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खुद की तबाह जिंदगी की किताब को 24 साल जेल में पढ़ता रहा, जो अब तक लिखी ही नहीं गई है!

बात 1990 के दशक की है. मैं दिल्ली यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष था. देश और दिल्ली की राजनीति में नाम-काम सब हासिल हो चुका था. बस थोड़ी और मेहनत-मशक्कत करके संसद में जाने की तैयारी में जुटा था

Updated On: Dec 30, 2018 03:11 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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खुद की तबाह जिंदगी की किताब को 24 साल जेल में पढ़ता रहा, जो अब तक लिखी ही नहीं गई है!

‘मेरी तबाह जिंदगी का जीते-जी ‘जनाजा’ जमाने में खूब निकल चुका है. अब से करीब 24 साल पहले. मेरे जीते-जी ही कुछ लोगों ने इस कदर ऊंचे-नीचे उछाला मेरा जनाजा कि, मेरी ही आंखों के सामने मेरा ‘ताबूत’ नेस्तनाबूत हो गया. करीब दो दशक जैसे लंबे अरसे बाद जेल की सलाखों से बाहर आकर भी. दुनिया की भीड़ में मुझे अपना सा कोई नजर ही नहीं आ रहा है. सजायाफ्ता मुजरिम के रुप में फांसी के फंदे पर चढ़ने से तो सुप्रीम-कोर्ट ने बचा लिया. उम्रकैद से भी कहीं ज्यादा वक्त की (24 साल से ज्यादा) सजा मगर फिर भी काटनी पड़ी. जेल से बाहर आने के बाद से मैं अपने ही ‘ताबूत’ की टूटी-फूटी खपच्चियां (टुकड़े/किरचें) बटोरने की अजीब-ओ-गरीब सी जद्दोजहद में जुटा हूं.

जेल से बाहर आने के बाद भी अगर किसी का सहारा मिला तो वह हैं, जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर बेनूर-सी जिंदगी ढोती 80 साल की बूढ़ी मां. जमाने की भीड़ में भी तन्हा खड़े 85 साल के पिता के कंधे. वो मजबूत कंधे जो, कम-से-कम मेरे लिए तो लौह-स्तंभ या संबल से कम नहीं हैं. मैं कौन हूं? क्यों हुई मुझे ब-मशक्कत उम्रकैद की सजा? कैसे बचा मैं चढ़ने से फांसी के फंदे पर? तमाम सवालों के जबाब पाने के लिए, आपको पढ़ने होंगे मेरी बर्बाद जिंदगी की उस किताब के कुछ पन्ने जो, आज तक लिखी ही नहीं गई.’ पेश है ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस विशेष-किश्त में मोहब्बत के खोने के डर में! एक बेहद खूबसूरत लड़की का कत्ल कर बैठने वाले पूर्व सजायाफ्ता ‘मुजरिम’ की ही मुंहजुबानी. बिना किसी काट-छांट (संपादन) या संशोधन के.

स्वर्ग और नरक साथ-साथ नहीं मिला करते

बात 1990 के दशक की है. मैं दिल्ली यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष था. देश और दिल्ली की राजनीति में नाम-काम सब हासिल हो चुका था. बस थोड़ी और मेहनत-मशक्कत करके संसद में जाने की तैयारी में जुटा था. इसी बीच दिल्ली की एक खूबसूरत पंजाबी लड़की से मुहब्बत हो गई.

शंका दोनों के मन में नहीं थी. लिहाजा बिना शादी किए ही हम-दोनों गोल-मार्केट स्थित एक फ्लैट में बतौर ‘पेइंग-गेस्ट’ रहने लगे. वक्त के साथ उस ‘प्यार’ को पाने के लिए मैं हद से पार (पजेसिव) होने लगा. इसी बीच मुझे लगा कि, मेरा प्यार राह भटक रहा है. राह से भटकती वो किसी भीड़-भाड़ वाले चौराहे की ओर बढ़ने लगी थी. मैं उसे (प्रेमिका) हर कीमत पर पाने की जिद में हद से पार जुनूनी होता जा रहा था. धीरे-धीरे ही सही मगर विपरीत होते हालातों में मेरी सही-गलत सोचने-समझने की ताकत शून्य-प्राय हो चुकी थी.

गुनाह की माफी माँगने दिल्ली से सीधा तिरुपति बालाजी गया और सिर के बाल दान करने के बाद खुद को खुद ही कानून के हवाले कर दिया

गुनाह की माफी माँगने दिल्ली से सीधा तिरुपति बालाजी गया और सिर के बाल दान करने के बाद खुद को खुद ही कानून के हवाले कर दिया

जिंदगी का नरक बनना तय था!

