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तीन तलाक पर TDP, AIADMK का विरोध कहीं बीजेपी से गठबंधन टूटने का इशारा तो नहीं

तलाक बिल का समर्थन न कर टीडीपी, एआईएडीएमके ने साफ कर दिया कि वे बिना शर्त बीजेपी के साथ गठबंधन नहीं चलाएंगे. इन दोनों छोटी पार्टियों ने बीजेपी को अपनी अहमियत बताई

T S Sudhir Updated On: Jan 06, 2018 09:18 PM IST

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तीन तलाक पर TDP, AIADMK का विरोध कहीं बीजेपी से गठबंधन टूटने का इशारा तो नहीं

बीजेपी सरकार द्वारा तीन तलाक बिल पास नहीं करा पाने से सत्तारूढ़ पार्टी दिल्ली में असहज स्थिति में है, लेकिन इस दौरान दक्कन में घटा एक वाकया और ज्यादा अहम है. तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) एनडीए की सहयोगी है और इसके मोदी सरकार में दो मंत्री भी हैं, तब भी इसने तीन तलाक बिल पर किनारा कर अपनी स्थिति बिल्कुल साफ कर दी है.

तलाक बिल के रस्साकशी में टीडीपी कांग्रेस के पाले में खड़ी दिखाई दी, जबकि आंध्र प्रदेश में ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे के परंपरागत विरोधी हैं. उधर, एआईडीएमके ने बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने के प्रस्ताव का समर्थन किया है. तमिलनाडु की यह पार्टी हालांकि एनडीए का हिस्सा नहीं है, लेकिन जयललिता के निधन के बाद से बीजेपी के करीब रही है. राजनीतिक मोर्चे पर यह रणनीतिक पालाबदल किसी भूल-चूक का नतीजा नहीं है. हालांकि आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के नेता इसे मुद्दा-आधारित विरोध साबित करने के लिए काफी मशक्कत कर रहे हैं.

क्यों नाराज हैं चंद्रबाबू नायडू?

चंद्रबाबू नायडू के विश्वासपात्र टीडीपी के राज्यसभा सदस्य सीएम रमेश सवाल पूछते हैं, 'हमें इसे बीजेपी के मुद्दे के तौर पर क्यों देखना चाहिए? यह हमारा भी तो मुद्दा है.' वह कहते हैं, 'सवाल यह नहीं है कि क्या हमारे फैसले से सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी. सवाल है कि यह बिल जिस रूप में पेश किया गया था, उससे हमें शर्मिंदगी हो रही थी. मुजरिम ठहराए जाने के प्रावधान को लेकर हमें एतराज था, जिसके बारे में हमने बीजेपी को बता दिया था और उनसे इसे सेलेक्ट कमेटी को भेजने को कहा.'

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टीडीपी और बीजेपी सत्ता में साझीदार हैं- नई दिल्ली व अमरावती दोनों जगह. लेकिन टीडीपी को ऐसा लगता है कि नायडू को गठबंधन के अंदर वैसी वरीयता नहीं दी जाती, जिसके वह हकदार हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त एनडीए में नायडू के लिए रेड कारपेट बिछाने के बावजूद अब टीडीपी को उपेक्षा का कड़वा घूंट पीना पड़ रहा है.

Chandrababu-Naidu

आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद, नायडू को विरासत में बिना पूंजी और इंफ्रास्ट्रक्चर के एक खाली खजाना वाला राज्य मिला. जाहिर है कि उन्हें बंटे हुए आंध्र प्रदेश की जनता से किए वादे पूरे करने के लिए एनडीए सरकार पर निर्भर रहना था. एनडीए के साझीदार के तौर पर नायडू उम्मीद करते थे कि फटाफट पैसों की बरसात शुरू हो जाएगी.

सत्ता प्रतिष्ठान के एक करीबी शख्स ने इस लेखक बताया, 'राजनीतिक रूप से बीजेपी के साथ हमारे रिश्ते अच्छे हैं, लेकिन यह कभी राज्य को मदद देने में नहीं हुआ.' उनका इशारा इस ओर था कि टीडीपी सरकार को वो चीजें भी पाने के लिए जूझना पड़ा, जिसके बारे में उसे लगता था यह तो यह उसका अधिकार है. चाहे वह प्रतिष्ठित पोलावरम सिंचाई परियोजना के लिए फंड हो या राजधानी नगर के लिए. नायडू सरकार को तब गहरी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी, जब एनडीए सरकार ने आंध्र प्रदेश सरकार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया.

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यह वायदा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में किया था और चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने भी किया था. टीडीपी का एक धड़ा मानता है कि उनके लिए बीजेपी चुनावी बोझ साबित होने वाली है. जगनमोहन रेड्डी और पवन कल्याण केंद्र सरकार में साझीदार होने के बाद भी राज्य के लिए विशेष दर्जा हासिल नहीं कर पाने में नाकामी के लिए उन पर तीखे हमले कर रहे हैं.

