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समाजवादी पार्टी को बीएसपी का समर्थन लंबी रणनीति का संकेत तो नहीं?

मायावती जानती हैं कि उनके कहने पर दलित वोट समाजवादी पार्टी की तरफ चला जाएगा. उनकी चिंता यह होगी कि समाजवादी पार्टी का वोटर बीएसपी का साथ देता है या नहीं

Naveen Joshi Updated On: Mar 06, 2018 10:03 AM IST

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समाजवादी पार्टी को बीएसपी का समर्थन लंबी रणनीति का संकेत तो नहीं?

उत्तर प्रदेश के दो लोक सभा उपचुनावों- गोरखपुर और फूलपुर- में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को बहुजन समाज पार्टी के समर्थन और फिर राज्यसभा चुनावों में एसपी के समर्थन से बीएसपी प्रत्याशी को जिताने के समझौते की घोषणा चौंकाने वाली ही नहीं, ऐतिहासिक भी है.

मायावती या उनका प्रत्याशी समाजवादी पार्टी के समर्थन से राज्यसभा जाएंगे, यह इतिहास का खुद को दोहरा रहा है या कोई नई इबारत लिखी जाने वाली है?

25 वर्ष पहले सन 1993 में उग्र हिंदुत्व की लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने से रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में चुनावी करार हुआ था. यह समझौता ऐतिहासिक इस मायने में था कि पिछड़ों और दलितों के आक्रामक सामाजिक रिश्ते चुनावी गठबंधन में बदल गए थे. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष कांशीराम और तब समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव की यह रणनीति सफल हुई थी.

बाबरी मस्जिद ध्वंस का ‘श्रेय’ और अयोध्या में राम मंदिर बनाने के संकल्प के साथ चुनाव लड़ने वाली बीजेपी तब सत्ता से वंचित रह गई थी, हालांकि सबसे ज्यादा विधायक उसी के जीते थे.  जून 1995 में एसपी-बीएसपी नेताओं की हिंसक झड़पों और राज्य अतिथि गृह में मायावती पर हमले के बाद यह समझौता टूट गया था.

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बीजेपी ने इस लड़ाई का खूब फायदा उठाया. अपने समर्थन से एकाधिक बार मायावती की सरकार बनवाकर उसने एसपी-बीएसपी की दरार चौड़ी कर दी. पिछले 23 वर्षों में चुनावी दोस्ती की बात कौन कहे, मुलायम और मायावती ने एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखा.

अखिलेश के नेतृत्व में आई नरमी

2016 में समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह के बाद मुलायम सिंह के नेपथ्य में जाने और पार्टी की कमान अखिलेश यादव के हाथ आने के बाद इन तल्ख रिश्तों में कुछ नरमी के संकेत मिले थे. 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने के प्रस्ताव पर अखिलेश ने बीएसपी के साथ मेल-मिलाप की संभावना पर हामी भरी थी, हालांकि तब मायावती ने प्रस्ताव सिरे से खारिज कर दिया था.

फिर समाजवादी और कांग्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा था. मायावती के रुख में बदलाव तब दिखा जब बिहार में नीतीश कुमार के भाजपा के साथ चले जाने के बाद लालू यादव ने बीजेपी-विरोधी दलों की बड़ी रैली पटना में बुलाई और अखिलेश के साथ मायावती को भी आमंत्रित किया. मायावती रैली में तो नहीं गईं लेकिन बीजेपी के खिलाफ मोर्चा बनाने के प्रस्ताव पर सहमत दिखीं. तब उन्होंने कहा था कि बीएसपी बीजेपी-विरोधी मोर्चे में शामिल हो सकती है बशर्ते सीटों का बंटवारा पहले कर लिया जाए. उसके बाद बात आई-गई हो गई थी.

