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संजीवनी लाए बजरंगबली, कास्ट सर्टिफिकेट ले आए योगी आदित्यनाथ

हनुमान जी को दलित बताए जाने वाले बयान पर खूब लतीफे बन रहे हैं लेकिन चुटकुलों से आगे बात धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण तक जाती है

Updated On: Dec 01, 2018 01:47 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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संजीवनी लाए बजरंगबली, कास्ट सर्टिफिकेट ले आए योगी आदित्यनाथ

राजस्थान विधानसभा चुनाव के कैंपेन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जात-पात की राजनीति पर जमकर हमला बोला. पीएम के हमलावर तेवर जारी थे कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक गोला दाग दिया. यह गोला कहीं और नहीं बल्कि उन्हीं की पार्टी बीजेपी के पाले में आकर गिरा. हिंदुत्व के पोस्टर बॉय योगी आदित्यनाथ ना जाने कहां से हनुमान जी की जाति ढूंढ लाए. इंसानों से होती हुई जाति जब देवताओं के दरवाजे तक जा पहुंची तो एक बार फिर एहसास हुआ कि भारत के चुनाव से ज्यादा मनोरंजक इस दुनिया में कोई और इवेंट नहीं है.

योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान की एक जनसभा में कहा कि हनुमान जी दलित थे और जंगलों में रहते थे. बात योगी के मुंह से निकली और सीधे वायरल हो गई. कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर हनुमान जी की जाति को लेकर सैकड़ों चुटकुले तैरने लगे. किसी ने पूछा कि दलितों में भी कई जातियां होती हैं, आखिर हनुमान जी किस जाति के थे?

किसी ने यह सवाल किया कि बैक डेट से बजरंगबली का बर्थ सर्टिफिकेट और कास्ट सर्टिफिकेट बनवाने में योगी आदित्यनाथ को कितना वक्त लगा? सवाल यह भी पूछा गया कि क्या दलित बजरंगबली की पूंछ में आग लगाने वाले ब्राह्मण रावण पर एसटी-एसी एक्ट के तहत मुकदमा कब दर्ज किया जाएगा?

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मेनस्ट्रीम मीडिया अपने हिस्से की टीआरपी लूट चुका है और सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर चकल्लस जारी है. आम पब्लिक का एक रिएक्शन यह भी है कि चुनावी मौसम में भारत के नेता कुछ भी बोल जाते हैं और उनकी हर बात को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. लेकिन क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की बातों को यूं ही टाला जा सकता है? हमें यह समझना होगा कि योगी आदित्यनाथ कोई मामूली शख्सियत नहीं हैं.

yogi adityanath

मौजूदा समय वे बीजेपी में प्रधानमंत्री मोदी के बाद दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता हैं और वोटरों को उन तरीकों से लामबंद करने में सक्षम हैं, जिनसे शायद प्रधानमंत्री मोदी तक को परहेज हो. बीजेपी जिस प्रतीकवाद की राजनीति करती है, योगी उसके चैंपियन हैं. इसलिए अगर उन्होने संकेतों में कोई बात कही है, तो उसके गहरे मतलब हैं.

2014 में बीजेपी के लिए दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर गया था. इस बार यूपी उतना ही नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा अहम है. लेकिन हालात अलग हैं. कई चीजों के अलावा सबसे बुनियादी अंतर यह है कि पिछली बार विकास आगे था और हिंदुत्व बहुत पीछे. इस बार हिंदुत्व सबसे आगे है. यह साफ हो चुका है कि 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी राम मंदिर को केंद्र में रखकर लड़ेगी. योगी आदित्यनाथ का मुख्य काम राम के नाम पर हिंदू वोटरों को लामबंद करने का है. उन्हें न सिर्फ यूपी में हिंदू लहर पैदा करना है बल्कि यूपी से बाहर भी अपनी हिंदू हार्डलाइनर वाली इमेज को भुनाकर चुनावी सभाओं में भीड़ बटोरनी है.

दलित बनकर प्रचार में क्यों कूदे बजरंगबली?

