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इसीलिए भगत सिंह को 'भूरे साहबों' से डर लगता था!

कथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति लोगों के मन में घृणा पैदा कर दी है.

Updated On: Nov 18, 2016 12:51 PM IST

Krishna Kant

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इसीलिए भगत सिंह को 'भूरे साहबों' से डर लगता था!

‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’

यह बात भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी चिट्ठी में कही थी. सुब्रमण्यम स्वामी का ताजा बयान देखकर मुझे भगत सिंह की यह बात याद हो आई. इसी के साथ अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति भी याद आई.

सुब्रमण्यम स्वामी ने हाल ही में कहा, 'बीते समय में हमारे साथ साजिश की गई थी. हिंदुओं को विभाजित किया गया. अल्पसंख्यकों को एकजुट किया गया.'

'अब हम इसका ठीक उल्टा करेंगे. हम हिंदुओं को एकजुट करेंगे और अल्पसंख्यकों को विभाजित करेंगे.’

इसके अलावा सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि चुनाव जीतने के लिए विकास जरूरी है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है.

हमें अपनी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखना चाहिए. उन्होंने मोरारजी देसाई, राजीव गांधी और नरसिम्हा राव का उदाहरण देकर कहा कि ये लोग विकास के लिए प्रयास करने के बावजूद चुनाव हार गए थे.

20-22 के युवक भगत सिंह की 'भूरे साहबों' के बारे में वह आशंका कितनी सही थी! सुब्रमण्यम स्वामी जैसा सरेआम समाज को बांट कर सत्ता हासिल करने के बारे में बयान दे देता है.

सुब्रमण्यम समेत संघ-भाजपा की भगवा ब्रिगेड इसी तरह के बयानों का सहारा लेकर राम मंदिर के मुद्दे को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयासरत है.

ठीक इसी समय सुप्रीम कोर्ट हिंदुत्व को परिभाषित करने, धर्म और राजनीति के मुद्दे को अलग रखने के मसले पर सुनवाई कर रहा है.

सात जजों की बेंच ने 20 साल पुराने हिंदुत्व जजमेंट मामले में 21 अक्टूबर को तीखी टिप्पणी की.

मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा क्यों न चुनाव में धर्म के आधार पर वोट मांगने को चुनावी अपराध माना जाए?

चुनावी प्रक्रिया धर्मनिरपेक्ष होती है और उसमें किसी धर्म को नहीं मिलाया जा सकता. चुनाव और धर्म दो अलग-अलग चीजें हैं. उनको साथ-साथ नहीं जोड़ा जा सकता.

क्या किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य में किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि में धर्म को शामिल किया जा सकता है?

जस्टिस ठाकुर ने कहा कि 20 साल से संसद ने इस बारे में कोई कानून नहीं बनाया. इतने लंबे समय से मामला कोर्ट में है.

क्या इंतजार हो रहा था कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ही फैसला करे, जैसे यौन शौषण केस में हुआ?

हो सकता है कि 20 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा हो कि 'हिंदुत्व धर्म नहीं जीवन शैली है.'

लेकिन अब जब सामुदायिक आधार पर विभाजन पैदा करके राजनीतिक मकसद साधने की खुली राजनीति की जा रही है तो यह जरूरी है कि धर्म और राजनीति की सीमारेखा तय हो.

सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ और अन्य लोगों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर 20 साल पुराने हिंदुत्व जजमेंट को पलटने की अपील की है.

याचिका में कहा गया है कि पिछले ढाई साल से देश में उस आदेशों की आड़ में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिससे अल्पसंख्यक, स्वतंत्र विचारक और उदार लोग भय महसूस कर रहे हैं.

धर्म को राजनीति में घुसाने को लेकर भारतीय दलों में अब कोई हिचक नहीं रह गई है. कांग्रेस यह काम दबे-छुपे करती रही है.

भाजपा ने अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के जवाब में खुलेआम बहुसंख्यक तुष्टीकरण की नीति अपनाई है.

इन दलों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे समाज का समूचा तानाबाना नष्ट हो सकता है.

भारत जैसे विविधता से भरे देश में हिंदुत्व या इस्लाम से जुड़े नियम, कानून, नीतियों के इस्तेमाल से हो सकता है कोई पार्टी चुनाव जीत जाए, लेकिन इससे भारतीय राष्ट्र राज्य कमजोर होगा.

