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सोनिया गांधी : एक पार्टी उद्धारक का रिटायरमेंट और विरासत का हस्तांतरण

राजनेता हमेशा इतिहास में जीवित होते हैं और उनका लेखा-जोखा मगध में डूब चुके सूरज की रोशनी में होता है

Sarang Upadhyay Sarang Upadhyay Updated On: Dec 17, 2017 09:22 AM IST

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सोनिया गांधी : एक पार्टी उद्धारक का रिटायरमेंट और विरासत का हस्तांतरण

अवसान इतिहास की देहरी है. राजनीतिक जीवन अवसान के लिए होते हैं और इतिहास में जाकर उदित हो जाते हैं. उद्धारकों की नियति में पद नहीं होते. उनकी सांझ ही उनकी सुबह होती है.

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शनिवार 16 दिसबंर 2017 को 19 साल पुरानी विरासत का हस्तांतरण बेटे राहुल गांधी को कर दिया. उसी बेटे को जो एक समय मां एंटोनिया मायनो को पार्टी के प्रचार के झंझट में भी नहीं पड़ने देना चाहता था. और एक दिन जब वह राजी हुआ था, तो उसने अपनी मां का उत्साह बढ़ाया था-'मम्मी मैं नौकरी छोड़कर आपके साथ हर रैली में रहूंगा.'

अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी का अंतिम भाषण, पति राजीव गांधी के मृत्यु स्थल श्रीपेरंबदूर में बतौर अध्यक्ष दिए गए जीवन के पहले भाषण की परिणति थी. उनके पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की राजनीतिक यात्रा का अंत श्रीपेरंबदूर में हुआ था और सोनिया गांधी ने अपना राजनीतिक सफर वहीं से शुरू किया.

सोनिया गांधी के जीवन में दिसंबर एक महीना नहीं है, बल्कि एक इतिहास है. 28 दिसंबर 1997 को उन्होंने राजनीति में प्रवेश का ऐलान किया था और 16 दिसंबर 2017 को उन्होंने एक विरासत छोड़ दी. संकेत राजनीतिक जीवन को विदा देने के भी हैं. वे रिटायर होना चाहती हैं. संभवत: 2019 के चुनावों में सोनिया के 19 साल का सियासी सफर, अब कांग्रेस के मार्गदर्शक की भूमिका में होगा.

rajiv gandhi

21 मई 1991 को पति राजीव गांधी की हत्या सोनिया गांधी के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी. पति की दर्दनाक मौत का दुख आंखों पर चढ़े काले चश्मे में सिमट गया और शोक, विराट रिक्तता में आज तक अचिह्नित ही रहा है. राजीव के स्टडी रूम में बैठकर लंबे समय तक सोनिया उनकी स्मृतियों के प्रति निष्ठावान रहीं.

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इटली के आरबैस्सेनो से कई बार फोन घनघनाते रहे और परिवार इटली लौट आने की गुहार लगाता रहा. सोनिया ने अपनी मां पाओलो माइनो से कहा था- ‘अब भारत ही उनका घर है. उनके सपने यहीं दबे पड़े हैं’. जबकि बहन से कहा था- यह मेरा जीवन है. मैं अब इस देश को छोड़कर विदेश में नहीं बस सकती. क्योंकि वहां पर मैं सदा ही विदेशी ही रहूंगी. जब मेरी डैडी की मृत्यु हुई, तब यह बात मेरी समझ में आ गई थी. सोनिया कभी इटली नहीं लौटी.

पति राजीव की मौत के बाद सोनिया गांधी तकरीबन तीन साल तक किसी से नहीं मिलीं. वह राजीव की स्मृतियों को समेटती रही. इस दौरान उन्होंने राजीव गांधी पर एक किताब का संकलन भी किया. सोनिया जीवन में लौटना चाहती थीं, जबकि नियति उन्हें कहीं ओर ले जाना चाहती थी. वे जब तक राजनीति में नहीं थीं, तब तक कांग्रेस दिग्भ्रमित रही और विरासत के दावेदारों को आस लगाकर देखती रही. कांग्रेस के भीतर तमाम दिग्गज और चाहने वाले उन्हें कांग्रेस की कमान थामने के लिए कहते रहे. अतीत बताता है कि दिग्विजय सिंह सोनिया को राजनीति में लाने में कामयाब रहे.

