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खुफिया विभाग की चेतावनी: आर्टिकल 35 A के प्रावधान हटाने का उग्र प्रतिरोध हो सकता है

विडंबना देखिए कि अनुच्छेद को लेकर अपने लेखों में कई ऐसे लोगों ने भी गहरी चिन्ता जताई है जो हाल के वक्त में ‘आजादी’ के आंदोलन के हिमायती रहे हैं

David Devadas Updated On: Aug 06, 2018 11:34 AM IST

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खुफिया विभाग की चेतावनी: आर्टिकल 35 A के प्रावधान हटाने का उग्र प्रतिरोध हो सकता है

अगर संविधान की धारा 35-ए को हटा लिया गया तो कश्मीर में हालात बेकाबू हो सकते हैं. खुफिया महकमे और कई अन्य पदों पर मौजूद सलाहकारों ने इस बाबत केंद्र सरकार को आगाह किया है. माना जा रहा है कि जिन लोगों को कश्मीर में लोगों और नेताओं से बातचीत करने की जिम्मेदारी दी गई है उन्होंने ने भी सरकार से इस बारे में अपनी चिन्ता का इजहार किया है.

कहा यह भी जा रहा है कि सत्ताधारी पार्टी से जुड़े थिंक-टैंक्स के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का ख्याल है कि अनुच्छेद 35-ए को लेकर जल्दीबाजी में फैसला लेने से पहले सूबे की जनता को आवासीय अधिकारों की वैकल्पिक संभावनाओं के बारे में बताया जाना चाहिए.

संविधान में अनुच्छेद (35-ए) को 1954 में जगह मिली यानि शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के एक साल बाद जब घाटी में माहौल बहुत अशांत हो गया था. उस वक्त संयुक्त राष्ट्रसंघ का सुरक्षा परिषद भी सूबे के भविष्य के निर्धारण में अपनी तरफ से योगदान कर रहा था.

यह 1956 के वाकये से दो साल पहले की बात है. 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने हमारे नव-स्वतंत्र देश में नए सिरे से राज्यों का गठन किया.

जाहिर है, उस वक्त तक किसी अन्य राज्य के निवासियों के आवासीय अधिकार इतने खास नहीं थे. लेकिन, बाद के वक्त में हिमाचलप्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में भी विशेष आवासीय अधिकार लागू हुए और जमीन पर मालिकाना हक सिर्फ उन्हीं लोगों तक सीमित कर दी गई जो सूबे में कई पीढ़ियों से बसे हों.

**EDS NOTE: DESIGNATION CORRECTION** Srinagar: Hurriyat Conference leader Mirwaiz Umar Farooq leads a protest against the petitions filed in the Supreme court challenging the validity of Article 35 A, in Srinagar on Friday, August 3, 2018. Article 35 A, which was incorporated in the Constitution by a 1954 presidential order, accords special rights and privileges to the citizens of J&K. (PTI Photo/S Irfan) (PTI8_3_2018_000094B)

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवाइज उमर फारूक आर्टिकल 35 ए के समर्थन में
श्रीनगर में विरोध-प्रदर्शन करते हुए (तस्वीर: पीटीआई)

विडंबना कहिए कि ये राज्य उस वक्त तक वजूद में नहीं आए थे. पंजाब के एक हिस्से को अलग कर 1960 में हिमाचल प्रदेश बना और उत्तराखंड 1999 में यूपी से अलग होकर वजूद में आया.

‘आजादी’ के आंदोलन के हिमायती भी अब जता रहे हैं चिंता

मसले ने निर्णायक अहमियत हासिल कर ली है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद को मिली चुनौती पर सुनवाई करने जा रहा है. कश्मीर की कई असरदार शख्शियतों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट जारी किए हैं और बहुत से लेख लिखे हैं कि अनुच्छेद संविधान में बना रहना चाहिए.

विडंबना देखिए कि अनुच्छेद को लेकर अपने लेखों में कई ऐसे लोगों ने भी गहरी चिन्ता जताई है जो हाल के वक्त में ‘आजादी’ के आंदोलन के हिमायती रहे हैं.