विख्यात फिल्म कलाकार सुधीर दलवी अपने एक लेख में लिखते हैं, 'धर्म का उपयोग राजनीति में नहीं होना चाहिए यह बात देश में सभी को पता है और वर्षों से पता है बावजूद इसके वर्तमान हालात कुछ अलग ही बात कहते हैं.'

'धर्म और राजनीति के घालमेल के कारण विचित्र परिस्थितियां निर्मित होती जा रही हैं. जिसमें जितने प्रश्न हैं उतने जवाब नहीं हैं.'

'धर्म और राजनीति का घालमेल सदियों से होता आ रहा है पर वर्तमान स्वरूप काफी व्यथित करने वाला है. धर्म के नाम पर गुमराह करना और लुटना बंद होना चाहिए.'

हाल के वर्षों में लोगों का कांग्रेस पार्टी से मोहभंग हुआ तो उन विचारों से भी मोहभंग हुआ, कांग्रेस जिनकी आड़ लेकर राजनीति करती थी.

धर्मनिरपेक्षता, समानता, सौहार्द और उदारता की बातें करने वाले का मजाक उड़ाया जाना अब आम बात है.

हाल ही में सार्वजनिक जीवन में जिन भी लोगों ने धर्मनिरपेक्षता आदि का पक्ष लेकर अपनी बात रखने की कोशिश की, उन्हें सोशल मीडिया जैसे मंच पर गालियां दी गईं.

ऐसा इसलिए है कि क्योंकि कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले दलों ने मूल्यों की आड़ में गंदा खेल खेला और उन मूल्यों को ही कलंकित कर डाला.

उत्तर प्रदेश में जब आप धर्मनिरपेक्षता की वकालत करेंगे तो कोई आम आदमी सवाल करेगा कि क्या धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम तुष्टीकरण हैं? क्या इसका मतलब यही है कि राज्य में सैकड़ों दंगे करवाए जाएं?

कथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति लोगों के मन में घृणा पैदा कर दी है.

इसका नतीजा बेहद डरावना है. समयांतर पत्रिका के धर्म और राजनीति विशेषांक में कृष्ण सिंह ने लिखा, 'बीसवीं सदी की शुरुआत इंसान की जिंदगी को बेहतर और खूबसूरत बनाने के सपनों तथा क्रांति और परिवर्तन के नारों के साथ हाशिये पर खड़े आखिरी आदमी के पक्ष में शुरू हुई.'

'पर सदी का अंत आते-आते इतिहास की धुरी तेजी से दक्षिण की ओर घूमने लगी. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचारों के साथ समाज जिन पुरातनपंथी, दकियानूसी, प्रतिगामी धार्मिक मूल्यों को छोड़ना चाहता था वे अब न केवल नए रूप में हमारे सामने हैं बल्कि 21वीं सदी के इस शुरुआती दौर में भयंकर रूप से तथा बहुत तेजी से हमारे बीच फैल रहे हैं. दुनिया ने एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज बनने के लिए जिन मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष किया और शहादतें दीं, लगता है जैसे उनका कोई अर्थ ही नहीं रह गया है.'

इसी अंक में 'धर्मनिरपेक्षीकरण की पड़ताल' शीर्षक वाले लेख में नागरिक अधिकार कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबड़े लिखते हैं, 'आमतौर पर यह दलील दी जाती है कि भारतीय धार्मिक हालात योरोप से अलग हैं और इसलिए धार्मिक और राजनीतिक दुनिया को अलग करने वाली धर्मनिरपेक्षता भारत में लागू नहीं हो पाएगी.'

'यह एक लफ्फाजी भरी, खोखली दलील है, क्योंकि भारत में ऐसा कुछ भी खास नहीं है, जिससे धर्मनिरपेक्षता की स्थापित समझ में तोड़-मरोड़ करने की जरूरत हो. अगर करना ही हो, तो धर्मों की बहुलता और धार्मिक टकरावों के पुराने अतीत को देखते हुए राज्य और धर्मों के बीच दुनिया के किसी भी हिस्से की तुलना में यहां कहीं अधिक सख्त अलगाव की जरूरत होनी चाहिए.' इस दिशा में राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद रखना बेमानी है. सुप्रीम कोर्ट और सिविल सोसाइटी को चाहिए कि वे लोकतंत्र को बचाने के लिए धर्म को राजनीति से दूर रखने की लड़ाई और तेज करें.

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