कांग्रेस में लोग जानते हैं कि इटली से आई दुल्हन भारतीय राजनीति तो क्या, राजनीति में ही कभी नहीं आना चाहती थी. देश के लोगों को खबर है कि वंशवाद की चढ़ती बेल अवसरों की मुंडेर पर ऐसी ही फलती-फूलती रही है, जबकि खुद सोनिया जानती हैं कि राजनीतिक विरासत का बोझ पृथ्वी के भार से भारी होता है, जो आज उनके कंधों से उतर गया और जिसे वह शायद कभी लेना भी नहीं चाहती थीं.

सवाल यह है कि रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक व्यक्ति क्या करता है? क्या राजनीति रिटायर होने देती है? हमारे समाज में रिटायरमेंट व्यक्ति की भूमिका पर संदेह की छाया होती है? सवाल यह भी है कि सोनिया अब किस भूमिका में होंगी?

सोनिया गांधी निष्ठावान, ईमानदार और भरोसेमंद सिपहसालारों के अभाव में एक ऐसा चेहरा थीं, जो कांग्रेस की विरासत का था. वे कांग्रेस की अध्यक्ष से ज्यादा उसकी उद्धारक बनी रहीं. उसे बनाए और बचाए रखने के बीच. वे कुछ भी नहीं थी, फिर भी सबकुछ थीं.

पहले पृष्ठभूमि, परिवेश, संस्कृति, भूगोल और बाद में राजनीति, भारतीय समाज में उनके परिचय की बड़ी बाधा बना रहा. वह बाधा जब हटी भी तो उनका उद्धारक होना उनके कुछ और होने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया. चूंकि उद्धारकों की नियति में पद नहीं होते. उनकी सांझ ही उनका सुबह होती है. सवाल यह भी है कि क्या सोनिया एक नई भूमिका में दिखाई देंगी?

Rahul Gandhi's elevation ceremony

19 साल के राजनीतिक सफर में सोनिया गांधी कि निष्ठा केवल पति राजीव के प्रति रही, जबकि उस निष्ठा में कांग्रेस एक जिम्मेदारी थी. जिसका जिक्र उन्होंने कई बार किया. अध्यक्ष के रूप में उनका आखिरी भाषण इसके संकेत दे रहा था.

‘हम 2014 से विपक्ष में हैं. हमारे सामने चुनौती है. हमारे संवैधानिक मूल्यों पर हमला किया गया है. लेकिन हम डरने वाले नही हैं. हमारा संघर्ष जारी रहेगा. सत्ता, शोहरत और स्वार्थ हमारा मकसद नहीं है. इस देश के मूल्यों की रक्षा करना हमारा मकसद है. हम सब जानते हैं कि हमारी मिली जुली संस्कृति पर वार हो रहा है. इस बीच कांग्रेस को भी अपने अंर्तमन से जागकर आगे बढ़ना पड़ेगा. यह एक नैतिक लड़ाई है. जिसमें जीत हासिल करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा. ‘सत्ता, शोहरत और स्वार्थ हमारा मकसद नहीं है. इस देश के मूल्यों की रक्षा करना हमारा मकसद है.’

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बहरहाल, सोनिया गांधी की ईमानदारी का मूल्यांकन इतिहास करेगा और कांग्रेस के मकसदों का लोकतंत्र. जैसा कि पहले कहा- राजनेता हमेशा इतिहास में जीवित होते हैं और उनका लेखा-जोखा मगध में डूब चुके सूरज की रोशनी में होता है. देखना यह है कि राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस की दिशा और सोनिया गांधी की भूमिका क्या होगी?

(सूचनाएं एवं तथ्य: स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो द्वारा लिखित सोनिया गांधी की जीवनी रेड साड़ी से संदर्भित)

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