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जनाक्रोश रैली: क्या अपने ही भाई शिवपाल के खिलाफ मुलायम ने चला है 'चरखा दांव'

एक बार फिर साफ हो गया कि शिवपाल को मुलायम का आशीर्वाद ही मिलेगा लेकिन साथ नहीं तभी जनाक्रोश रैली में सपा की टोपी पहने 'नेताजी' बार-बार समाजवादी पार्टी की ही सरकार बनाते दिखे

Updated On: Dec 10, 2018 05:22 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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जनाक्रोश रैली: क्या अपने ही भाई शिवपाल के खिलाफ मुलायम ने चला है 'चरखा दांव'

यूपी की सियासत के दंगल में शिवपाल यादव ने अपनी नई पार्टी की रैली के साथ ही नेताजी का पसंदीदा 'चरखा' दांव चल दिया. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के प्रति अपने आक्रोश को सियासी रंग देते हुए शिवपाल ने जनाक्रोश रैली के जरिए हुंकार भरी. शिवपाल की रैली की यूएसपी रही समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव और परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव की मौजूदगी. लेकिन इस मौजूदगी के बावजूद एक बार फिर साफ हो गया कि शिवपाल को मुलायम का आशीर्वाद ही मिलेगा लेकिन साथ नहीं क्योंकि जनाक्रोश रैली में एसपी की टोपी पहने  'नेताजी' बार-बार समाजवादी पार्टी की ही सरकार बनाते दिखे. सवाल उठता है कि आखिर मुलायम सिंह कहना क्या चाहते थे ? या फिर वही बोला, जो वो चाहते थे?

शिवपाल बार-बार मुलायम सिंह यादव से अपनी पार्टी का अध्यक्ष बनने का आग्रह करते रहे हैं लेकिन इसका कभी कोई जवाब उन्हें नहीं मिला है. बल्कि शिवपाल की नई पार्टी की पहली आधिकारिक रैली में मंच पर ही मुलायम सिंह बार-बार समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने की बात करते दिखे. यहां तक कि जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें हूट करना शुरू किया तो नाराज भी हो गए. गुस्से में नेताजी ये तक बोल गए कि अगर नहीं सुनना है तो भागो यहां से.

ऐसे में शिवपाल के लिए तो अब ये साफ हो गया कि उन्हें भविष्य में अपनी पार्टी के सियासी वजूद की लड़ाई अकेले ही लड़नी होगी क्योंकि उन्हें नेताजी का आशीर्वाद तो मिलेगा लेकिन साथ नहीं. सवाल उठता है कि ऐसे मौके पर शिवपाल के मंच पर नेताजी या तो कुछ भूल गए या फिर जानबूझकर कुछ और ही बोल गए?

mulayam (2)

शिवपाल की रैली में मुलायम का 'चरखा दांव'

कार्यकर्ताओं की जिस रैली को मुलायम सिंह संबोधित कर रहे थे, दरअसल ये वही लोग थे जो कभी समाजवादी पार्टी का हिस्सा होते थे. लेकिन पार्टी से अलग होने के बाद शिवपाल यादव ने समाजवादी पार्टी के बागियों को एकजुट कर नई पार्टी का स्वरूप गढ़ा. उन्होंने समाजवादी पार्टी में नाराज चल रहे और अनदेखी के शिकार हुए नेताओं को प्रगतिशील समाजवादी पार्टी – लोहिया में शामिल कर अपनी पार्टी को आकार दिया.

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9 दिसंबर के दिन उसी पार्टी को समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव संबोधित कर रहे थे. लेकिन अवचेतन में रची-बसी समाजवादी पार्टी शिवपाल के मंच पर भी मुलायम की जुबान पर ही चढ़ी दिखी. जाहिर तौर पर उससे जनाक्रोश रैली में कार्यकर्ताओं में आक्रोश होना ही था. मुलायम की जुबान से समाजवादी पार्टी का नाम सुनकर कार्यकर्ता भड़के तो मुलायम भी उन पर बरसे. आखिरकार शिवपाल को मुलायम से कहना ही पड़ गया कि एक बार तो वो कम से कम प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का नाम ले दें.

लेकिन मुलायम सिंह की रणनीति को समझना बेहद मुश्किल है. उन्होंने जानबूझकर शिवपाल के मंच का इस्तेमाल समाजवादी पार्टी के लिए किया या फिर ये वाकई स्मृति-दोष था, ये समझना मुश्किल है क्योंकि मुलायम सिंह के लिए कहा जाता है कि उनके बाएं हाथ को भी ये खबर नहीं होती कि दाहिना हाथ क्या करने वाला है.

मुलायम सिंह को शिवपाल अपनी पार्टी की पहली बड़ी रैली में मंच पर लाने में सफल हुए. ये शिवपाल के लिए कामयाबी भी है. क्योंकि इससे पहले मुलायम सिंह यादव उन्हें कई दफे निराश करने का काम कर चुके हैं. सैफई में शिवपाल सिंह यादव ने बड़े अरमानों के साथ नेताजी के जन्मदिन पर केक काटने का कार्यक्रम रखा. लेकिन जब मुलायम सिंह यादव नहीं पहुंचे तो उन्हें अपने बेटे आदित्य यादव के साथ खुद ही केक काटना पड़ गया.

