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राम मंदिर: जब देवराहा बाबा की बात मान राजीव गांधी ने खोला 'विवादों का ताला'

भूमि पूजन के ठीक एक हफ्ते पहले राजीव गांधी की मुलाकात मशहूर धर्म गुरू देवरहा बाबा से करवाई गई थी

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Mar 21, 2017 01:36 PM IST

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राम मंदिर: जब देवराहा बाबा की बात मान राजीव गांधी ने खोला 'विवादों का ताला'

अयोध्या में 10 नवंबर 1989 को राम मंदिर की आधारशिला रखी गई थी. इस विवादित कदम के एक दिन बाद मैं, उत्तर प्रदेश के उस वक्त के पुलिस महानिदेशक आर पी जोशी के सरकारी आवास पहुंचा था.

उस वक्त सर्दी का सीजन शुरू हो रहा था. अर्दली मुझे लेकर उनके आवास के शानदार लॉन पहुंचा. धूप खुशनुमा लग रही थी. लॉन में कुर्सियां और टेबल लगी हुई थीं.

मैंने आर पी जोशी से बिना लाग-लपेट के पूछा कि क्या विवादित जगह पर राम मंदिर की आधारशिला रखी गई है? जोशी एक तजुर्बेकार अफसर थे. वो बहुत कम बोलते थे. मेरे सवाल का जवाब उन्होंने सिर्फ हां में दिया. फिर मैंने उनसे अगला सवाल किया, 'क्या आपको पहले से पता था कि वो जगह विवादित है?'

उन्होंने फिर हां में जवाब दिया. फिर कहा कि, 'हम सबको ये बात मालूम है, मगर ये फैसला सरकार ने लिया है'. मेरे साथ चाय पीते हुए जोशी ने कुछ और जानकारी नहीं दी. हां उन्होंने ये जरूर बताया कि उन्होंने तो दिल्ली और लखनऊ में बैठे अपने अधिकारियों के आदेशों का पालन किया है. उस वक्त राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और बूटा सिंह उनके गृह मंत्री. नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे.

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कैसे हुआ था राम मंदिर का भूमि पूजन?

राम मंदिर की आधारशिला रखे जाने के बाद राजीव गांधी ने अयोध्या से ही अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की और देश में राम-राज्य लाने का वादा किया. ये बात लंबे वक्त तक राज ही रही कि आखिर राम मंदिर का भूमि पूजन कैसे हो गया? ये कोर्ट के आदेश के खिलाफ था.

अदालत ने विश्व हिंदू परिषद समेत तमाम संगठनों के विवादित जगह पर कुछ भी करने की रोक लगाई हुई थी. तो क्या राजीव गांधी इस मामले में नारायण दत्त तिवारी के साथ खुद शामिल थे? इस सवाल के जवाब में हवा में कई अटकलें थीं. मगर उनमें से कोई भी पूरा सच बताने वाली नहीं थीं.

1995 में जब नारायण दत्त तिवारी बागी हुए, तो, उन्होंने उस फैसले के पीछे का अपना सच बताया. उस वक्त तिवारी ने पी वी नरसिम्हा राव के खिलाफ बगावत की थी. वो अपना खोया हुआ राजनैतिक कद वापस पाने की लड़ाई लड़ रहे थे.

मुझसे बातचीत के दौरान तिवारी ने बताया कि किस तरह से 1989 में भूमि पूजन का फैसला लिया गया और फिर 1992 में बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाया गया. आज वो किस्सा याद करने लायक है. क्योंकि आज फिर राम मंदिर का मुद्दा सरगर्म है. राम मंदिर निर्माण को लेकर कोर्ट के बाहर सुलह समझौते की बात उठ रही है. तो उस दौर की याद दिलाने की और भी जरूरत है.

नारायण दत्त तिवारी अपने समय के कद्दावर ब्राम्हण नेता हैं.

