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'ऊंची जाति के हिंदुओं में पुलिस का सबसे कम डर, सिखों और पिछड़ी जातियों में सबसे अधिक'

भारत में 55 फीसदी से अधिक विचाराधीन कैदी मुस्लिम, दलित या जनजाति समूह से ताल्लुक रखते हैं

FP Staff Updated On: Jun 18, 2018 03:59 PM IST

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'ऊंची जाति के हिंदुओं में पुलिस का सबसे कम डर, सिखों और पिछड़ी जातियों में सबसे अधिक'

एक गैर सरकारी संगठन के अध्ययन अनुसार भारत के हिंदुओं में जो तथाककथित ऊंची जाति के हिंदू हैं, उन में पुलिस का डर सबसे कम है. ‘स्टेटस ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया, 2018’ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि एक सर्वेक्षण के दौरान हिंदुओं में से 18 फीसदी अनुसूचित जाति के उत्तरदाताओं ने पुलिस को ‘बेहद डरावना’ बताया है.

केवल दलितों और आदिवासियों तक सीमित नहीं भेदभाव का सिलसिला

भारत में 55 फीसदी से अधिक विचाराधीन कैदी मुस्लिम, दलित या जनजाति समूह से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में कहा जा सकता है कि लोगों के बीच डर का सबसे बड़ा कारण यही है. मानवाधिकार संस्था 'सेंटर फॉर जस्टिस एंड पीस' द्वारा 2017 में जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल झारखंड में, आधिकारिक तौर पर अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के रूप में सूचीबद्ध लगभग 500 आदिवासी (आदिवासी) जेल में हैं क्योंकि केस का ट्रायल धीमा है.

बात केवल दलितों और आदिवासियों के साथ भेदभाव की नहीं है. बल्कि मुसलमानों को भी पुलिस द्वारा किए जाने वाले ऐसे कृत्यों का खामियाजा सालों साल जेल में सड़ कर भुगतना पड़ता है.

दक्षिण भारत के मुसलमानों के बीच पुलिस का डर ज्यादा

एक सामान्य धारणा है कि किसी अन्य क्षेत्र की तुलना में हिंदी क्षेत्रों में मुसलमान पुलिस से ज्यादा डरते हैं. लेकिन रिपोर्ट में पाया गया कि दक्षिणी भारत के मुसलमानों में विशेष रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में रहने वालों में उत्तर भारत के मुसलमानों की तुलना में पुलिस का भय अधिक है.

ऐतिहासिक रूप से दक्षिण भारत में पुलिस व्यवस्था बेहतर रही है, लेकिन हाल  में हुए आतंकवाद की घटनाओं के बाद से पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया, जिस से यहां रहने वाले मुस्लिमों के दिमाग में एक तरह का डर पैदा हो गया है.

क्या मुसलमान गैर अपराधिक और अहिंसक नहीं हो सकते?

कुछ लोग यहां ये तर्क देते हैं कि आतंकवाद और हिंसा से जुड़ी घटनाओं में शामिल होने वाले लोगों की लिस्ट निकालें तो उसमें मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक होती है, लेकिन क्या इस तर्क का उद्देश्य ये है कि कोई धर्म से मुसलमान हो तो वह मासूम नहीं हो सकता. वह गैर-अपराधिक, अहिंसक नहीं हो सकता?

ऐसी धारना और घटनाओं का सबसे मूल कारण मुसलमानों और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का सरकारी सेवाओं में कम प्रतिनिधित्व है. नवंबर 2006 में आई सच्चर समिति की रिपोर्ट ने विभिन्न सरकारी सेवाओं में मुस्लिमों के खराब प्रतिनिधित्व की ओर इशारा किया था. रिपोर्ट में समुदाय में विश्वास बनाने के तरीके के रूप में पुलिस बल में अधिक मुस्लिम प्रतिनिधित्व की सिफारिश की गई थी.