कुछ ही वक्त में मैं ताड़ गया कि, अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है. उसे लाख समझाने-बुझाने की कोशिश की. मगर मेरी हर कोशिश नाकाम रही. बस मेरी और उसकी जिंदगी का यही वह ‘टर्निंग-प्वाइंट’ था जिसने, लाख न चाहते हुए भी उसकी झोली में डाल दी ‘अकाल-मौत’. और मेरे माथे पर लग गया उम्र-भर के लिए उसके (प्रेमिका) कत्ल का कलंक. जो आज 24 साल बाद भी मेरे और जमाने के जेहन में ‘तंदूर’ सा धधक रहा है. वो 2 जुलाई सन् 1995 की मनहूस शाम थी. मैंने उसे उस शाम भी किसी अजनबी से फोन पर बात करते हुए देख-सुन लिया. अपने ज़ख्मों को सुलाने-सहलाने की जद्दोजहद में मैं पहले से ही उलझा हुआ था. उस शाम मगर ज़ख्मों तेजाब की जलन न-काबिल-ए-बर्दाश्त थी. परिणाम यह हुआ कि हदों और घर के बाहर झांकती अपनी उस ‘इज्जत’ को. मेरे आवेश ने हमेशा-हमेशा के लिए सुला दिया. अकाल मौत की गोद में. बदन में दो गोलियां उतारकर!

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उसकी मौत के बाद माफी मांगने मंदिर चला गया

मैली हो चुकी जिंदगी से पिंड छुड़ाने के बाद मन पर लदा बोझ हल्का हुआ. तो खुद के किए पर पश्चताप होना भी लाजिमी था. सो पहले सोचा कि, भागने से बेहतर दिल्ली-पुलिस के सामने ‘सरेंडर’ कर दूं. फिर सोचा कि, पुलिस के सामने पेश होने से पहले, अपने हाथों भावावेश में हो चुके ‘पाप’ का पश्चताप पहले कर लिया जाए. लिहाजा जा पहुंचा तिरुपति बालाजी मंदिर. सुना था कि, वहां सिर के बाल-मुंडवा देने से तमाम गुनाहों से तुरंत मुक्ति मिल जाती है. सो मैंने भी अनजाने में अचानक हुए गुनाह की माफी मांगते हुए अपने सिर के बाल कटवाकर तिरुपति बालाजी को भेंट कर दिए. साथ ही चालीसा (40 दिन का व्रत) भी रखने का वहीं प्रण ले लिया.

गुनाहगार था, पेशेवर अपराधी नहीं

मैं कोई पेशेवर हत्यारा नहीं था. शायद यही कारण रहा होगा कि, कई साल बाद में मेरी सोच और हालात, देश के सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों (जस्टिस रंजना देसाई, रंजन गोगई और जस्टिस पी. सथाशिवम) वाली पीठ के समक्ष भी सही साबित हुई. सो सोचा कि, अब खुद को कानून के हवाले कर दिया जाए. लिहाजा मद्रास में चीफ सेशन कोर्ट से 14 दिन की एंटीसिपेटरी वेल (अग्रिम जमानत) ले ली. उधर दिल्ली में आधी रात को महिला की अधजली लाश मिलने के बाद से सनसनी फैल चुकी थी. पसीने से तर-ब-तर दिल्ली पुलिस हर हाल में मुझे दबोचने के लिए हांफ रही थी. बदतर होते हालात देखकर अंतत: मद्रास के वकील अनंत नारायण के मश्विरे पर उनकी मौजूदगी में ही. मैंने 9 जुलाई 1995 को बंगलौर पुलिस के सामने ‘सरेंडर’ कर दिया. 10 जुलाई 1995 को मैं दिल्ली पुलिस की कस्टडी में बतौर ‘मुलजिम’ खड़ा हुआ था. उसके कत्ल के आरोप में.

खुद के पांव पर जेल पहुंचकर भी लगा कोमामें हूं

इससे पहले कभी तिहाड़ जेल का मुंह नहीं देखा था. दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 26 जुलाई 1995 को पुलिस रिमांड खत्म होने पर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया. जेल-वैन से उतरने का तो याद है. उसके बाद कब मैं जेल की काल-कोठरी में दाखिल हो गया, मुझे नहीं मालूम. यूं तो जेल की कोठरी तक अपने ही पांवों पर चलकर पहुंचा था. सुन्न हो चुके दिमाग ने मगर मेरी हालत ‘कोमा’ के मरीज सी कर दी थी. देख और कर तो सब रहा था. समझ में लेकिन कुछ नहीं आ रहा था. जब जेल की कोठरी में एंट्री करा दी गई, तो लगा मानो जिंदगी ‘शून्य’ है. अनजान सा ‘डर’ दिल-ओ-जेहन में आ-जा रहा था.

