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रजनीकांत: विरासत की राजनीति से नहीं, जनता मौजूदा हालात देखकर अपना रुख तय करती है

रजनीकांत किसी अन्य पहचान की शरण लेने या ओट में छुपने की जगह अगर अपने ब्रांड की राजनीति करें तो कहीं ज्यादा कामयाब हो सकते हैं

Updated On: Mar 07, 2018 12:45 PM IST

K Nageshwar

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रजनीकांत: विरासत की राजनीति से नहीं, जनता मौजूदा हालात देखकर अपना रुख तय करती है

राजनीतिक दलों को कद्दावर नेताओं की भरी-पूरी विरासत के बूते बढ़ना-पसरना रास आता है. एक तरफ तेलुगु देशम है की दावेदारी है कि वही एनटी रामाराव(एनटीआर) की विरासत की असली वारिस है तो दूसरी तरफ बीते वक्त की कांग्रेस और वायएसआर कांग्रेस दोनों लक्ष्मी पार्वती के सहारे एनटीआर की विरासत में खुद की हकदारी जता रहे हैं. इसी तरह एनटीआर की बेटी पुरंदेश्वरी के सहारे बीजेपी उस स्वर्गवासी नेता की विरासत में हकदार होने का एक दावेदार हो सकती है.

तमिलनाडु में भी इसी किस्म की एक सनक भरी होड़ मची हुई दिख रही है जहां रजनीकांत खुद को एमजीआर की विरासत को अपने पाले में खींच लाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. जबकि एआईएडीएमके का यह दावा अब भी बरकरार है कि वही एमजीआर की विरासत की असली वारिस है. लग तो यही रहा है कि रजनीकांत ने विरासत में हकदारी का जो संग्राम छेड़ रखा है उसकी पटकथा बीजेपी ने लिखी है.

एक बात यह भी है कि सियासी दल और उनके नेता विरासत की राजनीति के खेल में उलझे रहते हैं जबकि जनता-जनार्दन मौजूदा सियासी हालात के हिसाब से अपना रुख तय करती है. इस बात की पुष्टी इस तथ्य से होती है कि किसी जमाने में एनटीआर ने खुद ही अपने दामाद चंद्रबाबू नायडू को चुनौती दी थी लेकिन उस घड़ी लोग एनटीआर की तरफ नहीं बल्कि चंद्रबाबू नायडू के पीछे गोलबंद हुए थे.

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विजयकांत को भी इस बात की बड़ी हड़बड़ी लगी थी कि लोग उन्हें एमजीआर की विरासत का हकदार मानें. एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें करुपु एमजीआर (सांवला एमजीआर) के नाम से पुकारा गया. एमजीआर ने बड़े जतन के साथ फिल्मी पर्दे और वास्तविक जिंदगी के लिए सियासी मकसद को सामने रखकर अपनी छवि गढ़ी थी. लेकिन एक-आध अवसरों को छोड़ दें तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि विजयकांत ने किसी मसले पर पूरी मजबूती के साथ अपना कोई पक्ष रखा हो. बात तमिलनाडु की हो या फिर पूरे देश की, विजयकांत ने तमामतर मसलों पर कोई पक्ष लेने के बजाय उनसे एक किस्म की दूरी बनाए रखना ठीक समझा.

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क्या बीजेपी के तुरुप का पत्ता हैं रजनीकांत

एक अहम बात यह भी है कि एमजीआर द्रविड़ आंदोलन की आग में तपकर खरे कुंदन की भांति चमककर लोगों के सामने आए थे, जबकि रजनीकांत हवा-हवाई किस्म के अपना वही राग अलापे जा रहे हैं कि राजनीति में अध्यात्म का वास होना चाहिए या कह लें आध्यात्मिक किस्म की राजनीति होनी चाहिए.

