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करवट ले रही दक्षिण की राजनीति में बीजेपी के लिए कितनी जगह?

कुल मिलाकर 2019 के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ही दक्षिण भारत महत्वपूर्ण रहेगा

Anant Mittal Updated On: Mar 22, 2018 10:16 AM IST

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करवट ले रही दक्षिण की राजनीति में बीजेपी के लिए कितनी जगह?

उत्तर भारत में पक रही गठबंधनों की ताजा खिचड़ी तो खूब चर्चा में है मगर दक्षिण भारत की विशाल हांडी में खदकती राजनीति की वांछित सुध नहीं लेना आश्चर्यजनक है. वहां भी कर्नाटक और केरल के अलावा कांग्रेस के छीजने और नए नेताओं के उभार ने 2019 का आम चुनाव दिलचस्प रहने के आसार जगा दिए हैं. कर्नाटक में 2014 में 18 लोकसभा सीट जीतने के बावजूद बीजेपी के सामने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कन्नड़ गौरव और लिंगायतों को स्वतंत्र पंथ की कड़ी चुनौती है.

दक्षिण भारत में हाथ-पांव मार रही है बीजेपी

दक्षिण भारत के इन पांच राज्यों की 130 सीट अगली लोकसभा में निर्णायक भूमिका निभाएंगी. उत्तर,पूरब और पश्चिमी भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा छीजने से लोकसभा में बीजेपी की सीटें घटने की अटकलों के बीच दक्षिण से उनकी भरपाई के लिए आरएसएस हाथ-पांव मार रहा है. कांग्रेस भी दुधारू गठबंधन के फेर में है. केंद्र में साल 1998 और 1999 में वाजपेयी और 2004 और 2009 में कांग्रेस की सरकार इन्हीं राज्यों की बदौलत बनी थी. एनडीए को भी दक्षिण में अब जिताउ राजनीतिक गठजोड़ करने होंगे.

आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी से बीजेपी का पुराना गठबंधन टूटने पर एनडीए सरकार अपने 16 समर्थक सांसद और दो मंत्री खो चुकी है. साथ ही आंध्र की सत्ता से भी बीजेपी को हाथ धोने पड़े हैं. उसके चार विधायकों में से दो चंद्रबाबू सरकार में मंत्री थे. बीजेपी खुद उपचुनावों में आठ सीट गंवा चुकी. स्वाभिमान पक्ष की एक सीट से भी एनडीए हाथ धो चुका. लोकसभा में एनडीए की सदस्य संख्या 2014 में 336 से घटकर 311 रह गई. यूपी सहित बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में एनडीए की सीट घटने के कयास हैं.

इन्हीं राज्यों ने मोदी को पूर्ण बहुमत देकर सरकार बनवाई थी. लेकिन बेरोजगारी, कृषि संकट और बढ़ते सामाजिक वैमनस्य से हुए मोहभंग का इजहार लोग लोकसभा के उपचुनावों में लगातार कर रहे हैं. हालांकि इसी दौरान बीजेपी ने अनेक राज्यों में सत्ता हासिल की है मगर उनमें से अधिकतर में शासक दल की 10,15 या 25 साल से सरकार थी. इसलिए विकल्प मिलते ही लोगों ने निजाम पलट दिया. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और झारखंड अपवाद हैं. वहां हर पांच साल पर सरकार पलटने की परंपरा है. तीन राज्यों में बीजेपी ने चुनाव हारने के बावजूद भजनलाल शैली में जोड़तोड़ से सरकार बना ली.

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बहरहाल दक्षिण में कर्नाटक के अलावा मोदी की छवि पर ग्रहण की आशंका से बीजेपी मुक्त है. चार राज्यों तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में उसका कहीं भी ठोस आधार नहीं है. इनमें लोकसभा की कुल 102 सीट हैं जो निचले सदन की 543 सीटों की करीब 19 फीसद हैं. इसलिए इन राज्यों में बीजेपी को एनडीए के घटक सूझबूझ से तय करके मुख्यत: उन्हीं की साख पर चुनाव लड़ना होगा.

तेलंगाना और आंध्र में बीजेपी की जमीन आंक रहा है आरएसएस

बीजेपी और आरएसएस इसी कोशिश में लगे हैं. पूर्वोत्तर में आशातीत सफलता के बाद आरएसएस आंध्र और तेलंगाना में बीजेपी की राजनीतिक जमीन आंक रहा है. इन सहोदर राज्यों में उसी की सलाह पर बीजेपी चुनाव अपने बूते या गठबंधन में लड़ना तय करेगी. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी का विकल्प फिलहाल जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ही है.

आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद कांग्रेस का विधानसभा और लोकसभा में आंध्र से कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है. उसके ज्यादातर नेता जगन शरणं गच्छामि हैं. बाकी पर त्रिपुरा,असम और ओडिशा की तरह कांग्रेस की जमीन खिसका कर अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी डोरे डाल रही है.

tdp vs bjp

नवोदित तेलंगाना में जरूर सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति की तोड़फोड़ के बावजूद 21 विधायकों के साथ कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है. वहां मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस के अधिकतर विधायकों को तोड़ चुके. इस बीच सुगबुगाहट टीडीपी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की भी हो रही है. आखिर मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस की राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं. 'बाबू' दरअसल 2002 के गुजरात दंगे में नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करने के कारण प्रधानमंत्री की टेढ़ी नजर के शिकार हैं. साल 2003 में मोदी किसी कार्यक्रम में हैदराबाद जाने वाले थे तो वहां के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उन्हें गिरफ्तार करने की सार्वजनिक चेतावनी देकर दौरा रद्द करवाया था. ऐसे घोर अपमान को मोदी भला कैसे भूलते?

फिलहाल कर्नाटक में सिद्धारमैया हैं चुनौती

बीजेपी इन सहोदर राज्यों में अपने बूते अकेले चुनाव भी लड़ सकती है अन्यथा वाईएसआर कांग्रेस से हाथ मिला ले तो भी कोई ताज्जुब नहीं. तीसरा विकल्प चुनाव बाद जो पार्टी सबसे ज्यादा सीट जीते उससे गठबंधन का है. यूं भी चार साल तक तो टीआरएस और टीडीपी ही नहीं वाईएसआर कांग्रेस भी मोदी सरकार को समर्थन देते रहे हैं. फिलहाल बीजेपी के सामने कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कन्नड़िगा स्वाभिमान की काट की विकट चुनौती है. सिद्धारमैया ने कर्नाटक में सबसे बड़े मतावलंबी समुदाय लिंगायत को स्वतंत्र पंथ का दर्जा देकर बीजेपी की चुनावी रणनीति को पटरी से उतार दिया है. बीजेपी के घोषित मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी एस येदियुरप्पा हालांकि खुद लिंगायतों के सर्वमान्य नेता हैं मगर अब उनका समर्थन बंटने की आशंका से परेशान है. लिंगायतों के एकमुश्त समर्थन के बूते 2008 में बीजेपी ने कर्नाटक में सरकार बनाई थी. यह कर्नाटक ही नहीं समूचे दक्षिण भारत में बीजेपी के नेतृत्व में पहली राज्य सरकार थी.

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येदियुरप्पा ने खुद चार साल पहले केंद्र सरकार से इस बारे में सिफारिश की थी मगर आरएसएस की विचारधारा ने उसे सिरे नहीं चढ़ने दिया. आरएसएस की तर्ज पर बीजेपी लिंगायतों को वृहद हिंदू समाज में ही शामिल मानती है तो उन्हें अलग पंथ कैसे मान लेती? यह बात दीगर है कि कर्नाटक के मंत्रिमंडल ने 19 मार्च को लिंगायतों को स्वतंत्र पंथ के दर्जे वाला प्रस्ताव मंजूर करके केंद्र सरकार के अनुमोदन के लिए ही भिजवाया है.

इस प्रकार इस विवादास्पद एवं राजनीतिक संवेदनशील मुद्दे का अंतिम फैसला कानूनन बीजेपी नीत मोदी सरकार को ही करना है. इस पर गृह मंत्रालय ने विचार-विमर्श करने की बात कही है. इससे पहले सिद्धारमैया मंत्रिमंडल राज्य के अलग ध्वज को भी मंजूरी देकर मोदी सरकार के अनुमोदन के लिए भेज चुका है. इनके जरिए कांग्रेस ने कन्नड़ अस्मिता की तुरुप चलकर बीजेपी एवं मोदी-शाह जोड़ी को उनकी गुजरात शैली में ही चुनौती दी है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में बीजेपी के चौतरफा घिरने पर विधानसभा चुनाव का रुख गुजराती अस्मिता की ओर मोड़कर ही चुनाव जीते हैं. बीजेपी कर्नाटक में अगड़ों-लिंगायतों और दलितों के एक वर्ग के समर्थन के बूते सरकार बनाने के फेर में है. बीजेपी को लगता है कि तीनतरफा मुकाबले में कांग्रेस से सत्ता आसानी से छीनी जा सकती है. पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा का जनता दल सेकुलर, कर्नाटक में सत्ता का तीसरा दावेदार है. वे राज्य में दूसरे बड़े और संगठित समुदाय वोकलिग्गा के कद्दावर नेता हैं.

