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कई कारणों से असाधारण रहा है सोनिया गांधी का बतौर कांग्रेस अध्यक्ष कार्यकाल

उनके 19 साल के कार्यकाल में कांग्रेस ने न सिर्फ कई ऊंचाइयां देखीं, कई पतन भी देखे

Updated On: Dec 16, 2017 12:50 PM IST

Sanjay Singh

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कई कारणों से असाधारण रहा है सोनिया गांधी का बतौर कांग्रेस अध्यक्ष कार्यकाल

1 जनवरी 2004 को सोनिया गांधी अपने 10 जनपथ निवास से निकलती हैं. एसपीजी सुरक्षा के साथ गोलचक्कर को पैदल पार करती हैं और 12 जनपथ के गेट पर पहुंचती हैं. 12 जनपथ रामविलास पासवान का आवास था. सोनिया की यह छोटी सी पदयात्रा समसामयिक राजनीतिक इतिहास में एक बड़ी घटना बनकर उभरी.

सोनिया की राजनीतिक सूझबूझ

सोनिया गांधी को इससे पहले दिल्ली की सड़कों पर टहलते शायद ही किसी ने देखा होगा. सोनिया ने पासवान से कोई अपॉइंटमेंट नहीं लिया था. उनके दफ्तर ने महज यह चेक किया था कि पासवान घर पर हैं या नहीं. वह बिना ऐलान किए, बिना किसी अपॉइंटमेंट और बिना किसी चेतावनी के वहां पहुंचीं. पासवान के लिए भी यह बेहद आश्चर्यजनक घटना थी, लेकिन वह सोनिया की गर्मजोशी, पहल और राजनीतिक सूझबूझ के कायल हो गए थे. पासवान की पार्टी उस वक्त अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता में थी और ऐसे में सोनिया का गठजोड़ बनाने के लिए उनके पास आना पासवान के लिए बड़ी बात थी. इसके बाद जो हुआ वह इतिहास है. सोनिया और उनके पार्टी रणनीतिकारों ने एक के बाद एक संभावित पार्टनरों से बात की, जिनमें डीएमके और लेफ्ट भी शामिल थे. और इस तरह से यूपीए1 (युनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस) बन सका. उनकी ही कमांड में कांग्रेस एक गठजोड़ सरकार को प्रभावी रूप से एक दशक तक चलाने में सफल रही.

गलतियों से सबक लिया

इससे यह भी पता चला कि उन्होंने अपनी गलतियों से सबक लिया था और एक नेता के तौर पर वह परिपक्व हुई थीं. एक ऐसा परिपक्व नेता जो चुनाव पूर्व गठजोड़ की अहमियत को समझता है. इससे पांच साल पहले, अप्रैल 1999 में बाजपेयी सरकार लोकसभा में एक वोट से हार गई थी. सोनिया ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था और कहा था, ‘हमारे पास 272 का आंकड़ा है और कई और साथ आ रहे हैं.’ उनके पास 272 सांसद नहीं थे और देश को चुनावों के लिए जाना पड़ा. इसके बाद बाजपेयी सरकार सत्ता में आई.

बिना पद के सर्वोच्च सत्ता पर काबिज

2004 में बीजेपी को झटका लगा और कांग्रेस ने आश्चर्यजनक रूप से सत्ता में वापसी की. 10 जनपथ के एकांत में विलाप करने वाली महिला पर कांग्रेस ने महानता और जिम्मेदारी का बोझ डाल दिया था और उन्होंने यह कर दिखाया. पूरी सरकार की सबसे बड़ी शख्सियत वही थीं, सत्ताधारी यूपीए की निर्विवाद चेयरपर्सन थीं और नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (एनएसी) की चेयरपर्सन थीं. उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री नहीं बनाया, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री को नॉमिनेट किया और बिना कोई पद लिए सारी सत्ता अपने हाथ में केंद्रित रखी. वह किसी चीज के लिए जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं थीं.

सभी अच्छे कामों का सेहरा उनके सिर बंधता था और सभी गड़बड़ियां सरकार और पार्टी के सिर मढ़ी जाती थीं. 10 साल के लंबे अंतराल में सरकार के लगातार दो टेन्योर तक वह सुपर प्राइम मिनिस्टर बनी रहीं और एक संविधानेत्तर सत्ता बनी रहीं. यह सत्ता और अधिकार का चरम था. उन्होंने एक ऐसी मिसाल पेश की थी जिस पर चलना शायद किसी और भारतीय नेता के लिए या दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में मुमकिन नहीं होगा.

उनके मन में क्या चल रहा होगा?

आज बड़ा सवाल यह है कि जब वह राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से ठीक एक दिन पहले अपने रिटायरमेंट का ऐलान कर रही हैं, ऐसे में वह क्या महसूस कर रही होंगी. 19 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहने के बाद रिटायमेंट के जरिए वह कांग्रेस में नई पीढ़ी को सत्ता हस्तांतरण करते हुए खुश होंगीं. एक मां और कांग्रेस प्रेसिडेंट के रूप में खुश होंगी कि वह सबसे योग्य शख्स को कांग्रेस को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंप रही हैं. या वह महज एक मां के रूप में खुश होंगी कि एक रीजेंट के तौर पर उनकी भूमिका पूरी हुई और उनका पुत्र अब उनके राज्य (अरे नहीं... पार्टी) का राजा बन रहा है.

132 साल के कांग्रेस के अब तक के इतिहास में सोनिया ही एकमात्र ऐसी शख्स हैं जिन्होंने 19 साल जितने लंबे वक्त तक कांग्रेस की कमान संभाले रखी. यहां तक कि उनके परिवार के बुजुर्ग जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और उनके पति राजीव गांधी तक इस तरह की सुविधा हासिल नहीं कर सके.

