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'सैंडल मार' सांसद और सीएम योगी सत्यवादी हैं!

तमाम भारतीय लोगों के लिए अहिंसा एक ऐसा बोरिंग शब्द है, जिसका नाम सुनते ही उन्हें नींद आने लगती है

Rakesh Kayasth Updated On: Mar 27, 2017 09:18 PM IST

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'सैंडल मार' सांसद और सीएम योगी सत्यवादी हैं!

सैंडल कांड को कई दिन बीत चुके हैं लेकिन शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ सत्य के मार्ग पर अटल हैं. मीडिया में फजीहत हुई. शुरुआती समर्थन के बाद उनकी अपनी पार्टी शिवसेना तक के कई नेताओं ने इससे किनारा कर लिया. लेकिन मजाल है कि गायकवाड़ साहब सच का दामन छोड़ दें. सत्य के प्रति उनका आग्रह देखिये.

कोई उनके खिलाफ गवाही देने नहीं आया लेकिन उन्होने खुद मीडिया को बताया कि मैं एक्जीक्यूटिव क्लास की सीट मांग रहा था. लेकिन एयरलाइन वालों ने एक्जीक्यूटिव क्लास साल भर पहले ही बंद कर दिया था. फ्लाइट में कोई मेरी बात भी नहीं सुन रहा था इसलिए मैने अपना सैंडल उतारा और कर्मचारी को 17 बार मारा.

 

ravindra gaikwad

शिवसेना सांसद रवींद्र गायकवाड़ ने विमान अधिकारी से मारपीट मामले में माफी मांगने से इनकार किया है

सैंडल ही सत्य है

मनगढ़ंत कहानियां बनाना इस देश के नेताओं का अधिकार है. गायकवाड़ साहब भी बना सकते थे लेकिन वे इतने सत्यवादी हैं कि उन्होंने कुछ छिपाया नहीं बल्कि अलग-अलग इंटरव्यू में तथ्यों में सुधार भी किया. बुजुर्ग कर्मचारी पर सैंडल बरसाते वक्त वो ठीक से गिनना शायद भूल गये थे. पहली बार 17 बार कहा था. दूसरे इंटरव्यू में उन्होंने कहा- मैंने 25 बार मारा था. एक और इंटरव्यू में उन्होंने बताया- मैं तो उसे हवाई जहाज से बाहर फेंकने वाला भी था.

गांधी जी ने कहा था- सच बोलने के लिए बहुत नैतिक बल चाहिए. गायकवाड़ साहब में यह बल है. गांधी जी की मशहूर किताब है- सत्य के साथ मेरे प्रयोग. गायकवाड़ साहब चाहें तो लिख सकते हैं- सैंडल के साथ मेरे प्रयोग. उनके लिए सैंडल की सत्य है. वे साफ कर चुके हैं कि दोबारा अगर किसी ने गुस्ताखी की तो सैंडल उसके सिर पर भी बरसेगा.

सैंडल कांड के बाद अब कोई एयरलाइंस गायकवाड़ साहब को टिकट देने को तैयार नहीं है. नतीजा ये हुआ कि दिल्ली से महाराष्ट्र तक की यात्रा उन्हें ट्रेन में ही करनी पड़ी. वहां भी मीडिया वालों ने उन्हें घेर लिया. वो तो शुक्र था पुलिस वालों का कि उन्होंने मीडिया वालों को भगा दिया, वर्ना `सैंडल के साथ मेरे प्रयोग' किताब में एक और अध्याय जुड़ जाता.

अहिंसा किस चिड़िया का नाम है

गांधी जी ने सत्य के साथ अहिंसा की भी बात कही थी लेकिन भारतीय लोगों ने सत्य-अहिंसा को संविधान में वर्णित अधिकार-कर्तव्य की तरह मान लिया. कुछ लोगों के लिए अधिकार और बाकी लोगों के लिए कर्तव्य. अहिंसा प्रेमी नेताओं का दूर-दूर तक सत्य से वास्ता नहीं रहा. वे अहिंसक तरीके से घोटाले करते रहे और सत्यवादी डंके की चोट पर उसी तरह सच बोलते रहे जिस तरह गायकवाड़ साहब बोल रहे हैं.

