प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ अफसरों ने पिछले हफ्ते आंध्र प्रदेश जाकर राज्य सरकार के अफसरों से मुलाकात की थी. उस दौरान पीएमओ के अफसरों ने पूछा था कि क्या आंध्र प्रदेश में कोई ऐसी परियोजना है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 मार्च से शुरू होने जा रहे संसद सत्र से पहले कर सकते हैं. आंध्र प्रदेश के अफसरों के मुताबिक उन्होंने पीएमओ को बताया गया था कि, राज्य में कोई भी परियोजना पूरी नहीं हुई है.
ऐसा माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री राज्य में किसी परियोजना का उद्घाटन करके यह ज़ाहिर करना चाहते थे कि उनकी सरकार आंध्र प्रदेश के लिए पूरी तरह से मददगार है. वह उस मौके का इस्तेमाल यह संकेत देने के लिए करना चाहते थे कि, उनकी सरकार ने राज्य के विकास के लिए पर्याप्त धन मुहैया कराया है. इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) के उन आरोपों को भी धोने की फिराक में थे जिनमें आंध्र प्रदेश के साथ सौतेले व्यवहार की दलीलें दी जाती हैं. दरअसल टीडीपी अरसे से यह आरोप मढ़ती आ रही है कि केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के विकास के लिए ज़रूरी मदद मुहैया नहीं कराई है.
कहना मुश्किल है कि शुक्रवार को कुरनूल में बीजेपी का रायलसीमा घोषणापत्र उसकी कोई पूर्वनियोजित योजना थी या नहीं. वैसे पहली नज़र में तो वह बीजेपी का प्लान बी जैसा दिखता है. रायलसीमा घोषणापत्र में मौजूद तत्वों से यह स्पष्ट होता है कि बीजेपी ने अब टीडीपी से दो-दो हाथ करने का फैसला कर लिया है. ऐसा लगता है कि बीजेपी नहीं चाहती है कि आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू उसे खलनायक के रूप में पेश करें. यानी बीजेपी ने अब राज्य में टीडीपी से परे भी संभावनाएं तलाश ली हैं.
क्यों खास है रायलसीमा मुद्दा
रायलसीमा आंध्र प्रदेश के दक्षिणी हिस्से में पड़ता है. रायलसीमा में चार जिले- कुरनूल, कडप्पा, अनंतपुर और चित्तूर शामिल हैं. रायलसीमा सूखा क्षेत्र है. राज्य के तटीय इलाकों के मुकाबले रायलसीमा कहीं ज़्यादा पिछड़ा हुआ है. इलाके के लोगों को लगता है कि विकास और फंड्स को लेकर उनसे भेदभाव किया जाता है.
तेलंगाना आंदोलन के दौरान, रायलसीमा को तेलंगाना के साथ मिलाकर रायल-तेलंगाना राज्य बनाने का भी एक प्रस्ताव था. उस वक्त बड़ी संख्या में लोग रायलसीमा को आंध्र के समृद्ध तटीय क्षेत्र के साथ जोड़ने के पक्ष में नहीं थे.
रायलसीमा घोषणापत्र में बीजेपी ने 16 मांगें रखी हैं. जो कि सीधे तौर पर मुख्यमंत्री नायडू के लिए चुनौती हैं. दरअसल अपने रायलसीमा घोषणापत्र के ज़रिए बीजेपी ने रायलसीमा क्षेत्र की अनदेखी का मुद्दा उछाला है. बीजेपी यह साबित करने की फिराक में है कि मुख्यमंत्री नायडू ने सिर्फ तटीय आंध्र को ही तवज्जो दी है. इसी सिलसिले में बीजेपी के रायलसीमा के प्रतिनिधियों ने कुरनूल में एक अहम बैठक की. दरअसल कुरनूल 1953 से लेकर 1956 तक आंध्र प्रदेश की राजधानी रह चुका है. 2014 में जब आंध्र प्रदेश का दो हिस्सों में विभाजन हुआ, तब राजधानी न बनाए जाने पर कुरनूल में खासा असंतोष देखने को मिला था.
रायलसीमा के वकीलों ने कुरनूल में हाईकोर्ट की स्थापना के लिए आंदोलन छेड़ दिया है. मुख्यमंत्री नायडू इस मांग को पहले ही खारिज कर चुके हैं. हालांकि बीजेपी वकीलों की मांग के समर्थन में उतर आई है. लेकिन बीजेपी ने रायलसीमा क्षेत्र में आंध्र प्रदेश की दूसरी राजधानी बनाए जाने की मांग का समर्थन नहीं किया है. उसके एवज़ में बीजेपी ने इलाके में कृषि संकट को नियंत्रित करने के लिए 20,000 करोड़ रुपये के बजट आवंटन की मांग की है. बीजेपी यह भी चाहती है कि रायलसीमा के चार ज़िलों को विभाजित करके आठ ज़िलों में तब्दील कर दिया जाए. इसके अलावा इलाके की विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं को जल्द से जल्द पूरा किया जाए.
दरअसल बीजेपी अपनी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री नायडू को बैकफुट पर लाना चाहती है. बीजेपी ने साफ कर दिया है कि अगर टीडीपी केंद्रीय सरकार पर आंध्र प्रदेश से भेदभाव का आरोप लगा सकती है, तो वह भी बजट में रायलसीमा की अनदेखी के मुद्दे पर टीडीपी पर पलटवार कर सकती है. बीजेपी की यह सारी कवायद आक्रामक मुद्रा में चल रही टीडीपी को रक्षात्मक मुद्रा में लाने के लिए है.
