैठक की तस्वीर

अब आदिवासी इस लड़ाई को राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. वे लंबाडा समुदाय के लोगों को उनके पारंपरिक गढ़ खानपुर में चुनौती देकर ऐसा करने की योजना बना रहे हैं.

पार्टियों की क्या है स्थिति?

साल 2014 के विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 10 सीटों में से 6 पर राज्य की मौजूदा सत्ताधारी पार्टी टीआरएस ने जीत हासिल की थी. अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए विधानसभा की जो 10 सीटें आरक्षित हैं, उनमें असिफाबाद, खानपुर, अदिलाबाद जिले का बोथ, वायरा, अस्वरापेता, येलेन्डु, भद्राचलम, खम्मम जिले में पिनापाका और वारंगल जिले की महबूबाबाद और मुलुग शामिल हैं.

कुछ साल पहले तीन अन्य विधानसभा क्षेत्रों के विपक्षी पार्टी के विधायक टीआरएस में चले गए थे और इस तरह से पार्टी का आंकड़ा बढ़कर 9 पर पहुंच गया. ऐसी ही एक सीट, भद्राचलम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के उम्मीदवार ने भी जीत हासिल की थी.

इस बार खानपुर में आदिवासियों ने खुलेआम भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करने का ऐलान किया है. दरअसल, कांग्रेस द्वारा लंबाडा समुदाय से आने वाले उम्मीदवार उतारे जाने के बाद आदिवासियों ने इस तरह का रुख अख्तियार किया है. कांग्रेस ने आदिवासियों के विरोध के बावजूद इस विधानसभा क्षेत्र से लंबाडा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले उम्मीदवार रमेश राठौड़ को चुनावी मैदान में उतारा है.

भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार आदिवासी सतला अशोक हैं, जबकि टीआरएस ने अपने निवर्तमान विधायक अजमीरा रेखा नायक को टिकट दिया है, जो लंबाडा समुदाय से ही आती हैं. आदिवासियों और लंबाडा समुदाय के बीच टकराव का अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कम से कम तीन विधानसभा सीटों पर निर्णायक असर होगा.

लंबाडा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले और बीजेपी अनुसूचित जनजाति मोर्चा (महाराष्ट्र) के संयोजक अमर सिंह तिलावत ने बताया, 'असिफाबाद, खानपुर और बोथ में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के वोटर हैं. टीआरएस के उम्मीदवार 7 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं. बाकी सीटों पर अन्य पार्टियों के जीतने की संभावना है. आदिवासी जहां भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में हैं, वहीं लंबाडा समुदाय के लोग कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन करने के लिए तैयार हैं.'

अमर सिंह कहते हैं, 'आदिवासी टीआरएस से इस बात को लेकर नाराज हैं कि पिछले साल जब आदिवासियों ने उन पर हमला किया, तो राज्य की टीआरएस सरकार उन्हें सुरक्षा देने में नाकाम रही. तिलावत आसिफाबाद जिले के कोमाराम भीम के रहने वाले हैं.

खानपुर से बीजेपी उम्मीदवार सतला अशोक की सफलता को लेकर उनकी अपनी शंकाएं हैं. दरअसल, भारतीय जनता पार्टी ने अशोक के नाम का ऐलान करने में देरी की, जबकि कांग्रेस और टीआरएस न सिर्फ उम्मीदवारों के चुनाव बल्कि समर्थन के लिए वोटरों तक पहुंच बनाने में ज्यादा तेजी में थे.

तिलावत का कहना था, 'हालांकि, आदिवासियों ने बीजेपी उम्मीदवारों का समर्थन किया है, लेकिन चुनाव के नतीजे बाकी उम्मीदवारों द्वारा खर्च किए गए पैसों से तय होंगे.'

शिकायतें और चुनावी मजबूरियां

इस बीच आदिवासी छात्र-छात्राओं ने लंबाडा समुदाय के 'झूठे दावे' के बारे में जागरूकता फैलाने की खातिर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी सीटों पर अपने समुदाय का उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला किया है.

आंध्र प्रदेश/तेलंगाना आदिवासी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष अरुण कुमार ने बताया, 'लंबाडा समुदाय को अनुसूचित जनजाति की कैटेगरी में शामिल करने के खिलाफ हम पहले ही अदालत में मुकदमा दायर कर चुके हैं. हम मांग करेंगे कि चुनाव आयोग लंबाडा उम्मीदवारों का जाति प्रमाण पत्र पेश करे. इन विधानसभा क्षेत्रों में हम पहले ही चुनाव आयोग के अधिकारियों को चिट्ठी लिखकर उनसे लंबाडा समुदाय के उम्मीदवारों का नॉमिनेशन पेपर खारिज करने की मांग कर चुके हैं, क्योंकि उनके मुताबिक वे अनुसूचित जनजाति के लिए उपलब्ध फायदे हासिल करने में सक्षम नहीं हैं. हम चुनाव आयोग द्वारा मुहैया कराया गया सबूत अदालत में सौंपेंगे.'