24 साल में जेल की वो दो रातें जो आंखों में गुजरीं

पहली रात जेलकर्मी सेल (जेल की काल-कोठरी) में छोड़कर बाहर से ताला जड़कर चले गए. आधी रात के बाद तक जेल में मुझे देखने वाले तमाशबीनों की भीड़ जुटी रही. मैं पहली रात उस जेल की कोठरी को ‘शौचालय’ समझ बैठा. थोड़ी देर में सब गलतफहमियां रफूचक्कर हो गईं. वो शौचालय नहीं, मेरी काल-कोठरी थी. उसी में शौचालय, नहाने के लिए खुले पानी की छोटी सी हौदी (वॉटर-टैंक) था. किनारे पर 3x6 फुट लंबा-चौड़ा सीमेंट का ऊंचा सा फर्शनुमा (चबूतरा) सोने के लिए बिस्तर के रूप में नसीब हुआ था. यह सब देखकर सिहर गया. तब महसूस हुआ कि, जेल की जिंदगी आखिर नरक क्यों कही-समझी जाती है? जेल की वो पहली रात आंखों में जागकर ही गुजर गई. सजायाफ्ता कातिल के रूप में 24 साल से ज्यादा तिहाड़ जेल में कैद रहा. इतनी लंबी अवधि में दूसरी वो रात जब मुझे रिहा होना था. वो भी जागकर ही गुजरी.

जेल ने सिखा दी कि इंसान कमजोर और वक्त बलवान है....सुशील शर्मा

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वो दिन जब आ गये आंखों में आंसू

9 साल लंबे चले ट्रायल के बाद वो दिन (7 नवंबर 2003) भी आ गया. जब सजा मुकर्रर होनी थी. सजा वाले दिन मां-पिता से कोर्ट पहुंचने से मना कर दिया था. मुझे पता था कि, मां मेरी सजा को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी. अदालत ने जैसे ही मुझे सजा-ए-मौत सुनाई तो, आंखों में आंसू छलक पड़े. कहने को दिल्ली की भीड़ भरी उस पटियाला हाउस अदालत में तमाम लोग आसपास थे. फिर भी बिल्कुल तन्हा सा मैं, दीवारों-छत में तलाश रहा था, उस ईश्वर को जिसे जमाना पूजता है. मौत की सजा सुनकर कब जेल-वैन में ले जाकर लाद दिया गया याद नहीं. फांसी की सजा सुनकर जिस रात दोबारा जेल में पहुंचा तो लगा कि, किसी को पाने की सनक ने, मुझे कहां से कहां ला पटका. मुसीबत और उलझन के उन दिनों में मुझे कोई समझने-समझाने (काउंसलर) वाला मिला होता, तो शायद दो खानदानों की खुशियां उजड़ने से बच जातीं.

गायत्री मंत्र, वैद्य जी और जेल-वार्डन ने बचा लिया

वक्त और हालात से सब हारे सो मैं भला ‘अजेय’ कैसे साबित हो सकता था. इरादा संसद में जाने का था. वक्त ने मगर पहुंचा दिया सजायाफ्ता कैदी के रूप में तिहाड़ जेल की सलाखों में. कई बार सोचा कि, जेल में रोजाना इस ‘छोटी-मौत’ को गले लगाने से बेहतर है ‘आत्म-हत्या’ कर लूं. एक दिन जेल में एक जेल-वार्डन, दहेज के आरोप में जेल में परिवार सहित कैद एक वैद्यजी ने समझाया. तो ध्यान गीता-गायत्री-मंत्र की ओर मुड़ गया. अब 24 साल से भी ज्यादा वक्त जेल की सलाखों में गुजार कर निकला हूं. जेल से बाहर आने के बाद अतीत को देखता हूं तो लगता है कि, जेल में मैं अपनी ही जिंदगी की, वो किताब पढ़ता रहा था जो, अभी तक लिखी ही नहीं गई.

