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सुकमा नक्सल हमला: सवा लाख बुलेट प्रूफ हेलमेट की जगह सिर्फ 1800 से चला रहे हैं काम

नक्सलियों से लोहा ले रहे सीआरपीएफ के पास सुरक्षा कवच की बेतहाशा कमी

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Apr 25, 2017 09:36 PM IST

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सुकमा नक्सल हमला: सवा लाख बुलेट प्रूफ हेलमेट की जगह सिर्फ 1800 से चला रहे हैं काम

सीआरपीएफ के बारे में कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फोर्स है. फिर भी सीआरपीएफ संसाधनों की कमी से बेतरह जूझ रही है. नक्सलियों के छापेमार और गुरिल्ला हमले का सामना कर रहे सीआरपीएफ के जवानों के लिए संसाधनों की भारी कमी है. बुलेटप्रूफ हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट और एमपीवी वाहन (माइन प्रोटेक्टेड वेहिकल) जैसे जरूरी संसाधनों की कमी से सीआरपीएफ के जवान जूझ रहे हैं.

सीआरपीएफ के जवानों को लगभग 1.25 लाख बुलेटप्रूफ हेलमेट की जरूरत है. लेकिन, 1800 बुलेटप्रूफ हेलमेट से जवान काम चला रहे हैं. सरकार की तरफ से 38 हजार बुलेटप्रूफ जैकेट भी अभी तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं. लगभग 700 माइनिंग प्रोटेक्टेड वेहिकल (एमपीवी) गाड़ी चाहिए पर महज 125 एमपीवी गाड़ियों से सीआरपीएफ के जवान काम चला रहे हैं.

एमपीवी वाहनों की भी बेहद कमी

Sukma CRPF Injured

हेलीकॉप्टर के जरिए घायल जवानों को रायपुर लाया गया (फोटो: पीटीआई)

नक्सली एरिया में सड़क निर्माण काम कराने का जिम्मा भी सीआरपीएफ के जवानों के हाथों में होता है. सड़क निर्माण कार्य करवाने गए जवानों को चप्पे-चप्पे की जांच कर देखना होता है कि कहीं नक्सलियों ने आईईडी (विस्फोटक) तो नहीं बिछा रखा है. इसके लिए ड्यूटी पर तैनात जवानों को एमपीवी वेहिकल की सख्त जरूरत होती है. जो उनको नहीं मिल पाते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि 10 से 15 किलोग्राम तीव्रता का विस्फोट झेलने की क्षमता एमपीवी वेहिकल में होता है. इससे ज्यादा वजन का धमाका आईईडी वाहन भी नहीं झेल सकते.

सीआरपीएफ के जवानों को 7.22 एमएम की गोली झेलने वाला हेलमेट अभी तक नहीं मिला है. जबकि नक्सली एके-47 और एके-56 से हमला कर रहे हैं. एक अनुमान के मुताबिक सीआरपीएफ के 30 से 35 प्रतिशत जवान गर्दन या उसके उपर के हिस्से में गोली लगने से मरते हैं.

सीआरपीएफ के जवानों को उपलब्ध बुलेटप्रूफ जैकेट काफी कम है. अगर है भी तो काफी भारी. नक्सल विरोधी अभियान में इन बुलेटप्रूफ जैकेट की वजह से सीआरपीएफ के जवानों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

नक्सली हमले में मारे जा रहे जवानों को शहीद का दर्जा नहीं मिलता है. सीआरपीएफ लंबे समय से जान गंवाने वाले जवानों को शहीद का दर्जा देने की मांग करती आई है. लेकिन सरकार ने आज तक सीआरपीएफ की इस मांग को स्वीकार नहीं किया है.

दो महीने में भी डीजी नहीं अप्वाइंट कर पाई केंद्र सरकार

पिछले दो महीने से सीआरपीएफ के डीजी का पद खाली है. सूत्र बताते हैं कि दो महीने से पीएमओ के पास नए डीजी का फाइल पड़ी हुई है, लेकिन, अभी तक नए डीजी का नाम तय नहीं हो पाया है. सीआरपीएफ के डीजी की नियुक्ति अप्वाइंटमेंट कमेटी ऑफ कैबिनेट करती है.

सीआरपीएफ के पिछले डीजी दुर्गा प्रसाद जिस दिन रिटायर हुए थे उसके अगले दिन सुदीप लखटकिया को डीजी का चार्ज दिया गया. दुर्गा प्रसाद और सुदीप लखटकिया दोनो तेलंगाना कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं.

सूत्र बताते हैं कि सीआरपीएफ के अंदर इस वक्त एक भी स्पेशल डीजी रैंक का अधिकारी नहीं हैं. सारे के सारे एडिशनल डीजी ही सीआरपीएफ का पूरा काम देख रहे हैं. स्पेशल डीजी का काम भी एडिशनल डीजी रैंक के अधिकारी ही कर रहे हैं. तीन लाख से भी ज्यादा सीआरपीएफ के जवान इस समय देश के कई हिस्सों में आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं.

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