अलवर की जनसभा में दलित के वेश में बजरंगबली का प्रकट होना अनायस नहीं है. एक पुराना भजन है 'दुनिया चले ना श्रीराम के बिना, रामजी चले ना हनुमान के बिना', हनुमान के बिना त्रेता में ना तो भगवान राम चल सकते थे और ना ही कलियुग में राम नामधारी कोई नेता चल सकता है. पिछड़ी और दलित जातियों को साथ लिये बिना बीजेपी के लिए वैसी हवा बनाना मुमकिन नहीं है, जैसी 1989 या 1992 में बनी थी. हनुमान की जाति बताने के पीछे आदित्यनाथ की मंशा उन दलितों में आत्मगौरव का भाव भरना है, जो मंदिर के नाम पर 2019 में बीजेपी के साथ खड़े हो सकते हैं.

बीजेपी के विरोधी उसे एक ब्राह्मणवादी पार्टी बताते हैं. ज्यादातर विश्लेषकों को यह बात ठीक लगती है. लेकिन अगर ठीक से देखें तो साफ होता है कि अपने ब्राह्मणवादी एजेंडे को पूरा करने के लिए आरएसएस और बीजेपी ने तमाम जातियों को साधा है. उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, कल्याण सिंह और विनय कटियार जैसे मंदिर आंदोलन के तमाम फायर ब्रैंड नेता पिछड़ी जातियों से हैं. बीजेपी ने सत्ता में पिछड़ों को पर्याप्त भागीदारी भी दी है. खुद प्रधानमंत्री मोदी का नाता ओबीसी वर्ग से है. 2014 में बीजेपी को सिर्फ ओबीसी वोट ही नहीं मिले बल्कि दलितों ने भी बहुत बड़ी संख्या में कमल के फूल पर अपनी मुहर लगाई.

आरएसएस जिस हिंदू राष्ट्र का सपना देखता है, वह 20 फीसदी से ज्यादा आबादी वाले दलितों के बिना संभव नहीं है. देखा जाये तो संघ और बीजेपी एक बहुत जटिल सोशल इंजीनियरिंग में जुटे हुए हैं, जिसके तहत अलग-अलग जातीय पहचानों को गौण करके एक साझा राजनीतिक 'हिंदू' पहचान बनाई जानी है. लेकिन विविधता और जटिलता से भरे हिंदू समाज में ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है. यही वजह है कि बीजेपी का बड़ा कथानक तो 'हिंदू' है, लेकिन उसके साथ-साथ वह लुक-छिपकर जातीय समीकरणों को साधने का काम भी करती है.

hanuman

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने यह काम बखूबी किया. पार्टी को अंदाजा था कि गैर-जाटव दलित वोटर मायावती से नाराज हैं. इसलिए पार्टी ने बाकी दलित जातियों के महापुरुषों का महिमामंडन किया. यही काम ओबीसी वोटरों को लेकर भी किया गया. यूपी की सबसे ताकतवर ओबीसी जाति यादव समाजवादी पार्टी के साथ है. ऐसे में बाकी पिछड़ी जातियों का दिल जीतने के लिए राजा सुहलदेव जयंती जैसे कार्यक्रम बहुत बड़े पैमाने पर शुरू किए गए.

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जिन दलित या पिछड़ी जातियों का मुस्लिम शासकों से कभी संघर्ष हुआ हो, उसका भरपूर महिमामंडन किया गया, ताकि यह समझाया जा सके कि हिंदू समाज की रक्षा के लिए दलित और पिछड़ों बड़े त्याग किये हैं. विनय कटियार ने हाल ही में कहा था कि राम मंदिर बलिदान मांग रहा है. योगी आदित्यनाथ भी अब दलितों से हनुमान बनकर रामकाज पूरा करवाने का संकल्प मांग रहे हैं.

धार्मिक गोलबंदी फायदेमंद जातिगत ध्रुवीकरण नुकसानदेह

यह बात बहुत साफ है कि बीजेपी के लिए धार्मिक गोलबंदी फायदेमंद है और जातीय ध्रुवीकरण नुकसानदेह. धार्मिक गोलबंदी का फिलहाल कोई बड़ा कारण नहीं दिख रहा है. इस समय देश में 1992 जैसा माहौल नहीं है. बीजेपी की तरफ से लगातार आक्रामक बयानबाजी जारी है. राष्ट्रीय स्तर के नेता भी जामा मस्जिद गिराए जाने से लेकर अयोध्या में कहीं भी बाबरी मस्जिद ना बनने देने की बातें कर रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम समाज में लगभग चुप्पी है.