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देश के सभी एयरलाइंस ने सैंडल मारने वाले सांसद रवींद्र गायकवाड़ का बॉयकॉट कर दिया है (फोटो: रॉयटर्स)

सत्य ये है कि अहिंसा हम तमाम भारतीयों के लिए एक ऐसा बोरिंग शब्द है, जिसका नाम सुनते ही नींद आने लगती है. भारतीय समाज अपने स्वभाव से ही हिंसक है. वो हिंसा में ग्लैमर ढूंढता है और अहिंसा पर चुटकुले बनाता है. क्या आपने कभी ये सुना है कि किसी चुनाव में अहिंसा मुद्दा बना हो. किसी नेता ने ये वादा किया हो कि मैं हिंसा रहित समाज बनाउंगा और इस वादे के आधार पर वो चुनाव जीत गया हो?

लेकिन सच बोलने वालों की अब भी बड़ी इज्जत है. लोग कहते हैं- मानना पड़ेगा गुरू, जो करता है, डंके की चोट पर करता है. बाला साहेब ठाकरे डंके की चोट पर मुसलमानों को भारत से निकालने की बात करते थे, खूब तालियां बजती थी और वोट भी मिलते थे.

योगी जी भी सत्यवादी हैं

योगी जी भी परम सत्यवादी हैं. यकीन ना हो तो मुख्यमंत्री बनने से पहले के उनके तमाम भाषण उठाकर देख लीजिये. एक के बदले दस हत्या करवाने से लेकर ढांचा गिराने को सही ठहराने तक सैकड़ों बयान हैं उनके. जो मन में था, उन्होंने खुलकर कहा, छिपाया कुछ नहीं. ये बात प्रशंसकों को पसंद आई. नतीजे में योगी जी लगातार पांच बार सांसद बने और अब मोदी जी के सपनों का यूपी बनाने के लिए सीएम की कुर्सी पर बैठे हैं.

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प्रचंड बहुमत जीतकर आई बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाया है (फोटो: पीटीआई)

जहां सत्ता वहां सत्य नहीं

सीएम बनते ही योगी जी ने पहला बयान दिया- धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. समझ में आ गया कि सत्ता और सत्य एक साथ नहीं चल सकते. कुर्सी पर बैठते ही बात को घुमाना ही पड़ता है. उसके बाद बूचड़खाने बंद कराने का अभियान शुरू हो गया. इस अभियान का शिकार वे छोटे मांस विक्रेता बने जिनके घर चूल्हा ही रोजाना की आमदनी से चलता है.

डर कुछ ऐसा फैला कि कुछ जगहों पर मुर्गी बेचने वालों तक ने धंधा बंद कर दिया. ज्यादातर बड़े बूचड़खानों के मालिक हिंदू या जैन हैं. उनपर कोई आंच नहीं आई क्योंकि उनके पास लाइसेंस हैं. यूपी या किसी भी राज्य में होनेवाले ज्यादातर खुदरा कारोबार बिना लाइसेंस के होते हैं यानी गैर-कानूनी हैं. क्या लाइसेंस का हवाला देकर बूचड़खानों के अलावा कहीं कोई और छोटे कारोबार बंद कराये जा रहे हैं? समझना मुश्किल नहीं है कि ये अभियान क्यों और किसके खिलाफ है.

खुलकर खेलिये योगी जी

बूचड़खाने के खिलाफ अभियान को लेकर सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं पर नजर डालिये. योगी समर्थकों में खुशी की लहर है. आपको बहुत से ऐसे पोस्ट और ट्वीट मिल जाएंगे जिनमें दावा किया जा रहा है कि योगी ने एक हफ्ते में ही `औकात' बता दी.  ऐसे लोग ढूंढने मुश्किल हैं, जिन्हे इस बात की चिंता हो कि जो लोग बेरोजगार हो रहे हैं, उनके घर चूल्हा कैसे जलेगा.

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इलाहाबाद में प्रशासन द्वारा बंद कराए गए बूचड़खाने के बाहर खड़े वहां काम करने वाले कर्मचारी (फोटो: पीटीआई)

हमारे समय का सत्य यही है. फिर योगी जी के लिए ऐसी कौन सी मजबूरी है कि वो भेदभाव ना करने की दुहाई दे रहे हैं? योगी जी जो कर रहे हैं, उन्हें वही करने के लिए वोट मिले हैं. इसलिए शर्माना छोड़कर डंके की चोट पर कीजिये और खुलकर अपने वोटरों को बताइये. वोट और पक्के होंगे, इस बात की गारंटी है.

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