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सपा-कांग्रेस गठबंधन के गणित में 'साल 2019' का ट्रेलर

साल 2019 तक ये गठबंधन कितना चलेगा ये तो खुद राहुल-अखिलेश भी नहीं जानते

Updated On: Jan 23, 2017 01:49 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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सपा-कांग्रेस गठबंधन के गणित में 'साल 2019' का ट्रेलर

गठबंधन के सस्पेंस से पर्दा हटा. सामने आए अखिलेश-राहुल. युवा जोड़ी के इस्तकबाल में नतमस्तक है कांग्रेस और समाजवादी पार्टी. गठबंधन के दौर में एक नया अध्याय और जुड़ा.

हालांकि इस खिचड़ी में ‘जाट मसाला’ कम है. आएलडी ने हाथ झटक दिया. लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट बनाम मुस्लिम तनाव को देखते हुए समाजवादी पार्टी भी आरएलडी से गठबंधन को हिचकिचा रही थी क्योंकि उसे अपने पारंपरिक मुस्लिम वोटों को खोने का डर था.

अब न कोई डर और न ही कोई चिंता. दोनों पार्टियां इस वक्त सूबे के सबसे बड़े सेकुलर गठबंधन का दावा ठोंक सकते हैं.

अब चिंता बीएसपी के लिए और मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के लिए है.

यह कांग्रेस के लिए राहत की बात है. यूपी में 27 साल के वनवास के बाद पार्टी इस खुशफहमी में है कि यूपी में सरकार भले ही न बना पाए लेकिन सरकार बनाने की भूमिका में जरूर आ गई है.

कांग्रेस के नारे 27 साल यूपी बेहाल का क्या हुआ?

समाजवादी पार्टी 298 सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो कांग्रेस 105 सीटों पर . बड़ा सवाल ये है कि कांग्रेस ने जिस जोर-शोर के साथ यूपी में 403 सीटों पर ताल ठोंक कर चुनाव लड़ने का एलान किया था, वही कांग्रेस बिना लड़े हार क्यों मान गई?

Congress

क्या हुआ कांग्रेस का सीएम चेहरा बनीं शीला दीक्षित का? क्या हुआ 27 साल यूपी बेहाल के नारे का? बिना लड़े हथियार डालने वाली कांग्रेस गठबंधन के फॉर्मूले पर क्यों अटक गई?

दरअसल इस गठबंधन में साल 2004 के लोकसभा चुनावों की झलक है. एनडीए सरकार को रोकने के लिये सोनिया गांधी ने तमाम क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर खड़ा करने में कामयाबी हासिल की थी और अब उसी फार्मूले का राहुल इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन इस खेल के पीछे असली भूमिका प्रियंका गांधी की है.

प्रियंका की बदौलत ही ये गठबंधन पूरा हो सका है. प्रियंका की कोशिश है कि सपा-कांग्रेस के गठजोड़ को महागठबंधन के तौर पर पेश किया जाए और देशभर की गैर बीजेपी विरोधी पार्टियों को इस बहाने एकसाथ ला कर 2019 की तैयारी की जा सके.

इस युवा गठबंधन में सोनिया-मुलायम वाली तल्खी नहीं है बल्कि प्रियंका और डिंपल वाली जुगलबंदी है.

Rahul Gandhi

यूपी चुनाव से 2019 के चुनाव की भूमिका तय होगी

दोनों को लग रहा है कि अब चुनाव जीतने से कोई नहीं रोक सकेगा. इसलिए यूपी चुनाव के गठबंधन के साथ ही साल 2019 के चुनाव की भी भूमिका तय होगी. फॉर्मूले का फंडा साफ है कि तुम हमें सीएम बनवाओ और हम तुम्हें पीएम बनने में मदद करेंगे.

लेकिन कांग्रेस यहां एक बात भूल रही है कि अखिलेश की दिली ख्वाहिश नेताजी को प्रधानमंत्री बनते देखने की है. खुद मुलायम सिंह भी केंद्र में बड़ी भूमिका की उम्मीद में यूपी की राजनीति का उत्तराधिकारी अखिलेश को पांच साल पहले ही बना चुके थे.

ऐसे में साल 2019 तक ये गठबंधन कितना चलेगा ये तो खुद राहुल-अखिलेश भी नहीं जानते

वैसे भी यूपी चुनाव में गठबंधन का इतिहास गवाही दे रहा है कि कभी सपा-बसपा में भी गठबंधन हुआ था . 1993 में हुए सपा-बसपा के गठबंधन में दोनों ने 6-6 महीने सीएम रहने का फार्मूला तय हुआ. फॉर्मूले के तहत पहली बार सीएम बनीं मायावती लेकिन जब मुलायम सिंह की बारी आई तो मायावती ने समर्थन वापस ले लिया.

उससे पहले 1989 में जब मुलायम सिंह पहली बार यूपी के सीएम बने थे तब बीजेपी ने समर्थन दिया था. लेकिन राम मंदिर आंदोलन में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद बीजेपी ने भी यूपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था.

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2001 में कांग्रेस ने बीएसपी के साथ गठबंधन किया था

साल 2001 में कांग्रेस ने बीएसपी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया और चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी को सरकार बनाने का समर्थन दे दिया.

यूपी के सियासी गणित में हर बड़ी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस को रोकने के लिए हाथ मिला चुकी है. लेकिन खिचड़ी का जायका जनता की जुबान पर ज्यादा जोर नहीं मार सका. यही वजह रही कि साल 2007 से जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकार के लिये वोटिंग का इतिहास रचा.

बहरहाल अगर ये गठबंधन चुनाव जीतता है तो अखिलेश के पास लोगों को देने के लिए इस बार स्मार्टफोन होंगे और कांग्रेस के पास अखिलेश के लिए समर्थन जिसका ब्याज वो साल 2019 के लिए वसूलना चाहेगी.

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