इन टीडीपी नेताओं को लगता है कि बीजेपी से रिश्ते खत्म कर लेने और उसे आंध्र प्रदेश के दुश्मन के तौर पर पेश करने का भावुक एजेंडा 2019 के चुनाव में अच्छा फायदा देगा. लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि एनडीए से बाहर निकलने का मतलब होगा कि देश की राजधानी में अपनी थोड़ी बहुत पकड़ को भी तिलांजलि दे देना.

इन कारणों से तीन तलाक पर टीडीपी के रुख को एकतरफा देखना गलती होगी. यह जोर का झटका धीरे से देने जैसा है, जिसमें कहा गया है कि देखो टीडीपी अपने साझीदार से उलट रुख अपनाने का दम रखती है. यह देखना रोचक होगा कि बीजेपी आंध्र प्रदेश में इस पर किस तरह प्रतिक्रिया देती है, और क्या इसके नेता टीडीपी पर उसी भाषा में हमला करते हैं, जो उन्होंने सिर्फ कांग्रेस के लिए बचा कर रखी है.

क्या है एआईएडीएमके के विरोध की वजह

एआईएडीएमके ने बीजेपी को इस बिल पर ज्यादा घातक तरीके से घेरा. इसके लोकसभा सांसद अनव्हर राझा ने अपने भाषण में आरोप लगाया कि बीजेपी इस बिल के माध्यम से 'सांप्रदायिक एजेंडे' को आगे बढ़ा रही है. असदुद्दीन ओवैसी जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए रामानाथपुरम के सांसद ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि इस विधेयक को 'भारत में मुसलमानों की पहचान खत्म कर देने' के लिए पेश किया गया है.

आरके नगर का नतीजा आने के बाद, जिसमें एआईएडीएम बड़े अंतर के साथ दूसरे स्थान पर रही थी, और बीजेपी ने नोटा से भी कम वोट पाकर अपनी जमानत जब्त करा ली थी, दोनों दलों के रिश्तों में जबरदस्त गिरावट आई है. दिनाकरण ने अपने चुनाव प्रचार में कहा था कि एआईएडीएमके को एक भी वोट देने का मतलब है कि बीजेपी को एक वोट देना. एआईएडीएमके को लगता है कि इस बात ने क्षेत्र में उसके अल्पसंख्यक वोटरों पर असर डाला.

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नतीजों के फौरन बाद, कोऑपरेटिव मंत्री सेल्लुर राजू ने दावा किया कि एआईएडीएमके बीजेपी से नजदीकी और इसके जीएसटी पर फैसले से जनता के गुस्से के कारण हारी. उन्होंने कहा, 'अम्मा के दिमाग में हमेशा स्पष्ट था कि वो सांप्रदायिक बीजेपी से नजदीकी नहीं रखेंगी, हालांकि उनके नरेंद्र मोदी से अच्छे संबंध थे. इसलिए हमें कभी भी बीजेपी से गठबंधन नहीं करना चाहिए.'

Kanyakumari: Prime Minister Narendra Modi receives a memorandam from Tamil Nadu Chief Minister Edappadi K Palaniswami during his visit to the Cyclone Ockhi- hit areas, in Kanyakumari on Tuesday. PTI Photo (PTI12_19_2017_000097B)

आरएसएस विचारक एस. गुरुमूर्ति ने एक दिसंबर को एक ट्वीट में मुख्यमंत्री ई. पलानिस्वामी और उप मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम दोनों को 'नपुंसक' बताया था. इसका भी पार्टी ने काफी बुरा माना था.

यह तथ्य कि रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश का सबसे पहले बीजेपी नेताओं ने स्वागत किया, हर किसी ने माना. संकेत साफ है कि बीजेपी एआईएडीएमके को किनारे लगाकर सुपरस्टार का समर्थन करने के रास्ते पर आगे बढ़ रही है.

लेकिन एआईएडीएमके मुंह से बड़ा निवाला निगल लेने के बाद फौरन ठंडी पड़ गई और सफाई देने लगी कि पार्टी का विरोध सिर्फ बिल तक है और इसका कोई और मतलब नहीं निकालना चाहिए. राजनीतिक विश्लेषक एस. शंकर कहते हैं कि एआईएडीएमके ऐसी स्थिति में नहीं है कि बीजेपी को सबक सिखा सके. उन्हें संदेह है कि पार्टी नेतृत्व ने अनव्हर राझा को इस तरह बोलने के लिए अधिकृत किया होगा. शंकर कहते हैं कि 'डीएमके और टीटीवी दिनाकरण ने बिल के खिलाफ रुख अपनाया था, और विधेयक के समर्थन में वोट करने का मतलब तमिलनाडु में एआईएडीएमके का अल्पसंख्यक विरोधी दिखना होता.'

अगर एआईएडीएमके और टीडीपी राज्यसभा में सरकार का समर्थन करते तो अरुण जेटली मतविभाजन की स्थिति में अपनी जीत की कल्पना कर सकते थे. लेकिन तीन तलाक बिल पर दक्षिण के दो मित्रों ने अपने रुख से इशारा दे दिया है कि वो निकट भविष्य में बीजेपी से तलाक भी ले सकते हैं.

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