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दिसंबर 2017 में गुजरात में बीजेपी की पुन: विजय के बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले दो लोकसभा उप-चुनावों में विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने की चर्चा चली थी. गोरखपुर और फूलपुर लोक सभा सीटें क्रमश: मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद वर्मा के इस्तीफे से खाली हुई हैं. यह भी चर्चा थी कि फूलपुर से मायावती को संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी बनाया जाए तो बीजेपी को हराया जा सकता है. मायावती ने राज्यसभा में अपनी बात ठीक से रखने का मौका नहीं दिए जाने का आरोप लगा कर सदन से इस्तीफा दे दिया था.

वोटों का गणित

इसी दौरान राज्यसभा चुनाव का गणित भी चर्चा में रहा. बीएसपी अपने मात्र 19 विधायकों के बल पर एक भी राज्यसभा सीट नहीं जीत सकती. उधर 47 विधायकों वाली समाजवादी पार्टी के पास अपना एक प्रत्याशी जिताने के बाद 10 वोट बचते हैं. अगर ये दस वोट बीएसपी को मिल जाएं तो चंद और वोट (कांग्रेस से) जुटाकर बीएसपी राज्यसभा की एक सीट जीत जाएगी. अन्यथा आसार हैं कि बीजेपी जोड़-तोड़ से राज सभा की नौवीं सीट भी जीत लेगी. आठ सीटें जीतने की स्थिति में वह आराम से है.

उप-चुनावों का मत-गणित भी रोचक है. 2014 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर में बीजेपी को मिले मत (51.80%) एसपी ( 21.75%) और बीएसपी (16.95%) को मिले कुल मतों से काफी ज्यादा थे. मगर 2017 के विधान सभा चुनाव में एसपी+कांग्रेस और बीएसपी के कुल वोट पांच में से चार विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी से अधिक थे.

यही हाल फूलपुर लोकसभा सीट का भी था. आसन्न उप-चुनाव में कांग्रेस ने भी अपने प्रत्याशी खड़े किए हैं. राज्य में कांग्रेस की पतली हालत को देखते हुए कहा जा सकता है कि एसपी-बीएसपी के वोटर एकजुट रहे तो बीजेपी के लिए चुनाव कतई आसान न होगा.

इस संभावना पर दोनों तरफ से कोई बोल नहीं रहा था, भीतर-भीतर बातचीत अवश्य चल रही थी. मायावती दोनों लोकसभा सीटों के बीएसपी कोऑर्डिनटरों से लगातार संपर्क में थीं.

तीन मार्च को त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय के चुनाव नतीजे बीजेपी के पक्ष में आते ही लगता है कि एसपी-बीएसपी को साथ आने की जरूरत शिद्दत से महसूस होने लगी. अखिलेश यादव पहले से ही एकता के पक्ष में थे. मायावती को भी वक्त की नजाकत समझ में आ गई और समझौते का ऐलान हो गया. मगर दोनों तरफ सतर्कता भी

Akhilesh Yadav

इस समझौते की घोषणा अखिलेश ने की न मायावती ने. स्थानीय नेताओं ने इस सहमति का ऐलान किया. दोनों फिलहाल इसे घोषित रूप से बहुत महत्व नहीं दे रहे. इसकी कुछ खास वजह है. एक तो यही कि दोनों के रिश्तों की खटास अभी पूरी तरह मिटी नहीं है. दोनों के जनाधार वाली पिछड़ी और दलित जातियां परंपरागत टकराव वाली हैं.

दोनों मिलकर बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं, इस आशंका से समझौता तोड़ने की साजिशें बाहर-भीतर से हो सकती हैं. सतर्कता स्वाभाविक है. मायावती ज्यादा सावधान हैं. जब मीडिया में यह कयास लगाए जाने लगे कि एसपी-बीएसपी का यह चुनावी समझौता 2019 के लोकसभा चुनाव तक जा सकता है तो उन्होंने तुरंत सफाई दी कि बीएसपी ने किसी पार्टी से चुनावी समझौता नहीं किया है. हम सिर्फ बीजेपी को हरा सकने वाले मजबूत उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं.