आध्यात्मिक राजनीति की व्याख्या अक्सर यह कहकर की जाती है यह बीजेपी के विचारधाराई रुझानों के बहुत नजदीक है. रजनीकांत ने सियासी मैदान में पांव बढ़ाए तो भगवा जमात ने शुभ स्वागतम् के गीत गाए. ऐसे में इस अटकल को बढ़ावा मिला कि हो ना हो बीजेपी ने अपनी विचारधारा के खिलाफ बिछाई गई सियासत की बिसात पलटने के लिए रजनीकांत के रूप में तुरुप का पत्ता खेला है.

रजनीकांत की एक बड़ी कमी तो यह है कि वे गैर-तमिल हैं. बेशक यह बात उनके फैंस और समर्थकों के लिए बहुत मायने नहीं रखती लेकिन द्रविड़ राजनीति और संस्कृति को लेकर उनकी निष्ठा जरूर ही सवालों के घेरे में है. हो सकता है, इस हकीकत के मद्देनजर रजनीकांत एमजीआर के विराट व्यक्तित्व वाली विरासत को अपने हक में इस्तेमाल करने के लिए बेचैन हों.

एक दूसरी व्याख्या यह हो सकती है कि यह एआईडीएमके के वोट को अपने पाले में खींचने की कोशिश भी हो सकती है. जयललिता के ना रहने के बाद संभावना यही है कि एआईडीएमके के वोट पार्टी से दूर छिटकेंगे. एआईडीएमके के अलग-अलग धड़े जया की विरासत पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं लेकिन एआईडीएमके में ऐसा कोई करिश्माई नेता नहीं दिखता जो जयललिता की विरासत को अपने पक्ष में धार और संवार देते हुए लोकप्रिय जन-समर्थन में तब्दील कर सके.

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शुरुआती दिनों में रजनीकांत को डीएमके का नजदीकी माना जाता था. लेकिन अब वे खुद को एमजीआर का अनुयायी बता रहे हैं. यह एआईडीएमके से छिटकने जा रहे वोट को अपनी तरफ खींचने का एक राजनीतिक दांव हो सकता है. तुलना के लिहाज से देखें तो डीएमके के वोट में सेंधमारी कत्तई आसान नहीं.

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आंध्रप्रदेश के अनुभवों से सीख लें  रजनीकांत

रजनीकांत को आंध्रप्रदेश के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए जहां एनटी रामाराव की विरासत पर दावेदारी जताने की ऐसी ही होड़ मची हुई है. दरअसल अंतिम फैसला जनता का होता है, नेता ये फैसला नहीं करते.

एनटी रामाराव तेलुगु अवाम की गर्व-भावना के जीवंत प्रतीक थे और अब भी तेलुगु जनता के दिल में उनका मुकाम बड़ा ऊंचा है. एनटीआर ने तेलुगुदेशम पार्टी बनाई थी जिसकी अगुवाई अब उनके दामाद एन. चंद्रबाबू नायडू के हाथ में है. एनटीआर की विधवा लक्ष्मीपार्वती अब वायएसआर कांग्रेस के साथ हैं और लक्ष्मीपार्वती का दावा है कि वायएस राजशेखर रेड्डी ने एनटी रामा राव के जनकल्याण के अजेंडे को आगे बढ़ाया सो वायएसआर कांग्रेस ही एनटीआर की राजनीति की विरासत की असली वारिस है.

इसी तरह, बीजेपी ने एनटीआर की बेटी डी पुरंदेश्वरी को अपने खेमे में शामिल किया है और अगर टीडीपी भगवा पार्टी के साथ अपने रिश्ते तोड़ती है तो आसार इसी बात के हैं कि बीजेपी चंद्रबाबू नायडू की काट के लिए डी. पुरंदेश्वरी को आगे करके एनटीआर की विरासत पर अपनी दावेदारी जताएगी. इस बीच सियासी हलकों में यह अटकल जोर पकड़ रही है कि एनटीआर की विरासत पर अपनी दावेदारी पुख्ता करने के लिए वायएसआर कांग्रेस डी. पुरंदेश्वरी के परिवार को अपने खेमे में खींचना चाहती है. हालांकि वायएसआर कांग्रेस वायएस राजशेखर रेड्डी की छवि के सहारे खड़ी की गई थी.