उनके मुताबिक, जिस सरकारी आदेश के तहत लंबाडा समुदाय को अनुसूचित जनजाति की कैटेगरी में शामिल किया गया था, वह 6 महीनों तक के लिए ही वैध था और यह आरक्षण शिक्षा और अन्य सुविधाओं तक सीमित था, लेकिन सरकारी नौकरियों और आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने के लिए नहीं दिया गया था.

दोनों समुदायों के बीच जहां टकराव की स्थिति बनी हुई है, वहीं न तो तेलंगाना की टीआरएस सरकार और न ही प्रमुख राजनीति पार्टियों ने आदिवासियों या लंबाडा समुदाय के समर्थन या खिलाफ में बयान जारी किया है. चुनावी मजबूरियों ने उन्हें इस विवाद में किसी का पक्ष नहीं लेने को मजबूर कर दिया है.

आदिवासी स्टूडेंट्स यूनियन के राज्य महासचिव वेदमा बोज्जू का कहना था, 'राजनीतिक पार्टियां हमारा वोट चाहती हैं, लेकिन हमारी मदद नहीं करना चाहती हैं. लंबाडा समुदाय को इस कोटा से बाहर करने की मांग को लेकर हम विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि पार्टियां चुप थीं. यह काफी हैरान करने वाला मामला था.' उन्होंने कहा, 'हमने उन पार्टियों का समर्थन करने का फैसला किया है, जो हमारी मांगों का समर्थन करने के लिए तैयार हैं.'

बोज्जू का यह भी कहना था कि आदिवासी आंदोलन ने इस समुदाय को अपना अभियान राजनीतिक आंदोलन में बदलने का अवसर मुहैया कराया था, लेकिन तेलंगाना में तय वक्त से पहले चुनाव के ऐलान ने रंग में भंग कर दिया. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वह इन चीजों से निराश नहीं हैं.

इस शख्स का कहना था, 'हम लंबाडा समुदाय के उम्मीदवारों का नामांकन पत्र खारिज होने की उम्मीद कर रहे हैं. हम चुनाव आयोग से उम्मीदवारों का जाति प्रमाण पत्र पेश करने की मांग करते हैं. लंबाडा समुदाय किस तरह से तेलंगाना में अनुसूचित जनजाति समुदाय बन सकता है, जो पास के राज्य महाराष्ट्र में पिछला वर्ग की श्रेणी मे आता है. इसको लेकर हमारे आंदोलन का निश्चित तौर पर असर होगा.'

अदालत का दरवाजा भी खटखटाने की तैयारी

अगर चुनाव आयोग इस संबंध में लंबाडा समुदाय के खिलाफ की गई मांग को नजरअंदाज कर देता है, तो आदिवासियों की योजना अदालत में लंबाडा उम्मीदवारों के खिलाफ लड़ने की है, चाहे उम्मीदवार राज्य विधानसभा के लिए निर्वाचित क्यों न हो जाएं. बोज्जू का कहना था, 'वे चुनाव आयोग के अधिकारियों को ठग या बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन अदालत को नहीं ठग सकते.'

आदिवासी छात्र नेता एसम सुधाकर ने वारंगल जिले के महबूबाबाद विधानसभा क्षेत्र से अपना पर्चा दाखिल किया है. सुधाकर कहते हैं, 'मेरा मकसद लंबाडा समुदाय के उम्मीदवारों से कड़ा मुकाबला करना और आदिवासियों के बीच जागरूकता पैदा करना है. हम वैसी पार्टियों का समर्थन करेंगे, जो लंबाडा समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर का वादा करती हो.'

हालांकि, लंबाडा समुदाय के सदस्य अपनी वजहों से आशावादी हैं. वायरा विधानसभा सीट से टीआरएस के उम्मीदवार और लंबाडा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बनोथ मदन लाल ने कहा, 'वायरा विधानसभा क्षेत्र में आदिवासी-लंबाडा टकराव का कोई असर नहीं होगा. मुझे यहां लंबाडा वोटरों के मुकाबले आदिवासी वोटरों से ज्यादा समर्थन मिल रहा है.' लंबाडा समुदाय के एक और नेता और पूर्व मंत्री के पुत्र राम नायक का मानना है कि यह 'विवाद की राजनीति करने वाली पार्टियों की करस्तानी है'.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और 101Reporters.com के सदस्य हैं, जो जमीनी स्तर पर कामकरने वाले पत्रकारों का देशव्यापी नेटवर्क है.)

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