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केरल और तमिलनाडु में आएगी मुश्किल

केरल में बीजेपी हालांकि कांग्रेस को पछाड़ कर सत्तारूढ़ वाममोर्चे का विकल्प बनना चाह रही है मगर त्रिपुरा की तरह वहां राह आसान नहीं है. इसके बावजूद बीजेपी के वोटों की संख्या बढ़ रही है और कुछ जातीय जमातों से उसने गठबंधन भी किया है. आम चुनाव से पहले बीजेपी और भी हाथ-पांव मारकर लोकसभा की एकाध सीट जीतने की पूरी कोशिश करेगी. अलबत्ता कांग्रेस नीत गठबंधन के अच्छे आसार हैं. कांग्रेस देशव्यापी गठबंधन में कामयाब रही तो उसे बीजेपी के विकल्प के रूप में सेकुलर वोटरों का एकमुश्त समर्थन मिल सकता है. हालांकि माकपा नीत मोर्चा भी राज्य में अपनी सरकार के बूते लोकसभा की 21 में अधिक से अधिक सीट जीतना चाहेगा.

बाकी बचा तमिलनाडु तो वहां सवा साल पहले जे जयललिता की मृत्यु के बाद से ही राजनीतिक अनिश्चितता है. ई पलानिसामी और ओ पनीरसेल्वम हालांकि बीजेपी के समर्थन से अन्नादमुक सरकार चल रही है मगर ससिकला जेल से उन्हें अस्थिर करने में जुटी हैं. अन्नाद्रमुक से निष्कासित उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरन ने जयललिता की सीट आर के नगर से विधानसभा उपचुनाव जीतकर नई पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम भी बना ली है.

Actor Kamal Haasan at Rameswaram

दिनाकरन ने उपचुनाव 40,707 वोट से जीता है. तमिलनाडु की राजनीति में निर्दलीय जीतने वाले वे पहले उम्मीदवार हैं. मदुरै में पिछले महीने तमिल अभिनेता कमल हासन ने भी मक्कल नीधि मैयम नाम से नई पार्टी की घोषणा की थी. इसका मतलब है जन न्याय केंद्र. कमल हासन की तरह तमिल सुपरस्टार रजनीकांत भी राजनीतिक दल बनाने की घोषणा कर चुके हैं. अपनी राजनीति की शैली आध्यात्मिक जताकर उन्होंने बीजेपी के साथ की अटकलें लगवा दी थीं. रजनीकांत इसका खंडन कर चुके. उनके प्रशंसकों की संख्या राज्य भर में कमला हासन से कहीं अधिक है.

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इनके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री एम करूणानिधि की द्रमुक, वाइको की एमडीएमके, रामदॉस की पीएमके, फिल्म अभिनेता विजयकांत की डीएमडीके, ठोल तिरूमावलावन की वीसीके, मूपनार की टीएमसी आदि दल पहले से तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय हैं.

एनडीए ने यहां अन्नाद्रमुक की आंधी के बावजूद 2014 में दो सीट जीती थीं. उनमें प्रदेश अध्यक्ष पोन राधाकृष्णन और पीएमके के डॉ रामदॉस शामिल थे. जाहिर है कि 2019 में बीजेपी तमिलनाडु और पुदुच्चेरी की कुल 40 सीट में से अधिकतम सीट जीतने की कोशिश करेगी. डीएमके मोटा हाथ मारने के फेर में है ,मगर बीजेपी के दांव और नए दलों के चलते चुनाव का रूख बदल भी सकता है. डीएमके पिछले 14 साल से कांग्रेस नीत यूपीए में शामिल है. मोदी की करूणानिधि से मुलाकात के बाद इस बारे में अनिश्चितता है. कुल मिलाकर 2019 के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ही दक्षिण भारत महत्वपूर्ण रहेगा.

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