इस मुकाम पर यह याद रखना होगा कि जब लक्ष्मीपार्वती ने पार्टी के मामलों में दखल देना शुरू किया तो एन. चंद्रबाबू नायडू ने इसके खिलाफ विद्रोह कर दिया था. नायडू पूरी तेलुगुदेशम पार्टी को अपने पीछे लामबंद करने में कामयाब रहे जबकि एनटीआर की मौत के बाद लक्ष्मीपार्वती ने एनटीआर टीडीपी नाम से जो पार्टी बनाई वह सियासत के मैदान में कोई खास दम नहीं दिखा सकी.

विरासत की राजनीति से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि खुद एनटी रामाराव चंद्रबाबू नायडू को चुनौती देने में कामयाब नहीं हो पाए. पार्टी और उसका जनाधार एनटीआर के जीवित रहते चंद्रबाबू नायडू की तरफ खड़ा नजर आया. इससे संकेत मिलते हैं कि विरासत की राजनीति से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं पाली जा सकतीं. सबसे ज्यादा अहमियत इस बात की है कि मौजूदा राजनीतिक संदर्भ क्या है.

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विजयकांत खुद को सांवला एमजीआर बताने के बावजूद नाकाम रहे. दरअसल, जयललिता ने राजनीति के मैदान में अपने पैर बेशक एमजीआर के असली वारिस के रूप में बढ़ाए थे लेकिन उन्होंने बड़े जतन से अपनी छवि एक कद्दावर नेता की बनाई. वे सिर्फ चुनावों के वक्त एमजीआर की तस्वीरों का इस्तेमाल करती थीं.

रजनीकांत कभी भी द्रविड़ आंदोलन का हिस्सा नहीं रहे और आज भी वे द्रविड़ राजनीति के मकसद को लेकर समर्पित नहीं. इसके उलट वे अध्यात्मिक राजनीति की बात करते हैं जबकि द्रविड़ राजनीति अपने बुनियादी रूप में नास्तिक लोगों का जमावड़ा है.

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अपनी पहचान कायम करना चाहते हैं रजनीकांत

कमल हासन ने बड़े साफ लफ्जों में खुद को भगवा जमात से अलग बताया है और उनकी राजनीति द्रविड़ अस्मिता की सियासत के ज्यादा करीब जान पड़ती है. लेकिन इसके बावजूद रजनीकांत एमजीआर की विरासत पर बड़े जोर-शोर से अपनी दावेदारी जताने में लगे हैं. इससे उनकी ताकत का नहीं बल्कि अपनी पहचान कायम करने की बेचैनी का पता चलता है हालांकि रजनीकांत को चाहने वालों की कमी नहीं, इस मामले में उनकी कोई सानी नहीं.

बीजेपी ने हिंदी और हिंदू पहचान के विपरीत पड़ने वाले स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों और चेहरों का इस्तेमाल किया और पूर्वोत्तर की राजनीति में अपने पांव मजबूती से जमाए. भगवा जमात को खूब पता है कि तमिल पहचान की राजनीति को बीजेपी की छवि रास नहीं आने वाली. राजनीतिक हलकों में यह अटकल जोर पकड़ रही है कि बीजेपी खुद को पर्दे के पीछे रखते हुए रजनीकांत के करिश्मे और एमजीआर की विरासत का मेल बैठाकर तमिल राजनीति पर अपनी पकड़ बनाना चाहती है. लेकिन जीवंत राजनीति की पहचान वाले तमिलनाडु सरीखे राज्य में बीजेपी या फिर रजनीकांत के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल साबित होगा. रजनीकांत किसी अन्य पहचान की शरण लेने या ओट में छुपने की जगह अगर अपने ब्रांड की राजनीति करें तो कहीं ज्यादा कामयाब हो सकते हैं.

(लेखक तेलंगाना के पूर्व एमएलसी तथा हंस इंडिया के पूर्व संपादक और ओस्मानिया यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म में प्रोफेसर हैं)

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