सुन्नी वक्फ बोर्ड जैसे तमाम मुस्लिम संगठनों ने यह कहा है कि राम जन्मभूमि पर अदालत का जो भी फैसला होगा उन्हें मान्य होगा. बीजेपी राम-मंदिर मामले के निबटारे में हो रही देरी के लिए सीधे-सीधे कोर्ट पर उंगली उठा रही है. साथ यह भी दोहरा रही है कि अगर अदालती फैसला प्रतिकूल रहा तब भी मंदिर वहीं बनेगा, लेकिन इस आक्रामकता के बावजूद देश 1992 की दिशा में लौटता दिखाई नहीं दे रहा है. इसका प्रमाण अयोध्या में बुलाई धर्म संसद रही. बीजेपी की भरपूर कोशिश और राज्य सरकार के संसाधनों के झोंके जाने के बावजूद इस कार्यक्रम में वैसी भीड़ नहीं जुटी जिसकी उम्मीद की जा रही थी.

साफ है कि अगर धार्मिक गोलबंदी कमजोर हुई तो जातिगत ध्रुवीकरण बढ़ेगा. उत्तर प्रदेश की तीन लोकसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में यह ट्रेंड देखने को मिला. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हाथ मिलाते ही बीजेपी के पुराने किले ढह गए. गोरखपुर की जिस सीट पर बीजेपी 30 साल से अजेय थी, वहां उसे हार का सामना करना पड़ा.

यही हाल फूलपुर और कैराना में भी हुआ. सपा-बसपा ने अभी कोई घोषणा नहीं की है लेकिन उनका साथ मिलकर चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है. ऐसे में बीजेपी के लिए एकमात्र रास्ता यही है कि वह आक्रामक हिंदुत्व के जरिए सभी वोटरों को एक छतरी के नीचे लाए. लेकिन इस आक्रामकता के खतरे भी हैं.

क्या दलित हनुमान बनने को तैयार हैं?

हनुमान को दलित बताने वाले योगी आदित्यनाथ के बयान पर कई जगहों से तीखी प्रतिक्रिया भी आई है. दलित संगठन इसकी व्याख्या यह कर रहे हैं कि बीजेपी दलितों को सवर्ण जातियों का सेवक बनाए रखना चाहती है और इस मकसद से वो धार्मिक प्रतीकों का सहारा ले रही है. कुछ संगठनों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ ने दलितों की तुलना बंदर से की है और इसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए. मामला और उलझा जब आगरा जैसे कुछ इलाकों से यह खबर आई कि दलितों ने हनुमान मंदिरों से ब्राह्मण पुजारियों को हटाकर उनकी जगह दलित पुजारी नियुक्त करने की मुहिम शुरू की है.

UP CM at Lok Bhawan in Lucknow

एकीकृत हिंदू पहचान के खिलाफ बीजेपी विरोधी ताकतें अपने-अपने ढंग से सक्रिय हैं. दिल्ली में किसानों के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन के दौरान सैकड़ों ऐसी तख्तियां नजर आईं जिनपर लिखा था 'अयोध्या नहीं कर्ज माफी चाहिए', यानी यह बात बहुत साफ है कि धर्म के नाम पर राजनीतिक ताकत जुटाने और अलग-अलग समूहों के बीच एकता कायम करके बीजेपी को हराने को लेकर रस्साकशी तेज है.

आनेवाले दिनों में यह खींचतान और बढ़ेगी. हिंदुत्व और विकास की गाड़ियों पर बारी-बारी से सवारी कर रही बीजेपी अब जिस तरफ कदम बढ़ा चुकी है, वहां से पीछे लौटना संभव नहीं है. यानी 2019 का चुनाव उसे राम के नाम पर ही लड़ना होगा. हनुमान दलित थे या नहीं, इसका जवाब कोई नही दे सकता है, लेकिन इतना तय है कि 2019 में योगी आदित्यनाथ बीजेपी के हनुमान जरूर होंगे.

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