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'नेताहित' पर फिर सुप्रीम कोर्ट और संसद आमने-सामने

सांसदों की पेंशन बंद करने के सवाल पर अरुण जेटली ने कहा, सरकारी धन को खर्चने का अधिकार केवल संसद को है

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Mar 27, 2017 04:10 PM IST

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'नेताहित' पर फिर सुप्रीम कोर्ट और संसद आमने-सामने

सासंदों की पेंशन बंद करने के सवाल पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने हाल में कहा है कि, ‘सरकारी धन को खर्च करने का अधिकार केवल संसद को है. न्यापालिका को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दूसरी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता में दखल देने से बचना चाहिए.'

2002 में ऐसा ही एक प्रकरण सामने आया था जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मतदाताओं को प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि जानने का अधिकार है. इसलिए उन्हें शैक्षणिक योग्यता,आर्थिक स्थिति और मुकदमों की जानकारी देनी चाहिए.

मामला तब हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक गया था

यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक गया था. एडीआर और कुछ अन्य संगठनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी.

याचिकाकर्ताओं ने राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण पर चिंता जाहिर की थी. साथ ही इस पर लगाम लगाने के लिए आदेश जारी करने की गुहार अदालत से की गई थी.

अपराधीकरण पर काबू पाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के लिए कुछ दिशानिर्देश भी जारी किए थे. हाईकोर्ट के इस निर्देश के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी.

इस बीच वाजपेयी सरकार के एक प्रमुख मंत्री ने मीडिया से कहा कि, ‘हम संपत्ति का विवरण कैसे दे सकते हैं? कई लोगों के मामले आयकर विभाग में विचाराधीन होते हैं.’ लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस तर्क को नहीं माना.

तब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार और कांग्रेस के वकीलों ने अदालत में कहा था कि यह काम सरकार और संसद का है न कि अदालत का.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलील को खारिज करते हुए कहा था कि किसी कानून के अभाव को भरने के लिए और चुनाव आयोग को निर्देश देने के लिए अदालत के पास शक्तियां हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘कार्यपालिका का यह कर्तव्य है कि वह कानून के अभाव को पूरा करने के लिए कदम उठाए. यदि किसी कारण से वह ऐसा करने में नाकाम रहती है तो न्यायपालिका को आगे आना ही होगा. यह अदालत का संवैधानिक दायित्व है. इस तरह के कानून की कमी से भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.’

यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट: सांसदों की पेंशन, भत्तों पर कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

उस मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अंततः अपनी बात मनवा ली थी. इसका नतीजा यह है की आज मतदाता जान पाते हैं कि किस उम्मीदवार के पास कितनी संपत्ति है. उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या है और उनके खिलाफ कितने मुकदमे चल रहे हैं या नहीं चल रहे हैं.

अगर उस वक्त यह काम सरकार पर छोड़ दिया गया होता तो मतदाताओं को आज तक वैसी सूचनाएं नहीं मिल पातीं. मतदाताओं के जानने के अधिकार की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट को कड़ा कदम उठाना पड़ा था.

देखना है कि नए मामले में अंततः क्या होता है

Arun-Jaitley

पिछले बुधवार को  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से पूछा कि ‘क्यों नहीं पूर्व सांसदों की पेंशन और सुविधाएं बंद कर दी जाएं?  ऐसी सुविधाएं मनमानी न होकर वाजिब होनी चाहिए.’

इससे पहले एक एनजीओ ने अपनी जनहित याचिका में कहा था कि पूर्व सांसदों की पेंशन और सुविधा संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है.

सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के खिलाफ सरकार सहित विभिन्न पक्षों के नेताओं ने संसद में इस पर कड़ी आपत्ति जताई. राज्य सभा में यहां तक कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम  सांसदों की छवि को धूमिल करने का प्रयास है.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक महीने बाद सुनवाई होगी

अंततः इस मामले में क्या होता है,यह देखना दिलचस्प होगा. लगे हाथ इस बहाने 2002 की घटना को एक बार फिर याद कर लिया जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा था कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निर्देश जारी करे.

दिशा निर्देश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ अपनी संपत्ति का विवरण दे. साथ ही वह शौक्षणिक योग्यता और आपराधिक रिकार्ड का भी व्योरा दें.

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद चुनाव आयेाग ने दिशा निर्देश जारी कर दिया.

इस निर्देश के बाद राजनीतिक हलकों में खलबली मच गयी. लगभग सारे राजनीतिक दलों ने इसका एक स्वर से विरोध किया. सरकार ने इस मसले पर विचार के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई.

बैठक में सुप्रीम कोर्ट के इस निदेश को विफल कर देने का फैसला हुआ. सभी लोगों की आम राय से तय हुआ कि इसके लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किया जाए.

संशोधन हुआ पर उस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया.

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