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लालू को समझने में हर वक्त, हर किसी ने भूल की

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने लालू से लिपटे नकली आवरण की सिर्फ कुछ परतें हटायी हैं हकीकत और भी भयावह है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jul 07, 2017 01:07 PM IST

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लालू को समझने में हर वक्त, हर किसी ने भूल की

लक्ष्मी साहू, कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके निजी सचिव थे. पत्रकारों के मित्र थे. पटना के फ्रेजर रोड में उन्होंने एक बार लालू यादव के बारे में कई किस्से सुनाए.

वक्त था 1975 के पहले के आपातकाल का. लालू यादव पटना विश्वविद्दालय के छात्र नेता थे. गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण की रैली थी. लालू ने जे पी को लोकनायक की संज्ञा दी. उत्तेजित माहौल में पुलिस ने लाठीचार्ज किया. सबसे पहले भागने वालों में लालू थे. जेपी और सभी को छोड़कर.

साहू जी हंसते हुए कहते थे. यह आदमी छात्र जीवन से आज तक जरा भी नहीं बदला. सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले ने नि:संदेह लालू की राजनीति पर ग्रहण लगा दिया है. लालू का इससे उबर पाना असंभव है. पर क्या इस बात की मीमांसा नहीं होनी चाहिए कि एक आपराधिक चरित्र के व्यक्ति को समाज का प्रबुद्ध वर्ग सामाजिक न्याय का मसीहा मानता रहा.

प्रबुद्ध वर्ग को छोड़ भी दें तो बिहार में जनता का एक बड़ा वर्ग लालू में नायक का अक्स देखता रहा. यही वजह है कि लालू ने स्वयं  बाद में अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सीएम की कुर्सी पर बैठाकर लगभग 15 साल तक राज किया और आज अपने बेटे तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव के जरिए राज कर रहे हैं.

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लालू प्रसाद अपने बेटों के जरिए बिहार में राज कर रहे हैं

पटना के खटाल से निकले इस शख्स से लोगों की अपेक्षा स्वाभाविक थी 

नि:संदेह 90 के दशक में बिहार में जातिगत उन्माद था. कांग्रेस के दशकों के शासन ने बिहार को खोखला कर दिया था. बिहार एक नाउम्मीदों का प्रदेश नजर आता था. जिन सामाजिक ताकतों ने लालू को जन्म दिया वो सकारात्मक थीं. पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक और गरीब तबके के लोगों ने लालू में रहनुमा देखा. आखिर पटना के खटाल से निकला यह व्यक्ति लोगों का दुख दर्द सुनेगा. ऐसी अपेक्षा होना स्वाभाविक थी. पर लालू ने ऐसा कुछ भी नहीं किया.

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राजनीति उनके लिए व्यक्तिगत एवं पारिवारिक महत्वाकांक्षा का हथियार बनकर रह गई. चारा घोटाला सिर्फ एक बानगी था. अपराध के जरिए पैसा कमाया जाने लगा. लूट, अपहरण और घोटालों की भरमार थी. इस अराजकता में भी एक बौद्धिक वर्ग लालू में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का मसीहा देखता रहा.

आज के दिन लालू के घोटालों का अंबार सा लग गया है. पत्नी, बेटी, बेटे सबके नाम पर दिल्ली, पटना, रांची और अन्य शहरो में संपत्ति बटोरी गई. सारे पुख्ता सबूत हैं कि यह संपत्ति पदों का दुरूपयोग करके इकट्ठा की गई. झूठ बोला गया चुनाव के शपथ पत्रों में.

इन सबका प्रभाव लालू और उनके परिवार के राजनीतिक प्रभुत्व पर लेसमात्र भी नहीं है. बिहार में लालू का हुक्म वैसे ही चलता है. भ्रष्टाचार और अपराध की कहानियां बिहार में बेपरवाह दम से आगे बढ़ रही हैं. जेल में बैठे अपराधी अपने राजनीतिक आकाओं को हुक्म दे रहे हैं. सरकार के कई विभाग खुलेआम उगाही में लगे हैं. बिहार एक बार फिर राजनीतिक ग्रहण के दौर में है.

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बिहार एक बार फिर राजनीतिक ग्रहण के दौर में है

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से क्या कुछ बदलेगा?

आज का सुप्रीम कोर्ट का फैसला लालू के व्यक्तिगत राजनीतिक जीवन के लिए ताबूत में अंतिम कील के समान है. पर इस फैसले से लालू के प्रभुत्व पर प्रभाव नहीं पड़ेगा. लालू के उत्तराधिकारी तेजस्वी और तेजप्रताप उनकी ही विरासत को बिहार में बढ़ाएंगे.

कम ही उम्मीद है कि राजनीतिक संवेदना लालू यादव जैसी ताकतों को रोकेगी. ऐसे मौकों पर साहू जी जैसे व्यक्ति की याद आती है. उनका कहना था कि जेपी से लेकर जनता ने लालू को पहचानने में भूल की. दरअसल, गांधी मैदान में लाठी चार्ज में मैदान छोड़कर भागना उनका असली चरित्र था. सामाजिक न्याय एक छद्म आवरण.

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने इस आवरण की सिर्फ कुछ परतें हटायी हैं. हकीकत और भी भयावह है.

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