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शिवपाल का धर्मनिरपेक्ष मोर्चा, कितना असल....कितना भ्रम?

शिवपाल के समाजवादी पार्टी से अलग होने का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि मुलायम सिंह खुलकर उनके साथ नहीं आते.

Ambikanand Sahay Updated On: May 09, 2017 12:12 PM IST

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शिवपाल का धर्मनिरपेक्ष मोर्चा, कितना असल....कितना भ्रम?

आज के दौर के सबसे अच्छे प्रबंधन गुरुओं में शुमार टॉम पीटर्स कहते हैं,  'अगर आप भ्रमित नहीं हैं तो इसका मतलब आप ध्यान नहीं दे रहे हैं.'

सच! उत्तरप्रदेश में समाजवादियों की पार्टी के भीतर चल रही राजनीति को समझने की कोशिश करते वक्त टॉम पीटर्स की यह टिप्पणी सटीक से भी ज्यादा प्रतीत होती है. आप भ्रमित होने के लिए बाध्य हैं, यहां तक कि भौंचक्के भी हो सकते हैं.

आश्चर्य की बात नहीं है कि शुक्रवार को एक नए धर्मनिरपेक्ष मोर्चे के गठन की चाचा शिवपाल की घोषणा के तुरंत बाद, फ़र्स्टपोस्ट ने प्रश्न चिन्ह के साथ खबर छापी और उसने ठीक भी किया: 'समाजवादी पार्टी विभाजित हुई? शिवपाल यादव ने समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाया, मुलायम करेंगे अगुवाई.'

उत्तर प्रदेश की राजनीति के पर्यवेक्षकों को पता है कि शिवपाल के समाजवादी पार्टी से अलग होने का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि मुलायम सिंह दो चीजें नहीं करते: पहला वो खुलेआम अपने भाई के पाले में अपना वजन डाल दें.  दूसरा, वह अपने बेटे को पूरी तरह अंतिम तौर पर सार्वजनिक तरीके से त्याग दें.

और इनमें से अब तक कुछ भी नहीं हुआ है.

बहरहाल, खुद को भतीजे से और दूर करने को कटिबद्ध दिख रहे शिवपाल आजकल एंग्री ओल्ड मैन की भूमिका में हैं. उन्होंने अपने इरादे की झलक अंतिम फैसला लेने के 24 घंटे पहले ही दिखा दिया था.

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akhilesh shivpal

अखिलेश को लेकर शिवपाल के तेवर में जरा भी नरमी नहीं आयी है

आक्रामक तेवर

गुरूवार को इटावा में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने चेतावनी देने में कोई संकोच नहीं किया: 'अखिलेश ने नेताजी को पार्टी की कमान सौंपने का वादा किया था. (उत्तर प्रदेश में नेताजी का सिर्फ एक ही मतलब है - मुलायम सिंह यादव). वे अपने वादे को पूरा करें और हम समाजवादी पार्टी को मजबूत करेंगे.'

शिवपाल ने आगे कहा, 'मैंने भी उन्हें अपने वादे पूरा करने के लिए तीन महीने का वक्त दिया. जो लोग मुझे पार्टी का संविधान सिखा रहे हैं उन्हें भगवतगीता पढ़ना चाहिए. हर कोई जानता है कि नेताजी और सिर्फ नेताजी ही ने इस पार्टी को अपने खून और पसीने से खड़ा किया है. मैं हमेशा के लिए एक बात साफ करना चाहता हूं कि मैं सिर्फ नेताजी की बात सुनूंगा. किसी और की नहीं.'

गुस्से में उनके आपा खोने की बात को छोड़िए महत्वपूर्ण यह है कि शिवपाल यादव ने आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है और न ही वे निकट भविष्य में ऐसा करने का इरादा रखते हैं. जहां तक मुलायम सिंह की बात है तो उन्होंने इस संदर्भ में अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा है.

मुलायम सिंह ने ना तो शिवपाल के कदम का समर्थन किया है और न ही विरोध. वे चुप हैं. सभी चाहते हैं कि वे अपनी स्थिति साफ करें. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे.

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कोई भी मुलायम के मन को यकीन के साथ नहीं जानता है. अखिलेश भी उतने ही अंधेरे में हैं जितना कि शिवपाल या फिर रामगोपाल यादव. पूरी की पूरी समाजवादी पार्टी बेसब्री से कगार पर खड़ी है.

कांग्रेस भी समान रूप से भ्रमित है. समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस के नेता पूरी सावधानी बरत रहे हैं. यह उदाहरण देखिए: फर्स्टपोस्ट ने 3 मई को रिपोर्ट किया कि, 'आगामी राष्ट्रपति चुनाव में साझे उम्मीदवार के लिए विपक्षी दलों के बीच आम सहमति बनाने के मकसद से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बुधवार को समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव से बात की.'

उधर, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसी मसले पर अखिलेश यादव से संपर्क किया है. जाहिर है समझदारी भरा कदम. ऐसे समय में जब भ्रम बरकरार हो तो पिता और पुत्र दोनों से अच्छे संबंध रखना बेहतर है. सोनिया गांधी मुलायम सिंह से बात करती हैं और राहुल गांधी अखिलेश से संपर्क साधते हैं. बहुत अच्छा.

ऐसी उम्मीद कम है कि मुलायम सिंह यादव खुलकर अखिलेश का विरोध करेंगे

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भ्रमजाल

क्या आप समाजवादी पार्टी को तोड़कर शिवपाल द्वारा धर्मनिरपेक्ष मोर्चे के गठन के बारे में सोच सकते हैं? नहीं. समाजवादी पार्टी बरकरार है और बगावती तेवर के साथ शिवपाल पार्टी के विधायक दल के सदस्य बने हुए हैं. मुलायम सिंह तटस्थ हैं.

लेकिन निकट भविष्य में क्या होगा? शायद ज्यादा कुछ नहीं. शिवपाल को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ सकती है. मुलायम सिंह हमेशा की तरह अखिलेश यादव को पिता की हैसियत से सार्वजनिक फटकार लगाएंगे और साथ ही अपने 'प्रिय भाई' को पार्टी और परिवार के हित में समझदारी दिखाने को कहेंगे.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मुलायम सिंह देश के ऐसे नेताओं में से एक हैं जिनके बारे में पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है. याद करिए कि इस साल के शुरू में पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आयोग के समक्ष पहुंची पिता-पुत्र की लड़ाई में क्या हुआ था?

जब चुनाव चिन्ह पर अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज पेश करने की बारी आई तो मुलायम सिंह बड़ी आसानी से चुप्पी साधकर इसे भूल गए. नतीजा यह हुआ कि अखिलेश को पार्टी नेतृत्व के साथ ही चुनाव चिन्ह भी मिल गया.

मुलायम सिंह तो ऐसे ही हैं.

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