जब देवराहा बाबा से मिले थे राजीव गांधी

उस वक्त गृह मंत्री के तौर पर बूटा सिंह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच की कड़ी थे. लखनऊ सचिवालय में वो कुछ करीबी अफसरों की मदद से राज-काज चलाते थे. इन अफसरों की विश्व हिंदू परिषद से नजदीकी जगजाहिर थी. अयोध्या मुद्दे पर मुख्यमंत्री का दफ्तर पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया था. और उसे सिर्फ फैसलों की जानकारी पहुंचाने के डाक घर की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था.

राजीव गांधी को जिस तरह से राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए राजी किया जा रहा था, उस बात को याद करना आज बेहद अहम है. भूमि पूजन के ठीक एक हफ्ते पहले राजीव गांधी की मुलाकात मशहूर धर्म गुरू देवरहा बाबा से करवाई गई थी. गोरखपुर में हुई इस मुलाकात के सूत्रधार बूटा सिंह थे.

एक आईपीएस अफसर की मदद से राजीव गांधी और देवरहा बाबा की मुलाकात कराई गई थी. ये अफसर बाबा के चेले थे. उत्तर भारत में देवरहा बाबा के बहुत से अनुयायी थे और वो कद्दावर संत थे. वो अपने पैर से लोगों का माथा छूकर उन्हें आशीर्वाद देते थे. वो हमेशा एक ऊंची मचान पर बैठते थे ताकि वो ऐसा कर सकें.

राजीव गांधी, देवरहा बाबा का आशीर्वाद लेने और राम मंदिर के मुद्दे पर उनसे मार्गदर्शन लेने गए थे. नारायण दत्त तिवारी ने उस मुलाकात के बारे में मुझे बताया था कि देवरहा बाबा ने राजीव गांधी से कहा कि, 'बच्चा हो जाने दो'. बाबा के कहने का मतलब ये था कि राम मंदिर का भूमि पूजन हो जाने दो.

इस मुलाकात के लिए तिवारी और बूटा सिंह भी राजीव गांधी के साथ गए थे. तिवारी ने बाद में मुझसे कहा कि, 'बच्चा ने हो जाने दिया'. यानी खुद तिवारी इस विवाद से अपना पल्ला झाड़ रहे थे.

sonia rajiv EDITED

कांग्रेस की सरकारों का छल है अयोध्या की कहानी

साफ है कि अयोध्या की कहानी, इसका इतिहास कांग्रेस की सरकारों के छल और गैरकानूनी फैसलों से भरा पड़ा है. इसमें केंद्र की सरकारें भी शामिल रही हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उसी वक्त इस खतरनाक साजिश का अंदाजा हो गया था, जब 22 नवंबर 1949 को रात में चुपके से रामलला की मूर्तियां विवादित जगह पर रख दी गई थीं. जबकि उस वक्त के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत इसके खिलाफ थे.

नेहरू जहां राजनीति और धर्म के घालमेल के बिल्कुल खिलाफ थे. वहीं राजीव गांधी ने मंदिर के ताले खोलने का फैसला करके हिंदू वोटों की लामबंदी अपने हक में करने की कोशिश की. ताकि वो वीपी सिंह की बगावत से निपट सकें. हालांकि कांग्रेस की ये चालाकी काम नहीं आई और उसने पूरे देश में अपना जनसमर्थन गंवा दिया.

जिन्हें भी अयोध्या की घटनाओं में दिलचस्पी है, उन्हें पता है कि वहां पिछले 25 सालों से मंदिर के लिए पत्थर तराशे जा रहे हैं. राजस्थान से भारी मात्रा में संगमरमर लाकर वहां उनकी ढलाई का काम चल रहा है. ये काम विवादित जगह से कुछ ही दूरी पर हो रहा है. और किसी से छुपा नहीं.

जब भी राम मंदिर का मुद्दा याद आता है. तो याद आता है वो दौर. कांग्रेस बार बार इस मुद्दे पर नाराजगी जाहिर करके छलावा देती रही है. कांग्रेस के घड़ियालू आंसू के दिन अब  निकल गए हैं. कोर्ट की ये पहल अब कौन सा रास्ता अख्तियार करती है. ये देखना होगा.

 

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