कसूरवार हो या फिर बे-कसूर...जेल की सलाखों में सब दुखी ही होते हैं

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सोचता हूं जेल क्यों कब और किसने बनाई

खुद जेल में 24 साल रहा. इसके बाद भी सोचता हूं कि, आखिर यह जेल क्यों, कब और किसने बनाई होगी? अजीब है जेल की जिंदगी. जेल में ही अहसास हुआ कि, जरूर वो एक अंधा-लम्हा रहा होगा जिसमें मुझसे वह भयानक गुनाह हो गया. फिर जब जेल गया तो, जेल की कैद ने अहसास कराया कि ‘बंदिश’ क्या बला होती है? ये भी जेल के भय का ही माद्दा है कि, एक बार जो इंसान 14 साल के लिए जेल में आ गया, वो दोबारा कभी मैंने तो वापिस जेल की सलाखों में लौटकर आते नहीं देखा. 24 साल से ज्यादा तिहाड़ में बंद रहने के दौरान.

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मनमुटाव पर भारी पड़ा सलाखों का वजन

जेल ने ही समझाया कि, पाने के चाहत में जिससे मनमुटाव हुआ. यहां तक कि, आवेश में आकर मुझसे अनजाने में वो गुनाह हो गया. सच पूछो तो वो सब उतना भारी नहीं था, जितनी जेल की बंदिश और उसकी सलाखों का वजन भारी था. जेल गया उस वक्त उम्र थी महज 36 साल. अब 60 साल का हो चुका हूं. 21 दिसंबर 2018 की रात जेल से बाहर आ गया. समाज के ठेकेदारों के जेहन में अब सवाल कौंध रहा होगा कि, इस कदर हासिल हो चुकी बर्बादी के बाद  क्या करुंगा? 80 साल की बूढ़ी मां और 85 साल के बुजुर्ग पिता की सेवा करुंगा, कर रहा हूं. अपनी बाकी बची जिंदगी जैसी विधाता ने लिखी होगी काट लूंगा. ऐसे ही और भी तमाम सवालों के जबाब में मुझे मशहूर शायर मरहूम मुज़फ्फ़र रज़्मी साहब के चंद अल्फाज से ज्यादा बेहतर और कुछ नजर नहीं आता है कि....

‘मेरे दामन में अगर कुछ न रहेगा बाकी.

अगली नस्लों को दुआ दे के चला जाऊंगा’

तिहाड़ से घर पहुंचने के बाद अपने माता-पिता से मुलाकात करते सुशील शर्मा

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जहां जड़े जाते हैं भविष्यऔर अतीतपर ताले

24 साल की लंबी जेल की जिंदगी ने समझा-सिखा दिया है कि, किस कदर इंसान कमजोर और वक्त सदैव मजबूत होता है. जब जेल गया तो, सब अपने किनारा कर गए. 24 साल बाद जेल से बाहर आने पर इंतजार करते मिले तो, महज बूढ़े मां-बाप. जेल से छूटकर आने वाली रात भी एक अदद ममेरा भाई वैभव शर्मा और दो-चार अन्य शुभचिंतक ही थे. घर पहुंचा तो मां-बाप देख कर बिलख पड़े. गुनाहगार हो या बे-गुनाह. जेल की सलाखों में मुझे तो कोई सुखी नहीं मिला. जेल में ही समझा कि, जमाने में यही वो जगह है जहां इंसान के ‘भविष्य’ और ‘अतीत’ पर जड़ दिए जाते हैं ‘ताले’. जबकि बेबस ‘वर्तमान’ नरक से बदतर हालत में हर लम्हा सिसकता है. इसके बावजूद मैं सहज स्वीकार करता हूं कि, मेरी गलती (भले ही आवेश में उठाया गया कदम ही क्यों न सही) थी. जिसकी सजा मैंने भोगी.

साथ ही यह भी गलत नहीं कि, जेल की जिंदगी अब याद करने की हिम्मत नहीं बची है. क्योंकि उन मनहूस 24 साल को मैं, जेल में बाहे पसीने में ही धो-निचोड़ कर छोड़ आया हूं. यह मेरी ही अपनी बर्बाद जिंदगी का रूह कंपा देने वाला काला-अतीत था. मेरा ही नाम है सुशील शर्मा. वही सुशील शर्मा, 1990 के दशक में जिसके माथे पर लगा था, कभी जिंदगी से भी ज्यादा प्यारी रही नैना साहनी की हत्या का कलंक. एक क्षण के आवेश में कब की तबाह हो चुकी जिंदगी की कहानी को अब और लंबी खींचकर ज़ख्मों पर नमक छिड़कवाना न-काबिल-ए-बर्दाश्त है. जेल की तन्हाई में भी हर लम्हा साथ निभा चुके मरहूम मुज़फ्फ़र रज़्मी साहब के खूबसूरत और पसंदीदा चंद अल्फाजों के साथ जेल के जहन्नुम-अतीत को अब बस विराम देना चाहता हूं....

‘वो ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई’

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं, अन्य क्राइम स्टोरी पढ़ने के लिए क्लिक करें)

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