वहीं पुलिस बल में जातियों का असमान प्रतिनिधित्व भी एक बहुत महत्वपूर्ण समस्या है.उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में, 75 जिला अधीक्षक पुलिस में से 13 ठाकुर, 20 ब्राह्मण, एक कायस्थ, एक भुमिहार, एक वैश्य और छह अन्य ऊंची जातियों से हैं, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स में जुलाई 2017 की रिपोर्ट में बताया गया है. प्रतिनिधित्व का अर्थ ये नहीं होता कि 20 ऊंची जाति के हिंदुओं की गुट में एक अनुसूचित जाति का शख्स खड़ा हो. समान प्रतिनिधित्वता का अर्थ 10 ऊंची तो 10 अनुसूचित जाति के लोगों का एक साथ समान पद को होल्ड करना है.

जाति और धर्म के इतर गरीबी और अमीरी भी है एक बहुत बड़ा फैक्टर

राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल (सीआरआरआई) की समन्वयक (पुलिस सुधार) देविका प्रसाद कहते हैं, इसके पीछे की सबसे बड़ी समस्या है आरक्षण के सिद्धांतों को नजरअंदाज करना.अनुसूचित जातियों, अन्य पिछड़ी जातियों, जनजातियों और महिलाओं जैसे समूहों का प्रतिनिधित्व मौजूद है लेकिन यह कम है.ऐसे में यह देखना जरूरी है कि आरक्षण को किस तरह से पूरा किया जा रहा है? क्या उद्देश्य सिर्फ आवश्यक संख्या को पूरा करना है? जरूरत इस बात की है कि पुलिस की संस्कृति में सुधार हो. हमें विविधता के महत्व को समझने की जरूरत है.इस विविधता से पुलिस विभाग के भीतर लोकतांत्रिक माहौल बनेगा और जनता पुलिस पर भरोसा कर पाएगी.

वहीं रिपोर्ट में एक और बात जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली पाई गई, वो ये कि धार्मिक समुदायों में सिखों को पुलिस से सबसे ज्यादा डर लगता है. राज्यवार विवरण में पंजाब में पुलिस के डर का उच्च स्तर (46 फीसदी) दिखाया गया है. इस संबंध में पंजाब के बाद तमिलनाडु और कर्नाटक का स्थान रहा है. यहां पर गरीब और अमीर का फैक्टर भी प्रासंगिक है. गरिब सिख, अमीरों के मुताबिक ज्यादा डरे हुए हैं. ठीक वैसे ही जैसे गरीब मुसलमान और गरीब अनुसूचित जाति और जन जाति के लोग.

 सिखों में सबसे अधिक है पुलिस के प्रति डर

यदि हम सभी धर्मों के बीच ऊपरी वर्गों पर विचार करते हैं, तो हिंदुओं (14 फीसदी) या मुसलमानों (9 फीसदी) की तुलना में, सिखों में (37 फीसदी) पुलिस से डरने की संभावना है. इस प्रवृत्ति को पिछले चार दशकों में पंजाब में होने वाली हिंसा के इतिहास से जोड़ कर देखा जा सकता है. इन हिंसा की घटनाओं में पुलिस की आक्रमकता और रवैए, खासकर 1990 और 2000 के दशक में जब राज्य में आतंकवाद बढ़ गया था को ध्यान में रखना जरूरी है. राज्य में अशांति की इस अवधि के दौरान, बिना किसी आधार के गिरफ्तारी, एनकॉउंटर और लोगों के गायब होने के साथ, बहुत सी गुप्त पुलिसिंग की घटना हुई. यही कारण है कि लोगों के दिमाग में डर घर कर गया.

कैसे सभी समुदायों का पुलिस में भरोसा बने?

यह सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जा सकता है कि सभी समुदायों का पुलिस में भरोसा बने? देविका प्रसाद कहते हैं, 'कोटा के माध्यम से प्रतिनिधित्व के न्यूनतम मानकों को पूरा करने के लिए पुलिस और सरकार द्वारा बड़े प्रयास की जरूरत है.' उन्होंने आगे कहा कि सरकार को राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो की वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर पुलिस के बारे में धारणाओं पर समय-समय पर सार्वजनिक सर्वेक्षण की आवश्यकता है

साभार: इंडिया स्पेंड

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