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शिवपाल के लिए दिल से क्यों नहीं 'मुलायम'

शिवपाल कई दफे ये कह चुके हैं कि उनकी नई पार्टी को मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद प्राप्त है. वो बार-बार मुलायम सिंह से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी-लोहिया का अध्यक्ष बनने के लिए मनुहार कर रहे हैं. लेकिन मुलायम सिंह न तो इनकार करते हैं और न ही स्वीकार.

मुलायम सिंह के अखिलेश के प्रति जगजाहिर प्रेम को देखते हुए ही अब शिवपाल कहने लगे हैं कि लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह के खिलाफ प्रत्याशी उतारने का फैसला पार्टी करेगी. जबकि इससे पहले शिवपाल सिंह यादव कहते थे कि वो चाहते हैं कि मैनपुरी से मुलायम उनकी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ें.

जाहिर तौर पर अब नेताजी को लेकर शिवपाल के रुख में बदलाव दिखाई देने लगा है. शिवपाल ने जब समाजवादी सेक्युलर मोर्चा का गठन किया था तब उनकी पार्टी के झंडे में एकतरफ मुलायम सिंह की तस्वीर थी. ये तस्वीर समाजवादी पार्टी को झटका देने के लिए काफी थी. सियासी कुनबे में पड़ी फूट का फायदा उठाते हुए शिवपाल बार-बार नेताजी के ही नाम और आशीर्वाद को अपनी नई पार्टी के प्रचार का ब्रांड बनाते रहे. कभी ये मंच पर तो कभी झंडे पर तो कभी शिवपाल की जुबान पर नुमाया हुआ.

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मुलायम के नाम के जरिए शिवपाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी की भरपूर ब्रांडिंग की. वो मुलायम के नाम के बहाने लोगों को अपनी पार्टी में लाने में कामयाब हुए. नेताजी के सम्मान और खुद के साथ हुए अपमान के नाम पर शिवपाल तमाम अखिलेश विरोधियों को अपनी पार्टी में खींचने में कामयाब हुए हैं. उन्होंने अपनी पार्टी को बड़ा रूप देने और समाजवादी पार्टी के बरक्स रखने के लिए ही मुलायम के नाम और चेहरे का होशियारी से इस्तेमाल किया. अब चूंकि पार्टी सज-धज कर तैयार है और ऐसे में उन्हें अब सिर्फ मार्गदर्शन की ही दरकार है.

आपसी फूट की चोट से निपट पाएगी समाजवादी पार्टी?

शिवपाल अब यूपी की सत्ता के अग्निपथ पर अकेले निकल चुके हैं. वो मुलायम को इसी तरह अपनी रैलियों में बुला कर सम्मान देते रहेंगे ताकि वो मुलायम के प्रति अपनी निष्ठा भी साबित कर सकें. जबकि दो दिन पहले ही फर्रुखाबाद में अखिलेश यादव की रैली में शामिल हो कर मुलायम सिंह ये साफ इशारा कर चुके हैं कि उनका पुत्र-प्रेम न तो डिगा है और न भटका. यानी सार्वजनिक मंचों से कभी कभार अखिलेश यादव को फटकार लगाने वाले मुलायम सिंह आज भी समाजवादी पार्टी और उसके युवा मुखिया की तारीफ में कसर नहीं छोड़ते हैं.

बहरहाल, परिवारवाद की राजनीति की नियति ही कुछ ऐसी होती है कि जब सत्ता का संघर्ष होता है तो पार्टी के साथ परिवार भी टूटता है. फिर एक ही पार्टी के बागी और असंतुष्टों से दूसरी पार्टी खड़ी होती है जिसको जनता कभी संदेह तो कहीं सहानुभूति के साथ भी देखती है. शिवपाल के साथ जनता की सहानुभूति वोटों में कितना तब्दील होगी ये चुनाव बाद ही पता चलेगा. लेकिन फिलहाल उनसे जुड़े नेता ये जरूर जानते हैं कि जो समाजवादी पार्टी आज यूपी में खड़ी है, उसे मजबूती से खड़ा करने के पीछे शिवपाल का बड़ा हाथ है. जबकि अखिलेश को विरासत में पिता से ये पार्टी मिली.

जनाक्रोश रैली में भले ही निशाना केंद्र सरकार पर था लेकिन चोट समाजवादी पार्टी पर ही भीतर तक करने की कोशिश की गई और शिवपाल उसमें कामयाब भी हुए. अगर ऐसा न होता तो मंच पर मुलायम सिंह यादव को समाजवादी पार्टी का जिक्र करने की जरूरत नहीं होती. शायद नेताजी भी छोटे भाई की पार्टी की दस्तक को रमाबाई मैदान में भीतर ही भीतर महसूस कर गए. वहीं अब भविष्य में मुलायम सिंह यादव को किसी रैली में बुलाने को लेकर भी शिवपाल यादव शायद एक बार जरूर सोचें क्योंकि उनके मंच पर मुलायम सिंह दोबारा चरखा दांव न चल दें कहीं.

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