दिग्गजों के मुकाबले में खुद को खड़ा किया

कांग्रेस के इतिहास में केवल एक यही चीज सोनिया गांधी के खाते में नहीं आती है. उन्होंने ऐसे वक्त में सत्ता में कांग्रेस की वापसी सुनिश्चित की जब ऐसा होना तकरीबन नामुमकिन लग रहा था. खासतौर पर उन्होंने ऐसे वक्त पर खुद को खड़ा किया जब उनका मुकाबला अटल बिहारी बाजपेयी और एल के आडवाणी जैसे दिग्गजों से था.

सोनिया ने इटली के एक छोटे से कस्बे में एडविज एंटोनिया अलेबिना मैइनो के तौर पर जन्म लेने के बाद से दुनिया की एक असाधारण महिला बनने तक का सफर तय किया और यह एक बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने भारत को अपना घर बनाया और अपने पति की हत्या के बाद तमाम विरोधियों का मुकाबला किया और देश की सबसे ताकतवर शख्सियत बन गईं.

सफलता की जिद

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1998 में चुनाव प्रचार के दौरान हरियाणा के रोहतक में सोनिया गांधी के साथ तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी (बाएं) (रायटर इमेज)

उनके पास कांग्रेस पार्टी की ताकत और लोकप्रिय सहानुभूति थी, लेकिन सफल होने की उनकी जिद ही उनकी शख्सियत को असाधारण बनाती है. उनका उभार भारतीय समाज की एक मिसाल पेश करता है जिसने एक इतालवी मूल की महिला को अपनी बहू के तौर पर अपनाया और उसे इतना प्यार और दुलार दिया कि वह 10 साल तक भारत पर राज करने में सफल रही.

कांग्रेस के पतन की जिम्मेदारी भी उनकी ही

 

Rahul Gandhi-Sonia Gandhiअगर उनका उभार वास्तव में शानदार है तो उनका और कांग्रेस पार्टी का पतन भी उतना ही अहम है. 19 साल के उनके अध्यक्ष पद के कार्यकाल के दौरान कांग्रेस अपने निचले स्तर पर दो बार पहुंची है. एक बार 1999 में जब कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं (उस वक्त तक यह कांग्रेस का सबसे निचला आंकड़ा था) और इसके बाद 2014 में जब कांग्रेस को केवल 44 सीटें ही मिल सकीं. कभी पूरे देश पर शासन करने वाली कांग्रेस अब केवल कर्नाटक, पंजाब और कुछ उत्तर-पूर्वी राज्यों में शासन करने तक सिमट गई है. अगले छह महीनों में कर्नाटक में चुनाव होने हैं और यह तय नहीं है कि कांग्रेस वहां सत्ता में वापसी कर पाएगी.

जीत की तारीफ उनकी, लेकिन हार के लिए कार्यकर्ता जिम्मेदार

गुजरे 19 सालों में उनके इर्दगिर्द का आभामंडल बढ़ा ही है, लेकिन एक अध्यक्ष के तौर पर विस्तार और पार्टी का आधार मजबूत करने की उनकी कोई योजना नहीं रही. उन्होंने 2004 और 2009 के आम चुनावों की अगुवाई की और पार्टी को जिताया भी और इसके लिए हर ओर उनकी प्रशंसा हुई. लेकिन, हर हार के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं, निचले स्तर के सांगठनिक ढांचे को ठीक से काम न करने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. लेकिन, इसी तरह से कांग्रेस ने दशकों के दौरान गांधी-नेहरू परिवार के इर्दगिर्द अपना आभामंडल तैयार किया है.

उनके अध्यक्ष रहते हुए ही कांग्रेस ने प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी को भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई नेता के तौर पर उभरने, संसदीय चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल करने और बीजेपी को डेढ़ दर्जन राज्यों में शासन में आने का मौका दिया.

भ्रम दूर करने की कोशिश

sonia gandhi rahul gandhi

गुजरे कुछ वक्त से वह बीमार चल रही हैं और उनकी आम लोगों के बीच मौजूदगी न्यूनतम रह गई है. लंबे वक्त से वह अपनी अगुवाई वाली पार्टी के लिए कैंपेन नहीं कर रही हैं. ऐसे में यह कोई आश्चर्य नहीं है कि जब उनसे उनके भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बस इतना कहा, ‘मेरी भूमिका अब रिटायर होने की है.’ उन्होंने यह साफ नहीं किया कि क्या वह सक्रिय राजनीति से रिटायर हो रही हैं या वह केवल कांग्रेस के रोजाना के कामकाज को छोड़ रही हैं ताकि उनके 47 साल के पुत्र राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान पूरी तरह से अपने हाथ में ले सकें. वह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को किसी कनफ्यूजन में नहीं रखना चाहतीं, खासतौर पर पुरानी पीढ़ी के कांग्रेसियों को जो कि लगातार पार्टी में उनकी प्रासंगिकता को चाहते हैं.

कांग्रेस में अगले ही पल क्या होने वाला है इसका आमतौर पर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. पार्टी के एक प्रवक्ता ने औपचारिक रूप से पार्टी के सुप्रीम लीडर के बयान को स्पष्ट किया. रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ‘मीडिया के अपने दोस्तों से अनुरोध करूंगा कि इशारों पर भरोसा न करें. श्रीमती सोनिया गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से रिटायर हो गई हैं, राजनीति से नहीं. उनका आशीर्वाद, ज्ञान और कांग्रेस विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता हमेशा हमें रोशनी दिखाएगी.’

इससे सोनिया के लिए पार्टी के संरक्षक की नई भूमिका साफ हो गई है और वह कांग्रेस संसदीय दल की चेयरपर्सन भी बनी रहेंगी.

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