बीजेपी और टीडीपी की इस खींचतान के चलते आंध्र प्रदेश को इनदिनों स्वार्थी राजनीति का सामना करना पड़ रहा है. टीडीपी यह जताना चाहती है कि बीजेपी ने न तो आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का अपना वादा पूरा किया है और न ही राजधानी अमरावती के निर्माण समेत अन्य परियोजनाओं के लिए सहयोग दिया है. लिहाज़ा टीडीपी को मजबूरन बीजेपी से अपना रिश्ता खत्म करने के बारे में सोचना पड़ रहा है. टीडीपी को अपनी इस रणनीति से चुनाव में सफलता की भी संभावनाएं नज़र आ रही हैं. टीडीपी को लगता है कि जनता को यह बात समझाई जा सकती है कि, 'हम बिना बीजेपी के भी एक सुनहरा आंध्र प्रदेश बनाने में सफल हो सकते हैं.'
बीजेपी ने टीडीपी की यह सियासी साजिश सूंघ ली है. बीजेपी इस बात से बखूबी वाकिफ है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके कैसे उसकी नकारात्मक छवि बनाई जा रही है. लिहाज़ा बीजेपी ने भी पलटवार करने का फैसला किया है. वैसे बीजेपी आंध्र प्रदेश में ज्यादा बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं है. ऐसे में बीजेपी अपने अस्तित्व से ज़्यादा प्रधानमंत्री मोदी की छवि को लेकर ज़्यादा सजग है. दरअसल बीजेपी को लगता है कि मुख्यमंत्री नायडू सियासी फायदे के लिए प्रधानमंत्री मोदी को अपने एक ऐसे सहयोगी के रूप में पेश कर सकते हैं जो शब्दों और कर्मों से भरोसेमंद नहीं हैं.
क्या कहेगी जनता
लेकिन क्या आंध्र प्रदेश की जनता को बीजेपी और टीडीपी के यह सियासी करतब समझ में नहीं आएंगे? बीजेपी इस तथ्य पर क्या स्पष्टीकरण देगी कि प्रधानमंत्री मोदी ने ही अक्टूबर 2015 में आंध्र प्रदेश की राजधानी की नींव रखी थी? ऐसे में बीजेपी अब रायलसीमा में दूसरी राजधानी की मांग का समर्थन क्यों नहीं कर रही है?
इसके अलावा, आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू मंत्रिमंडल में बीजेपी एक अहम भागीदार है. क्या बीजेपी के दोनों मंत्रियों ने मंत्रिमंडल की किसी बैठक या टीडीपी-बीजेपी की समन्वय बैठक के दौरान अपनी 16 मांगों में से किसी एक मांग को आगे बढ़ाया है? अगर बीजेपी यह साबित करना चाहती है कि उसके दिल में रायलसीमा के लिए खास हमदर्दी है, तो केंद्र सरकार को रायलसीमा के चार जिलों के लिए विशेष फंड आवंटित करना चाहिए.
इसके अलावा, मुख्यमंत्री नायडू जहां प्राथमिक राजधानी के तौर पर अमरावती के निर्माण और विकास के लिए धन की कमी से जूझ रहे हैं, वहां दूसरी राजधानी के लिए पैसा कहां से आएगा?
रायलसीमा पर बीजेपी की इतनी तवज्जो बड़ी दिलचस्प है. इस क्षेत्र के चार ज़िलों में से तीन ज़िलों यानी कुरनूल, कडप्पा और अनंतपुर में मुस्लिमों का वर्चस्व है. वास्तव में, पिछले साल कुरनूल जिले की नंदयाल विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान टीडीपी ने बीजेपी को प्रचार अभियान से दूर रहने को कहा था, ताकि मुस्लिम मतदाता उससे न छिटकें.
रायलसीमा घोषणापत्र बीजेपी के 1997 के काकीनाड़ा संकल्प की याद दिलाता है. उस समय बीजेपी ने "एक वोट, दो राज्य" का नारा बुलंद किया था. उसका मतलब यह था कि अगर चुनाव जीतकर बीजेपी सत्ता में आई तो वह आंध्र प्रदेश का विभाजन करेगी. लेकिन बाद में बीजेपी अपने नारे और वादे से पीछे हट गई. क्योंकि 1998 से 2004 तक बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को नायडू के समर्थन की जरूरत थी, वहीं नायडू का अलग तेलंगाना राज्य का विरोध जग ज़ाहिर है. ऐसे में जिन लोगों को बीजेपी का पिछला यू-टर्न याद है, उन्हें अब रायलसीमा के लिए अचानक उमड़े बीजेपी के प्यार पर हैरत नहीं होगी.
क्या रायलसीमा के मुद्दे पर बीजेपी का कदम राजनीतिक तौर पर सही है? क्या बीजेपी के इस कदम से उन लोगों के हौसले बुलंद नहीं होंगे जो रायलसीमा को अलग राज्य का दर्जा दिलाना चाहते हैं? दिलचस्प बात यह है कि, मुख्यमंत्री नायडू और जगनमोहन रेड्डी दोनों ही रायलसीमा क्षेत्र से ही संबंध रखते हैं. ऐसे में टीडीपी-बीजेपी की राजनीतिक लड़ाई के परिणाम आंध्र प्रदेश के भविष्य के लिए दूरगामी हो सकते हैं.
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