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मायावती इस चुनावी रणनीति को परखना चाहती हैं. वे जानती हैं कि उनके कहने पर दलित वोट समाजवादी पार्टी की तरफ चला जाएगा. उनकी चिंता यह होगी कि समाजवादी पार्टी का वोटर बीएसपी का साथ देता है या नहीं. फिर, दलित वोटों में बीजेपी की सेंध भी उनकी चिंता का बड़ा कारण होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछड़ों (यानी एसपी) का साथ देने की बजाय दलित वोटर बीजेपी के साथ जाना चाहें? बीजेपी इस जोड़-तोड़ में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली.

2019 की संभावनाएं

बड़ा सवाल स्वाभाविक ही यह उठ रहा है कि क्या समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी की यह जुगलबंदी 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी बड़े बीजेपी विरोधी मोर्चे का आधार बनेगी? त्रिपुरा के नतीजों से चिंतित ममता बनर्जी से लेकर तेलंगाना के टी चंद्रशेखर राव और बीजेपी से खिन्न चल रहे तेलुगु देशम के नेता ऐसी संभावना पर चर्चा कर ही रहे हैं. एसपी-बीएसपी का साथ आना इस मुहिम को और हवा दे सकता है.

बिहार में एक-दूसरे के धुर विरोधी लालू और नीतीश बीजेपी को हराने के लिए एक मंच पर आए और सफल हुए थे.

उत्तर प्रदेश में कट्टर शतुत्रा पालने वाले एसपी-बीएसपी को साथ लेना विपक्षी एकता के सूत्रधारों को सबसे कठिन लगता रहा है. आज जब वे स्वयं परस्पर सहमति तक पहुंचे हैं तो आगे की राह आसान बन सकती है.

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने की राह आसान करती हैं. अगर यहां बीजेपी के मुकाबले तगड़ा मोर्चा बने तो 2019 की लड़ाई कांटे की हो जाएगी. इसके लिए एसपी-बीएसपी की दोस्ती अनिवार्य होगी.

विपक्षी एकता के लिए मायावती के रुख में आते सकारात्मक परिवर्तन का संकेत यह भी है कि उन्होंने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को समर्थन देने की पेशकश की है. उन्होंने कहा है कि अगर यूपी में कांग्रेस के विधायक बीएसपी को समर्थन दें तो बीएसपी मध्य प्रदेश से राज्यसभा के चुनाव में कांग्रेस को समर्थन दे सकती है.

दरअसल, बसपा को यूपी से अपने प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए समाजवादी पार्टी के समर्थन के अलावा कांग्रेस की मदद भी चाहिए होगी. मध्य प्रदेश में बीएसपी के चार विधायक हैं. हाल के उप-चुनावों में जहां कांग्रेस जीती, वहां बीएसपी ने अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किए थे.

मायावती जाएंगी राज्यसभा या कोई और?

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यह प्रश्न भी स्वाभाविक है कि समाजवादी पार्टी के सहयोग से बीएसपी किसे राज्यसभा भेजना चाहती है? क्या मायावती उम्मीदवार होंगी? राज्यसभा से इस्तीफा दिए उन्हें बहुत ज्यादा समय नहीं बीता है. ऐसे में यही संभावना ज्यादा लगती है कि वे अपने भाई आनंद कुमार को राज्य सभा भेजेंगी, जिसे उन्होंने हाल में पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है.

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मायावती के अगले कदम का आकलन करना हमेशा कठिन रहा है. पार्टी को मजबूत करने में ज्यादा समय देने के लिए वे खुद अलग रह कर आनंद को चुनाव लड़ा सकती हैं. या क्या पता, इस आशंका से कि बीजेपी विरोधी मुहिम का हिस्सा बनने पर मोदी सरकार आय से अधिक सम्पत्ति के मामलों में सीबीआई को उनके पीछे लगा सकती है, वे पुन: राज्यसभा पहुंच कर विशेषाधिकार का एक कवच ओढ़ने की सोच रही हों.

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