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शिवपाल की बेचैनी है एसपी के नए संग्राम का कारण

मुलायम के मन में चिंगारी हो, न हो, शिवपाल के मन में तो लावा उबल रहा है, उन्हें अपनी खोई राजनीतिक जमीन पाने के लिए कुछ न कुछ करते रहना है

Naveen Joshi Updated On: Sep 22, 2017 04:42 PM IST

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शिवपाल की बेचैनी है एसपी के नए संग्राम का कारण

समाजवादी पार्टी के आपसी संग्राम का नया मोर्चा खुल गया है तो यही मानना चाहिए कि शिवपाल अपने सगे बड़े भाई मुलायम की तरह राजनीति के नेपथ्य में जाने करने को तैयार नहीं हैं. इसीलिए उन्होंने मुलायम को आगे करके शांत लग रही राख की चिंगारियों को हवा दे दी है.

मुलायम के मन में चिंगारी हो, न हो, शिवपाल के मन में तो लावा उबल रहा है. उन्हें अपनी खोयी राजनीतिक जमीन पाने के लिए कुछ न कुछ करते रहना है. इसलिए अब लोहिया ट्रस्ट के सचिव पद से रामगोपाल यादव को हटा दिया गया है. उस जगह पर मुलायम ने शिवपाल यादव को नियुक्त कर दिया है. रामगोपाल मुलायम के चचेरे भाई हैं और अखिलेश के साथ डट कर खड़े हैं.

क्यों बेचैन हैं शिवपाल?

शिवपाल की ताजा बेचैनी यह है कि 23 सितंबर को समाजवादी पार्टी का प्रदेश सम्मेलन हो रहा है. उसमें एसपी का नया प्रदेश अध्यक्ष चुना जाना है. पांच अक्टूबर को आगरा में राष्ट्रीय सम्मेलन भी होने वाला है. शिवपाल को औपचारिक निमंत्रण तक नहीं मिला है, जबकि वे मांग कर रहे हैं कि मुलायम को फिर से एसपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाए.

उन्हें लगता होगा कि अखिलेश पर दवाब डालने का यह बढ़िया मौका है और दवाब डालने के लिए उनके पास एक ही तुरुप है- मुलायम सिंह. चूंकि मुलायम सीधे अखिलेश पर निशाना साधेंगे नहीं, इसलिए वार हुआ रामगोपाल पर. मुलायम भी रामगोपाल ही को सारे झगड़े की जड़ मानते हैं.

रामगोपाल की पहल पर ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर मुलायम सिंह की जगह अखिलेश को चुना गया. रामगोपाल ने ही निर्वाचन आयोग में पैरवी करके एसपी का चुनाव निशान साइकिल अखिलेश खेमे को दिलावा दिया था. मुलायम आयोग के समक्ष कुछ भी साबित नहीं कर सके थे.

इसलिए रामगोपाल को लोहिया ट्रस्ट से निकाल दिया गया है. वैसे, लोहिया ट्रस्ट कोई राजनीतिक संगठन है नहीं. वह लोहिया जी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए बना ट्रस्ट है. मुलायम जरूर इसे पार्टी का महत्वपूर्ण संगठन मानते हैं. अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनने के बाद छोटे लोहिया कहलाने वाले जनेश्वर मिश्र के नाम पर भी ऐसा ही संगठन बनाया है.

mulayam singh yadav and shivpal singh yadav

क्या करेंगे शिवपाल?

तो, अखिलेश पर दवाब बढ़ाने के लिए शिवपाल ने एक और दांव चला है. उन्होंने बताया कि नेता जी 25 सितंबर को (एसपी के प्रदेश सम्मेलन के दो दिन बाद) संवादाता सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण घोषणा करेंगे. अब सभी यह कयास लगाने में लगे हैं कि मुलायम कौन सी महत्वपूर्ण घोषणा कर सकते हैं.

क्या वे नई पार्टी बनाने का ऐलान करेंगे? इसके आसार नहीं हैं, क्योंकि उनके अत्यंत करीबी और कट्टर समर्थक भी मान चुके हैं कि मुलायम अब नई पार्टी खड़ी करने की स्थिति में नहीं है. भविष्य तो अखिलेश हैं. इसीलिए लगभग सभी अखिलेश के साथ चले गए. एक बार शिवपाल ने नई पार्टी बनाने का ऐलान भी किया था, लेकिन तब मुलायम ने जानकारी न होने की बात कह कर उन्हें एक तरह से बरज दिया था.

मुलायम एसपी के संरक्षक होने के नाते अखिलेश को यह आदेश भी नहीं देंगे कि शिवपाल को पार्टी में सम्मानजनक स्थान दीजिए. मुलायम जानते हैं कि अखिलेश और रामगोपाल उनकी यह बात नहीं मानेंगे. ऐसी असफल कोशिश वे पहले कर चुके हैं. खुद शिवपाल दोयम दर्जे के नेता के रूप में अब नहीं लौटना चाहेंगे.

तो, क्या वे शिवपाल को आशीर्वाद देंगे कि वह एक समाजवादी मोर्चा बना लें? शिवपाल की तो ऐसी ही इच्छा है, जो वे एकाधिक बार व्यक्त भी कर चुके हैं. अब तक मुलायम उन्हें इसके लिए हतोत्साहित करते रहे हैं. अलग मोर्चा बनाकर शिवपाल एसपी का अपना खेमा बढ़ाने और अन्य दलों से हाथ मिलाने की कोशिश कर सकते हैं. राजनीतिक दांव-पेच के लिए कम से कम एक अखाड़ा उन्हें मिल जाएगा.

Shivpal Yadav

कोई नहीं सुन रहा शिवपाल की

यह भी हो सकता है कि 25 सितंबर को नेता जी कोई खास ऐलान करें ही नहीं. यह सिर्फ शिवपाल की कोरी घोषणा साबित हो. इधर काफी समय से मुलायम अक्सर अपनी बातों से पलटते रहे हैं. और, 25 सितंबर को किसी ऐलान की बात खुद मुलायम ने कही भी नहीं है.

दरअसल, सेहत और उम्र का तकाजा देख कर मुलायम ने शायद अब अपना वानप्रस्थ मान लिया है. अखिलेश ने उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं की है. उन्हें पार्टी का संरक्षक बनाया है.

लेकिन शिवपाल अभी कैसे वानप्रस्थ में चले जाएं? राजनीति के हिसाब से वे अभी युवा ही हैं और महत्वाकांक्षा भी कोई कम नहीं. उन्हें लड़ना है और राजनीति में अपनी जगह बनानी है. मुलायम के साथ कंधे से कंधा मिला कर जो पार्टी खड़ी की थी, जिस संगठन पर उनकी पकड़ होती थी, उसे भतीजा ले गया. अब अकेले मुलायम ही उनके सहारा हैं. तुरुप का बड़ा पत्ता, जिसे वे जब-तब दिखाते रहते हैं.

इसीलिए वे बार-बार मांग करते हैं कि मुलायम सिंह को एसपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद लौटाया जाए. विधान सभा चुनाव में एसपी की बड़ी पराजय के बाद तो उन्होंने यह मांग जोर-शोर से उठाई थी. उनका तर्क था कि मुलायम के रहते पार्टी की यह हालत नहीं होती.

लेकिन उनकी सुन कौन रहा है, मुलायम के सिवा!

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