अनुच्छेद के तहत गारंटी दी गई है कि केवल सूबे के स्थाई निवासी ही प्रदेश में जायदाद पर मालिकाना हक हासिल कर सकते हैं, सिर्फ उन्हीं को सरकारी नौकरी या राज्य सरकार के शिक्षा संस्थानों में बहाल किया जा सकता है.

स्थाई निवासियों को साबित करना होता है कि उनका परिवार सूबे में कई पीढ़ियों से रह रहा है. इसकी पैमाने राज्य सरकार के बनाए कानून से तय होते हैं.

मूल रुप से इस प्रावधान की शुरुआत महाराजा हरिसिंह ने 1927 की जनवरी में की थी. उनका मुख्य मकसद था कि रियासत की सरकारी नौकरियां रियासत के निवासियों के लिए आरक्षित हो जाए. उस वक्त रियासत के कई ऊंचे पदों पर पंजाब में जन्मे लोग काबिज थे.

आपत्तियां- एक नहीं काफी हैं

अनुच्छेद का कई वजहों से विरोध होता रहा है. एक वजह यह गिनाई जाती है कि अनुच्छेद पर विचार-विमर्श होना चाहिए था और संविधान में दर्ज करने से पहले इसे संसद में पारित किया जाना चाहिए था.

इस तर्क की काट में कहा जाता है कि अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह जम्मू-कश्मीर प्रांत के निवासियों के हक की हिफाजत के लिए ऐसे अनुच्छेद संविधान में दाखिल करें.

हां, ये बात भी है कि अनुच्छेद 35-ए के ज्यादातर विरोधी ये भी चाहते हैं कि अनुच्छेद 370 खत्म किया जाय.

Aricle 35A Jammu-Kashmir

(साभार: फेसबुक से साभार)

ऐसे लोगों का कहना है कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने से जम्मू-कश्मीर पूर्ण रुप से और अंतिम तौर पर भारतीय संघ का हिस्सा बन जाएगा. बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ ने इसी तर्क से अपना बड़ा अभियान छेड़ा था.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में जब भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो उस वक्त यह पार्टी की मुख्य मांगों में शामिल था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक प्रधान, एक संविधान, एक निशान का नारा दिया था. उस वक्त सूबे की सरकार के मुखिया को वजीर-ए-आजम(प्रधानमंत्री) कहा जाता था.

जम्मू-कश्मीर में अब भी अलग से संविधान है, झंडा भी अलग है और इस झंडे को राजकीय इमारतों और वाहनों पर राष्ट्रध्वज के साथ फहराना होता है.

बीजेपी के भी बहुत से नेताओं का इस मांग पर जोर है. सत्ताधारी पार्टी के मौजूदा कुछ नेता, मिसाल के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने सार्वजनिक रुप से इस मांग पर जोर दिया है.

लैंगिक गैर-बराबरी

सूबे के निवासियों के संपदा संबंधी अधिकारों की यह कहकर भी आलोचना की जाती है कि इसमें महिलाओं के साथ भेदभाव किया गया है.

दरअसल अनुच्छेद में यों तो गैर-बराबरी के बरताव की कोई बात नहीं है लेकिन राज्य में जो लोग इस अनुच्छेद को लागू करते हैं वे इसकी जिस तरह से इसकी व्याख्या करते हैं, उससे जरूर भेदभाव की स्थिति पैदा होती है.

उनका तर्क होता है कि सूबे की जिन महिलाओं ने राज्य के बाहर के बाशिन्दे के साथ ब्याह किया है उनके बच्चे इस राज्य के निवासी नहीं हैं. इसका मतलब हुआ कि जिनकी एकमात्र संतान बेटी है उनकी संपत्ति का वारिस नाती-नतनियों (ग्रैंडचिल्ड्रेन) की पीढ़ी को नहीं माना जायेगा.

दूसरी तरफ एक स्थिति यह भी है जब राज्य के स्थाई निवासी की सिर्फ एकलौती संतान को ही नहीं बल्कि पत्नी और यहां तक कि विधवा को भी राज्य में संपत्ति के ऊपर मालिकाने का हकदार माना जाता है.

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